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ट्रंप की वापसी और वैश्विक परिदृश्य : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

डॉ.श्वेता दीप्ति, हिमालिनी आवरण, अंक नवंबर 2024।

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर सभी की निगाहें टिकी हुई थीं । बाइडेन द्वारा पीछे हटने और कमला हैरिस के चुनावी मैदान में आने पर अमेरिकी चुनाव दिलचस्प बन गया था । तारीख ३ नवंबर २०२० के चुनाव में ट्रम्प को डेमोक्रेटिक पार्टी के उनके प्रतिद्वंद्वी जो बाइडन ने बड़े अंतर के साथ शिकस्त दी थी और ऐसा लगा था कि ट्रम्प का सियासी करियर अब समाप्त हो गया है ।

मगर ५ नवंबर २०२४ को ट्रंप २०२० की हार को पीछे छोड़कर बड़े अंतर से जीत दर्ज कर चुके हैं । वो अमेरिका के ४७वें राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं । उन्हें एक बड़ा जनादेश मिला है, जिसने उन्हें और ताकतवर बना दिया है । ट्रंप की ये जीत ऐतिहासिक बताई जा रही है क्योंकि उनके राष्ट्रपति बनने से कई चीजें पहली बार होने जा रही है । डोनाल्ड ट्रंप २० साल में पहले ऐसे रिपब्लिकन नेता होंगे जिन्होंने अमेरिका में पॉपुलर वोट जीता है । २०२४ से पहले के पांच चुनावों में कोई रिपब्लिकन उम्मीदवार लोकप्रिय वोट नहीं जीत पाया था । यानी उन्हें इलेक्टोरल कॉलेज के वोट भले ही मिले हों लेकिन मतों की संख्या में वे अपने प्रतिद्वंदी से पीछे रहे थे । यही नहीं ट्रंप ने अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं । साल २०१६ में उन्हें ४६.१ प्रतिशत मत मिले थे, वहीं साल २०२० के चुनाव में उनके लिए यह आंकड़ा ४६.८ प्रतिशत था ।

वहीं इस बार के चुनाव में ट्रंप को ५०.७ प्रतिशत मिले हैं । इन अर्थों में उनके लिए यह जीत पहले के मुकाबले बहुत बड़ी है । ट्रंप की यह जीत ऐतिहासिक इस मायने में भी है कि वो अमेरिका के इतिहास में सिर्फ ऐसा दूसरी बार हुआ, जब किसी राष्ट्रपति ने एक चुनाव हारने के बाद फिर से व्हाइट हाउस में वापसी की हो । इससे पहले ये कारनामा १३२ साल पहले हुआ था । डेमोक्रेटिक पार्टी के ग्रोवर क्लीवलैंड १८८५ से १८८९ तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहने के बाद रिपब्लिकन पार्टी के बेंजामिन हैरिसन से चुनाव हार गए थे । चार साल बाद वह फिर से हैरिसन के खिलाफ ही चुनाव लड़े और उन्हें भारी अंतर से मात दी । क्लीवलैंड २२वें और २४वें राष्ट्रपति थे । इतना ही नहीं डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति कार्यालय पहुँचने वाले ऐसे पहले राष्ट्रपति होंगे, जिनके खिलाफ कई आपराधिक मामलों में फैसला आना अभी बाकी है । ट्रंप को २०२४ न्यूयॉर्क में ३४ मामलों में दोषी ठहराया गया था । हालांकि अभी उन्हें सजा नहीं दी गई है । इसकी सुनवाई २६ नवंबर को निर्धारित है । फिलहाल इसे रोक दिया गया है । कानूनी जानकार भी मानते हैं कि ऐसी संभावनाएं बेहद कम हैं कि ट्रंप को अपराधी के तौर पर सजा सुनाई जाएगी । ट्रम्प ऐसे पहले राष्ट्रपति होंगे जिन पर दो बार महाभियोग चल चुका है और इसके बाद भी वो दोबारा चुने गए हैं । उन पर पहला महाभियोग २०१९ में और दूसरा जनवरी २०२१ में चला था । हालांकि दोनों बार सीनेट ने उन्हें बरी कर दिया था ।

जाहिर तौर पर ट्रंप की वापसी अमेरिका के राजनीतिक इतिहास की सबसे नाटकीय वापसियों में से एक है । व्हाइट हाउस छोड़ने के चार साल बाद लाखों अमेरिकी मतदाताओं ने अपना समर्थन देकर ट्रंप की वापसी तय की है । ट्रंप की वापसी उनकी सियासी साख में एक बड़ी गिरावट के बाद हुई है । उन्होंने साल २०२० के चुनाव परिणामों को मानने से इनकार कर दिया था, जिसमें वो जो बाइडन से पराजित हो गए थे । उन चुनावों के नतीजों को पलटने और अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय को न छोड़ने की उनकी कोशिश का आज भी आकलन किया जा रहा है । ट्रंप पर ६ जनवरी २०२१ को कैपिटल हिल्स पर समर्थकों को कथित तौर पर हिंसा के लिए भड़काने का आरोप भी लगा । कई विवादों के बाद भी ट्रम्प को जनता ने इसलिए चुना है कि उन्हें लगता है कि जब ट्रंप राष्ट्रपति थे तो अर्थव्यवस्था बहुत बेहतर हालत में थी, जबकि अभी हालात अच्छे नहीं हैं ।

हालाँकि अमेरिका में महंगाई के पीछे कोविड–१९ महामारी जैसी बाहरी वजहें ज्यादा बड़ी रही हैं, जिसके लिए लोग मौजूदा अमेरिकी प्रशासन को दोषी ठहरा रहे थे । अमेरिकी मतदाता अवैध प्रवासियों को लेकर भी बहुत चिंतित थे, जो बाइडन के शासन में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है । ट्रंप ने अमेरिका और उसके हितों को अपने चुनाव प्रचार में काफी महत्व दिया “अमेरिका फस्र्ट” इन चुनावों में ट्रंप के नारों में से एक था जो वास्तव में मतदाताओं को ज्यादा जोड़ रहा था । लोगों को यह भी शिकायत थी कि यूक्रेन के समर्थन पर अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं जबकि यह खर्च अमेरिका के लिए होनी चाहिए थी । इसलिए जनता ने कमला को नहीं चुना क्योंकि वो पहले ही बाइडन के साथ उपराष्ट्रपति के तौर पर काम कर चुकी थीं । इसलिए उनसे किसी बदलाव की संभावना लोगों ने नहीं देखा ।

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अब जीत के बाद ट्रंप के सामने वोटरों से किए गए वादों को पूरा करने की चुनौती है । अमेरिका ही नहीं पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद क्या करेंगे ? दुनिया के बबाँकी देश जाना चाहते हैं कि ट्रम्प के “अमेरिका फस्र्ट” का मतलब क्या है ? जिज्ञासा इस बात की भी है कि अमेरिकी आयात पर प्रस्तावित २०% टैरिफ के वैश्विक आर्थिक असर से लेकर यूक्रेन और मध्य पूर्व में जंग को समाप्त करने की जो कसम ट्रंप ने खाई है, उसका क्या होगा । डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में अपनी सभी योजनाओं को लागू करने में सफल नहीं रहे थे । देखा जाए तो दूसरे कार्यकाल में ट्रंप पर दबाव भी काफÞी कम होगा । इसलिए अब अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को देखना है कि बड़े–बड़े चुनावी वादे करने वाले ट्रंप वास्तव में क्या कर पाते हैं ?

ट्रंप के दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे मजबूत सैन्य शक्ति वाले देश अमेरिका के नए राष्ट्रपति बनने के बाद विश्व में दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है । दुनियाभर के देश इस सत्ता परिवर्तन के आधार बड़े बदलावों का अनुभव कर सकते हैं । इस बदलाव की शुरुआत अगर भारत से करें तो माना जा रहा है कि इस बार संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ भारत के भविष्य के रिश्ते संभवतः एक नई दिशा ले सकते हैं । भारत के साथ संबंधों को बढ़ाने में गहरी दिलचस्पी दिखाने वाले ट्रंप ने दोनों देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक प्रतिबद्धता जताई है । किन्तु विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की रिस्ट्रिक्टेड इमिग्रेशन पॉलिसी (विशेष रूप से ज्–ज्ञद्य वीजा कार्यक्रम के संबंध में) ने अमेरिका में कई भारतीय पेशेवरों को प्रभावित किया है । ट्रंप एक बार फिर अपनी पुरानी नीतियों को पुनर्जीवित कर सकते हैं, जिससे कुशल भारतीय श्रमिकों के लिए बाधाएं पैदा होंगी और संभावित रूप से भारतीय प्रतिभाओं, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी पर निर्भर क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ेगा । ट्रंप का फोकस हमेशा अमेरिका फर्स्ट पर केंद्रित रहा है और इस बार भी वो इन्हीं नीतियों पर काम करेंगे तो पहले कार्यकाल में अमेरिकी उद्योगों को संरक्षण देने की नीति पर चलने वाले दूसरे कार्यकाल में भी भारत समेत कई देशों के आयात होने वाली वस्तुओं पर भारी टैरिफ लगा सकते हैं । इसके अलावा अमेरिकी वस्तुओं पर आयात पर ज्यादा टैरिफ लगाने पर भी एक्शन ले सकते हैं ।

हाँ ट्रंप का चीन के प्रति विरोध, खास तौर पर व्यापार और सुरक्षा के मामले में भारत को लाभ पहुंचा सकता है । चीनी विनिर्माण पर निर्भरता कम करने के लिए उनके प्रशासन का प्रयास अमेरिकी कंपनियों को अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है । ट्रंप के पिछले प्रशासन ने इंडो–पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए क्वाड–अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक सुरक्षा साझेदारी को मजबूत किया था । ट्रंप के नेतृत्व में, दूसरे कार्यकाल में संयुक्त सैन्य अभ्यास, हथियारों की बिक्री और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जारी रहने की संभावना है । इस तरह के रक्षा सहयोग से भारत की सैन्य क्षमताओं को बढ़ावा मिलेगा, खासकर चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ तनाव को देखते हुए । ट्रंप की दक्षिण एशिया नीतियां भारत के क्षेत्रीय हितों को प्रभावित कर सकती हैं । हालांकि, उन्होंने पाकिस्तान के साथ सहयोग करने की इच्छा दिखाई है, लेकिन ट्रंप ने आतंकवाद विरोधी कार्रवाई में जवाबदेही की भी मांग की है । उनका ‘शक्ति के माध्यम से शांति’ दृष्टिकोण आतंकवाद और उग्रवाद पर अमेरिका के सख्त रुख का संकेत दे सकता है, जो भारत की अपनी सुरक्षा चिंताओं के साथ संरेखित है । ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका पाकिस्तान पर आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए अधिक दबाव डाल सकता है, जिससे संभावित रूप से भारत के सुरक्षा उद्देश्यों को लाभ हो सकता है ।

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बात करें बांग्लादेश की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों पर तो डोनाल्ड ट्रंप ने बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हाल ही में हुई हिंसा की निंदा की है । डोनाल्ड ट्रंप का संदेश दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सम्मान को बनाए रखने के उनके इरादे को रेखांकित करता है, जो उनके प्रशासन के तहत अमेरिकी विदेश नीति में संभावित बदलावों का संकेत देता है । बांग्लादेश के सवाल पर ट्रंप ने खुलकर भारत का साथ दिया है । ट्रंप ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाया था ।

बात करें वैश्विक परिदृश्य की तो ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि मध्य पूर्व में इजरायल और हमास के बीच और लेबनान में इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच जो संघर्ष चल रहे हैं, उसका क्या होगा ? ईरान के साथ इजराइल के रिश्तों पर इन नतीजों का क्या असर होगा ? रूस और यूक्रेन के बीच जारी लंबे संघर्ष का क्या अंत हो सकता है ? अमेरिकी चुनाव अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन–रूस और मध्य पूर्व में जारी इन संघर्षों को लेकर कहा था कि अगर वो सत्ता में आए तो ये युद्ध जल्द से जल्द समाप्त हो जाएँगे । मगर यह कैसे संभव होगा इसकी कोई ठोस राह उन्होंने नहीं दिखाई थी । चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा माना गया था कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और उस पर बाइडन प्रशासन के रवैये के चलते मुसलमानों का वोट डोनाल्ड ट्रंप की ओर झुका था । ट्रंप की रैली में मुसलमान नेताओं ने खासतौर पर कहा था कि हम डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो शांति का वादा कर रहे हैं । अपने पूर्व कार्यकाल में ट्रम्प ने इजरायल के साथ अच्छे संबंध बनाए थे । इजराइल के नाखुश होने के कारण ईरान के साथ न्यूक्लियर समझौते को उन्होंने रद्द किया था । इसलिए उनको इसराइल का हितैषी माना जाता है । अब ऐसे में देखना होगा कि क्या ट्रंप इजरायल को युद्ध खत्म करने के लिए कह पाएंगे और क्या इजरायल उसकी बात मानेगा ? उन्होंने इसराइल और फलस्तीन के बीच शांति समझौते के लिए भी एक रूपरेखा तैयार की थी, लेकिन उससे बात नहीं बनी, क्योंकि फिलिस्तीन के लोग जो चाहते थे उसमें उसकी कोई संभावना नहीं थी । आज की तारीख में डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कह दिया है कि बिन्यामिन नेतन्याहू जो चाहते हैं वो उनको करना चाहिए । वहीं डोनाल्ड ट्रंप को बिन्यामिन नेतन्याहू एक शील्ड की तरह देख रहे हैं । ट्रंप के आने से बाइडन प्रशासन का जो बढ़ता दबाव था वो कहीं ना कहीं कम होगा । लेकिन अभी देखना होगा कि किस तरह का प्रशासन आता है और कौन किस पद पर आता है । इन दो बड़े युद्ध में अमेरिका केंद्र में है । चूंकि ये घरेलू मुद्दों से जुड़े हैं तो ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के ऊपर भी दबाव होगा कि कैसे इसका समाधान करना है । वहीं नेतन्याहू पर भी इस चीज का दबाव है ।

ईरान की हालात को देखें तो २०१८ में डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के ऊपर पूरा दबाव बनाया था । लेकिन ईरान की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया था । जो ईरान की उस समय की क्षमता थी अब वो उससे आगे बढ़ चुका है । ट्रंप की उस वक्त की नीति से भले ही ईरान के ऊपर आर्थिक दबाव आया था, लेकिन उनके नीति चयन पर कोई असर नहीं पड़ा था । इसलिए आज की परिस्थितियों में भी यह नहीं कहा जा सकता है कि ट्रम्प ईरान की नीति को बदल देंगे । लेकिन जाहिर तौर पर ट्रंप की नीति रही है ईरान पर दबाव बनाने की, क्योंकि अमेरिका में कुछ समुदाय हैं जो चाहते हैं कि ईरान पर दबाव बनाया जाए । ट्रंप प्रशासन के पहले कार्यकाल में फÞलस्तीनी प्रशासन को ज्Þयादा महत्व नहीं दिया गया था ।

वर्तमान में चर्चा इस बात की भी है कि अब चीन के लिए ट्रम्प की नीति क्या होगी ? इस मामले पर जानकारों का मानना है कि अगर ट्रंप चाहते हैं कि चीन से मुकाबले में अमेरिका जीते तो उन्हें यूरोपीय देशों के सहयोग की जरूरत होगी और अगर यूरोपीय देश देखें कि यूरोप में जो उनकी चिंता है अमेरिका उसपर ध्यान नहीं दे रहा है तो चीन के खिलाफ अमेरिका का जो मुकाबला है उसमें यूरोपीय देश साथ नहीं देंगे । क्योंकि पूर्व में जब ट्रंप आए थे उस समय तक यूरोपीय देश इंडो पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा समस्याओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते थे । सिर्फ चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते बनाना चाहते थे । अभी भी जर्मनी जैसे देश नहीं चाहते हैं कि चीन के ऊपर किसी तरह की पाबंदी हो । अगर वो अमेरिका के साथ चीन के संकट में आगे नहीं बढ़ते हैं तो अमेरिका को चीन के खिलाफ टेक्नोलॉजी या दूसरे तरह की पाबंदी को बरकरार रखने में दिक्कत आएगी । ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिकी सरकार ने पहली बार ये साफ किया था कि चीन एक कॉम्पटीटर है जिसके खिलाफ उनको व्यापार और टेक्नोलॉजी को लेकर प्रतिबंध लगाने हैं और बाकÞी देशों के साथ सहयोग बढ़ाना है । लेकिन आज की तारीखÞ में तो उनके आस पास कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने चीन में बहुत ज्Þयादा निवेश किया हुआ है । ऐसे में वो सब ट्रंप पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे कि चीन पर पहले कार्यकाल की तरह पाबंदियां नहीं लगाई जाएं ।
इसी संदर्भ में बात करें नेपाल की तो ऐसा लगता है कि ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति होने से नेपाल के साथ रिश्ते पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा । नेपाल में वहां का चुनाव कोई खास मायने नहीं रखता । नेपाल जैसे छोटे और जÞमीन से घिरे देश के लिए, अमेरिका में राष्ट्रपति बदलने से कुछ मुद्दों को छोड़कर अन्य मुद्दों पर कोई असर नहीं पड़ता है । जलवायु परिवर्तन के विषय पर अगर विचार किया जाए तो विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप या रिपब्लिकन पार्टी की जलवायु परिवर्तन पर एक अलग नीति है । ट्रंप कहते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन एक खोखला नारा है । लेकिन अन्य देशों का कहना है कि चूंकि जलवायु परिवर्तन वास्तविक है, इसलिए इसका दुनिया पर प्रभाव और संकट है । इसलिए, इसका असर जलवायु मुद्दों पर अमेरिका से मिलने वाली बड़ी सब्सिडी पर पड़ सकता है । यदि स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन के लिए अमेरिकी समर्थन में कटौती की जाती है, तो नेपाल जैसे विकासशील देश, भूमि से घिरे, छोटे द्वीप और गरीबी रेखा से नीचे के देशों के नागरिक नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं ।

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अमेरिका के लिए दुनिया के छोटे से लेकर बड़े देश भी सभी महत्वपूर्ण हैं । नेपाल भारत और चीन के बीच है, इसलिए अमेरिका को नेपाल के लिए सकारात्मक रहना चाहिए । ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिकन मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी)समझौता हुआ था । जिसे नेपाल में जारी भी किया गया । और आगे भी जारी रहेगा यह उम्मीद की जा रही है । नेपाल में ३०१ किमी ट्रांसमिशन लाइन और ३११ किमी सड़क बनाने की योजना एमसीसी के अधीन है । उम्मीद की जा रही है कि ट्रंप के आने से इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा, ये सब ऐसे ही चलता रहेगा । अमेरिका की रुचि चीन और भारत समेत अन्य देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था, मानवाधिकार और विकास में हो सकती है, जो इस क्षेत्र में सबसे शक्तिशाली हैं । एमाले नेता प्रदीप ज्ञावली का मानना है कि ट्रंप के सत्ता में आने से द्विपक्षीय संबंधों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भू–राजनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं । उनका मानना है कि ट्रंप के इस दूसरे कार्यकाल के दौरान चीन के साथ रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं या भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी गहरी हो सकती है । ये कोई नई बात नहीं है ।
लेकिन अगर रुझानों के मामले में कुछ और होगा तो नेपाल दबाव में होगा । कई विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में चीन के प्रभाव को कम करना अमेरिका की प्राथमिकता होगी । ऐसी स्थिति में नेपाल के सामने अपने दो पड़ोसियों भारत और चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ त्रिपक्षीय संबंधों में संतुलन बनाए रखने की चुनौती हो सकती है । नेपाल को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपने पड़ोसियों के साथ अमेरिकी नीति के तहत एक नीति अपनाने के लिए कहा जा सकता है । इस स्थिति में नेपाल को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए दोनों पड़ोसियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना होगा ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक हिमालिनी ।

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