भ्रष्टाचार के शिकंजे में दिल्ली एम्स
नई दिल्ली (प्रमोद कुमार मिश्र), 02 सितंबर।
राजीव मैखुरी नई दिल्ली के अंसारी नगर स्थित एम्स (ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज) के तथाकथित मीडिया कोऑर्डिनेटर हैं। यहां उन्हें तथाकथित इसलिए कहा जा रहा है कि मीडिया से संबंधित कार्य देखने के लिए इस संस्थान में पीआरओ (जन संपर्क अधिकारी) के पद नियमानुसार स्वीकृत हैं लेकिन साल 2007 से इसलिए इस पद के लिए कोई वैकेंसी नहीं निकाली गई कि मैखुरी जैसे लोग संस्थान में मीडिया कॉर्डिनेटर के पद पर काबिज रहें। यहां कहना गैरजरूरी है कि मीडिया कॉर्डिनेटर के पद संस्थान की ओर से स्वीकृत नहीं है बल्कि यह एम्स प्रशासन की आंतरिक व्यवस्था है। मैखुरी भी संस्थान में दूसरे कार्य के लिए नियुक्त किए गए हैं और उनका पदनाम सामाजिक कल्याण अधिकारी का है लेकिन वह अपना काम नहीं करते बल्कि मीडिया कोऑर्डिनेटर के पद पर आसीन हैं।
उक्त कथन को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि संस्थान की ओर से सूचना अधिकार अधिनियम के तहत दिए गए एक आवेदन के जवाब में संस्थान के सूचना अधिकारी ने कहा है कि नियुक्ति कोषांग में उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक पीआरओ का पद पिछले 2007 से रिक्त है और यह रिक्ति तत्कालीन पीआरओ बीके दास की सेवा निवृति के बाद से बदस्तूर जारी है।
कहना गैरजरूरी है कि 2007 के बाद संस्थान में इस पद पर नियुक्ति को लेकर कोई पहल ही नहीं किया गया। हालांकि उक्त आवेदन के जवाब में पीआरओ की नियुक्ति को लेकर एक चौकाने वाला खुलासा हुआ कि पीआरओ का पद पूरी तरह प्रतिनियुक्ति पर आधारित है। मानी अन्य संस्थानों से कर्मी इस पद के लिए प्रतिनियुक्त किए जाएंगे। यानी अगर दूसरे सरकारी संस्था के प्रबंधन नहीं चाहे तो फिर एम्स दिल्ली में पीआरओ का पद खाली ही रहेगा और राजीव मैखुरी जैसे लोग मीडिया कॉर्डिनेटर की तदर्थ कुर्सी पर काबिज रहेंगे।
जब इस संवाददाता ने कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन मीडिया कॉर्डिनेटर से पीआरओ के पद की रिक्ति व नियुक्ति पर बात की थी तो उन्होंने कहा था कि सभी खबरें मीडिया में प्रकाशित करने के लिए ही नहीं होता है। स्पष्ट है कि उन्हें डर था कि पीआरओ की नियुक्ति के बाद उनकी कुर्सी न छिन जाए।
उल्लेखनीय है कि 2007 के दौरान भारत में यूपीए (युनाईटेड प्रोग्रेसिव अलाइंस) की सरकार थी जिस वक्त बीके दास सेवा निवृत हुए थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि किसी व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त नहीं किया गया, यह समझ से परे है और इस पर एम्म की तरफ से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। लेकिन इसके परिणाम आम लोग भुगत रहे हैं। यहां तक कि संस्थान की ओर से प्रकाशित होने वाली टेलीफोन डायरेक्टरी भी कई वर्षों से प्रकाशित नहीं हो पा रही हैं । इसको लेकर मैखुरी ने बताया कि एक-दो महीने में इसे प्रकाशित कर दिया जाएगा।
हालांकि एम्स की व्यथा-कथा यहीं समाप्त नहीं होती। इस संस्थान में काम करने वाले कर्मियों की ऐसी मिलीभगत है कि यहां भ्रष्टाचार करने वाले कर्मियों को बचाने के लिए देश का स्वास्थ्य विभाग भी तैयार हो जाता है। ऐसे ही एक मामले में 2017 के दौरान हिमाचल प्रदेश कैडर के एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी को बचाने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दाखिल कर दिया। उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के ये अधिकारी विनीत चौधऱी हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव भी रह चुके हैं और उस वक्त प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा थे । उक्त अधिकारी एम्स में बतौर डिप्टी डायरेक्टर प्रशासन के पद पर आसीन थे और उनके कार्यकाल में 7,000 करोड़ के घपले के आरोप लगे थे। संस्थान में कर्मियों की साजिश और मिलीभगत का यह आलम है कि नड्डा ने एक मेमोरेंडम देकर दो साल पूर्व ही स्वास्थ्य मंत्रालय को इस मामले से अलग करते हुए इस केस को प्रशासनिक एवं कार्मिक विभाग को भेज दिया था चूंकि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारीयों की देखरेख कार्मिक विभाग ही करता है। कहना गैरजरूरी है कि कार्मिक विभाग प्रधानमंत्री के पास होता है। लेकिन फिर भी स्वास्थ्य मंत्रालय व एम्स के कर्मियों की खिचड़ी ऐसी पकी कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने शपथ-पत्र देकर चौधरी को क्लीन चिट दे दिया। यह मामला दिल्ली एम्स के विकास व हरियाणा के झज्जर में कैंसर सेंटर को स्थापित करने से संबंधित था जिसके तहत 7000 करोड़ की राशि के निर्माण परियोजना तैयार की गई थी। इस मामले में चौधरी के साथ संस्थान के सुप्रिंटेंडिंग इंजीनियर बीएस आनन्द भी शामिल थे।
मामले पर आरटीआई कार्यकर्ता राजनारायण ने उस वक्त कहा था कि चौधरी और आनन्द दोनों इस भ्रष्टाचार में बराबर के भागीदार थे और इन दोनों ने मिलकर निर्माण से जुड़े इस घोटाले को अंजाम दिया।
हालांकि यह कहानी तो पुरानी है और राजनारायण ने तो अब एम्स के मौजूदा डायरेक्टर एम. श्रीनिवास के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा है।
राजनारायण के मुताबिक एम्स के निदेशक की जानकारी में रहने के बावजूद संस्थान के एक विवादास्पद डा. नीरज पारेख कार्डियोलॉजी विभाग के ओपीडी में मनमर्जी काम कर रहे हैं। हालांकि संस्थान के मौजूदा डयरेक्टर को लिखे शिकायती पत्र में राजनारायण ने यह भी कहा है कि एक आरटीआई आवेदन के जबाव में संस्थान ने कहा था कि उक्त डाक्टर 5 साल तक अनधिकृत रूप से संस्थान से फरार रहे हैं। इससे पूर्व के डायरेक्टर के कार्यकाल में उक्त डाक्टर काम पर नहीं आते थे लेकिन मौजूदा डायरेक्टर के आते ही डाक्टर मनमानी करने लगे और ओपीडी में मरीज को देखने लगे। जब इन मामलों को लेकर प्रतिक्रिया जानने के लिए एम्स के मीडिया प्रोटकॉल विभाग के मेल पर टिप्पणी के लिए कहा गया तो विभाग ने इसका जबाव देना मुनासिब नहीं समझा। वहीं जब मैखुरी की ओर से उपलब्ध करवाए गए मोबाइल नंबर पर जब एम्स के प्रवक्ता डॉक्टर रीमा दादा से बात करने की कोशिश की गई तो मोबाइल लगातार ऑफ मिला। मतलब जिस काम की जिम्मेदारी दादा को दी गई है वही काम वह नहीं करेंगे और जिनसे उन्हें बात करनी चाहिए उन्हीं से वह बात नहीं करेंगे।


