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हम विकास के साथ क्यों नहीं ? : कैलाश महतो 

 

कैलाश महतो, नवलपरासी । विकास की अवधारणा को प्रतिपादित करने वाले एडबर्ड वीन्डनर पहले विद्वान थे। बाद मे प्रो. रिग्ज, जाॅसेफ पालोम्परा तथा एलबर्ट वाॅटसन इत्यादि विद्वानों ने इस अवधारणा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विकास मूलतः तीसरी दुनिया के देशों : अफ्रीका, ल्याटिन अमेरिका एवं एशियाई देशों के प्रशासन से ज्यादा संबंधित है। इन देशों के समक्ष आजादी के बाद अनेक गंभीर समस्याएं जैसे : अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य प्रबंधन, अविकसित या अर्द्ध विकसित अर्थ-राजनीतिक व्यवस्था, संसाधनों का दोहन, प्रबंध एवं व्यवस्थाओं मे कौशल एवं तकनीकों की अभाव, वैज्ञानिक सोच की कमी, बढ़ती जनसंख्या, सामाजिक सुधारों की कमी या आंशिक जड़वार्दिता, ग्रामीण जीवन की दुर्दशा आदि अनेक समस्याएं रहीं हैं ।

“विकास प्रशासन” शब्द का प्रयोग भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री यू. एल. गोस्वामी ने करते हुए कहा था कि विकास प्रशासन दो शब्दों से मिलकर बना है :  “विकास+प्रशासन”। “विकास” का अर्थ है, “निरन्तर आगे बढ़ना” और “प्रशासन” का अर्थ है – “सेवा करना” ।

फेयोल ने विकास प्रशासन की परिभाषा देते हुये कहा कि विकास प्रशासन नवीन मूल्यों को लाने वाला एक राह है। इसमे वे सभी नये कार्य सम्मिलित हैं, जो विकासशील देशों में आधुनिकीकरण तथा औद्योगीकरण के मार्ग पर चलने के लिये अपने हाथों मे लिये हैं ।

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साधारणतया विकास प्रशासन मे संगठन और साधन सम्मिलित हैं जो नियोजन, आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय आय का प्रसार करने के लिये साधनों को जुटाने और बांटने के लिये स्थापित किये जाते हैं।

कुछ लोग परम्परा की बात करते हुए उसे हर हाल में बचाने और संरक्षित करने की दम भरते रहते हैं। वे आधुनिकता को परम्परा विरोधी मानते हैं। कलियुग को तो सतो सराप से सराबोर करते दिखते हैं, मगर वे कंप्यूटर, फोन, मोबाइल, टेलीग्राम और आधुनिक संसाधनों को अपनी शान समझते हैं।

दुनियाँ में आजतक वे ही लोग विकास, समृद्धि और तरक्की के मालिक हुए हैं, जो वस्तुतः पूरे के पूरे ईमानदार रहे हैं, या पूर्णतया बेईमान रहे हैं। बीच के लोग या तो गरीबी में, या मध्यम वर्ग के लोग सम्पन्न वर्ग के लोगों के चाकरी में जीते रहे हैं।

मानवीयता के विकास क्रम में हमारे पुरखों ने जिन काल्पनिक उहापोहों को ईश्वर, भगवान, अल्लाह और गॉड के रुप दिए, उसने मानव के अधिकांश भागों को स्वतन्त्र होने से रोका। ईश्वर निर्माण के साथ एक सोचा समझा साजिस यह शुरु हुआ कि ईश्वर की पूजा होनी चाहिए और उसके पुजारी एक तययित समूह और संप्रदाय होने चाहिए। मानव इतिहास में सबसे बड़ा षड़यंत्र और साजिस बहुसंख्यक समुदायों के साथ यही रहा है। मानव विकास का समान और समतामूलक विकास का दुश्मन दीवार वहीं से शुरु हुआ।

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बड़ी आश्चर्य की बात है कि ईश्वरों के पुजारियों ने कहा कि ईश्वर और उसके पुजारियों ने समस्त प्राणी और वैश्विक मानव कल्याण के लिए काम करेंगे, मगर हुआ ठीक विपरीत यह कि उस पुजारी समुदाय के श्री विकास और सम्मान के अलावे किसी भी उन समुदायों का विकास और प्रगति नहीं हो पायी। समस्त प्राणियों के रक्षा और संरक्षण के हिमायती उन्हीं ईश्वर भक्तों और पुजारियों ने बली प्रथा की शुरुवात कर यज्ञ आदि के नाम पर लाखों करोड़ों निर्दोष जीवों और प्राणियों का बली देने दिलाने लगे।

पंडित, पुजारी, मुल्लों और पादरियों के यस, श्री, सम्पति, पुत्रलाभ, मोक्ष आदि के भ्रम में हजारों हजार सालों तक इंतज़ार करने बाले दलित, गरीब, अछूत, दमित लोगों ने तबतक मानव होने तक का हक स्थान नहीं पा सका, जबतक वे उन शताब्दीयों पूराने भ्रमपूर्ण दीवारों को तोड़कर विद्रोही न बन गये।

आश्चर्य की बात है कि आज ज़ब पीड़ित लोग उन्हीं धार्मिक ठेकेदारों की बात नहीं मानते हैं तो उनपर शादियों से चले आ रहे परम्परा, संस्कार, संस्कृति और रीती रिवाजों को न मानने का थोथा इल्ज़ाम लगाते हैं, जबकि समझना यह होगा कि जितने भी परम्परायें और संस्कृतियाँ बनाये गये हैं, वे सब के सब प्राकृतिक सभ्यता और परम्परा से पृथक और विपरीत हैं।

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प्रकृति ने इंसान को भी खुल्ला वदन के साथ निर्माण किया था। मगर एक आवश्यकता के परम्परा ने वदन ढकने का नया परम्परा इंसान ने काविज़ कर दिया। जंगल में रहे जानवरीय इंसान परिवार, घर, गाँव, बस्ती, शहर, इलाका, देश और महादेश बना लिये। नाम विहीन अवयवों के अनेक नाम और परिचय दे दिये गये। वह सब प्राकृतिक परम्परा के विपरीत रहे।

हक़ीक़त यह है कि विकास के आलावे आजतक किसी भी परम्परा का बर्बादी समान्य लोगों ने नहीं किया है। मानव विकास के क्रम में इंसान ने अपने पिता के वीर्य को अपनी माँ के गर्भ में पाया। अपनी माँ के गर्भ से निकलकर बचपना पाया। बचपना से जवानी, जवानी से व्यश्कता, व्यश्कता से बुढ़ापा होते मौत का सफऱ पाता है। यह सब परम्परा ही तो है! विकास, विज्ञान, खोज और प्राप्ति सब परम्परा है। जैसे जवानी आता है तो बचपना जाता है, उसी तरह नया विकास होता है तो पुराना परम्परा छूट जाता है। उसे परम्परा या संस्कृति को छोड़ना नहीं कहा जा सकता।

कैलाश महतो, नवलपरासी |

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