Sat. Mar 7th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

कृपया ध्यान दें ! प्रदेश सरकार लापता हैं : लिलानाथ गौतम

लिलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर, 024 । लगभग १५ साल से नेपाल में संघीय राज्य की अवधारणा अनुसार शासन÷प्रशासन का अभ्यास हो रहा है, ८ साल से संघीय जनप्रतिनिधि काम कर रहे हैं । लेकिन संघीयता और गणतन्त्र के औचित्य को लेकर आज भी बहस है । इसके पीछे कई कारण है, उसमें से एक कारण है– आम जनता में संघीयराज्य की अनुभूति का ना होना ! हां, आम जनता को आज तक पता नहीं है कि देश में संघीयराज्य स्थापना होने के बाद उनको क्या मिला है !?
ऐसी ही पृष्ठभूमि में आश्विन ११ और १२ गते देशव्यापी जो बारिश हुई और उसके कारण जो भौतिक और मानवीय क्षति हो गई, इस भवितव्य को लेकर भी प्रादेशिक सरकार पर प्रश्न उठ रहे हैं । प्राकृतिक विपत्ति में प्रदेश सरकार की उपस्थिति कहीं भी नहीं दिखाई दी, सभी क्षेत्र में प्रदेश सरकार गायब रहे । इसी कारण प्रदेश सरकार के औचित्य पर प्रश्न उठ रहे हैं, जनता प्रदेश सरकार को ढूंढ रही है । लेकिन संघीयता और गणतन्त्र के लिए लड़नेवाले नेतागण इसतरह के सवाल से आक्रोशित होते हैं । उनका मानना है कि प्रदेश सरकार अधिकारविहीन है, कानून ना होने के कारण प्रदेश काम नहीं कर पा रहा है ! लेकिन उनका यह कथन अर्धसत्य है ! जब नीयत में खोट है तो इसतरह की बहनाबाजी बनती ही रहती है ।

यह भी पढें   इस जीत में नई पीढ़ी की अहम भूमिका रही है,उनकी उम्मीदें और विश्वास व्यर्थ नहीं जाएंगे – रवि लामिछाने

सच तो यह है कि प्राकृृतिक विपत्ति एक अवसर था, प्रदेश सरकारों के लिए ! संघीयता संबंधी औचित्य को लेकर प्रश्न करनेवालों को गलत साबित करने का जो अवसर था, उसको सदुपयोग करने में संघीयतावादी नेतागण असफल साबित हो गए । वे लोग कहने लगे कि कानून ना होने कारण प्रदेश सरकार कुछ नहीं कर सका । तब तो स्वाभाविक प्रश्न है– संकट के घड़ी में निष्क्रिय रहनेवाल प्रदेश सरकार का औचित्य क्या है ?
बारिश से विशेषतः कोशी, बागमती और गण्डकी प्रदेश ज्यादा प्रभावित रहा । कुछ हद तक मधेश प्रदेश भी प्रभावित रहा । बाढ़ और भू–स्खलन के कारण अरबों की क्षति हुई, २५० से अधिक नागरिकों की जान चली गई । लाखों नागरिक प्रभावित हो गए, जिनके उद्धार की जरूरत थी । लेकिन प्रदेश सरकार कहीं भी नजर नहीं आई ! केन्द्र सरकार सिर्फ काठमांडू में सीमित रही । देश के अन्य भू–भागों में केन्द्र सरकार की उपस्थिति कम ही रही और प्रदेश सरकार की उपस्थिति शून्य बराबर ! उद्धार के लिए प्रदेश सरकार केन्द्र सरकार का ही मुँह ताकता रहा ! यहां तक की मधेश प्रदेश सरकार के एक मन्त्री ने कहा कि बिपत् व्यवस्थापन संबंधी कानून ना होने के कारण मधेश सरकार बाढ़ पीडि़तो को राहत सामग्री नहीं दे पा रही है । यह तो गैर जिम्मेदार जवाब है !

यह भी पढें   रौतहट १ में शुरु नहीं हुई मतगणना

मानते हैं कि मन्त्री के कथन अनुसार प्रदेश सरकारों के लिए बिपद् व्यवस्थापन संबंधी कानून नहीं है ! लेकिन संकट में रहे नागरिकों के उद्धार के लिए वही कानून आवश्यक है, ऐसा नहीं है । आकस्मिक संकट की परिस्थिति में उद्धार और राहत के लिए किसी भी सरकार को कोई कानून की आवश्यकता नहीं है, विश्व के हर देश में यही प्रचलन अभ्यास में है । हां, कानूनी राज्य में हर कार्य के लिए कानून की आवश्यकता है, लेकिन विशेष परिस्थिति के लिए कोई कानून नहीं है तो अध्यादेश जारी की जाती है और बाद में कानून बनाया जाता है लेकिन प्रदेश सरकार के मन्त्री कहते हैं कि कानून के अभाव में वह कुछ नहीं कर पा रहे हैं !

कानून नहीं है तो बनाया जा सकता है । संसद् और सांसदो का मुख्य काम यही है । संसार के हर देश में कानून का अभाव हरदम रहता है । इसीलिए संसद् होता है । लेकिन हमारे प्रदेश मन्त्री कानून का अभाव बताकर आकस्मिक उद्धार और राहत संबंधी हास्यास्पद तर्क देते हैं । क्या प्रदेश संसद् का काम सांसदों को मन्त्री बनाकर झण्डावाला गाड़ी में घूमाने के लिए है ? ठीक है, मन्त्री की ही मानते हैं कि कानून के अभाव में प्रदेश सरकार कुछ नहीं कर पाया ! अध्यादेश जारी करने की ताकत भी उनके पास नहीं थी, केन्द्र सरकार के दबाव में (वास्तव में ऐसा नहीं होता) रोक दिया गया । तब भी प्रदेश सरकार सामाजिक संघसंस्था और स्थानीय सरकार के साथ मिलकर सहकार्य कर सकती थी, खुद क्रियाशील बनकर संघीयता की औचित्य पर प्रश्न करनेवालों को जबाव दे सकती थी । दुर्भाग्य ! किसी भी प्रदेश सरकार ने ऐसा नहीं किया ।

अगर प्रदेश सञ्चालन करनेवालों की नीयत सही रहती तो उनके पास भिजन होता, आकस्मिक उद्धार, राहत और पुनस्र्थापना संबंधी काम केन्द्र से पहले शुरु किया जाता । ऐसी परिस्थिति में केन्द्र को दोषी करार नहीं किया जाता है । पुनः एक बार– “कानून नहीं है तो बनाया जाता है, तत्काल कानून बनने की सम्भावना नहीं है तो अध्यादेश जारी किया जाता है ।” हां, प्राकृतिक बिपत संबंधी आकस्मिक संकट समाधान के लिए केन्द्रीय सरकार से अधिकार प्राप्त करने की कोई जरूरत नहीं है ! दुर्भाग्य की बात ! संघीयतावादी हमारे नेतागण सोचते हैं कि गांव में डायन के आरोप में पीडि़त महिला को उद्धार करने के लिए भी केन्द्र सरकार से अधिकार प्राप्त करना होता है ! इसतरह की मानसिकता को लेकर संघीयता कार्यान्वयन नहीं हो सकता ! नागरिकों की नजर में प्रदेश सरकार हरदम लापता ही रहेगी ! तब तो सूचना जारी है– ‘कृपया ध्यान दें ! प्रदेश सरकार लापता है !!

यह भी पढें   नेकपा के उम्मीदवार मनोज चौधरी गिरफ्तार
लिलानाथ गौतम

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *