अपने कार्य को करते रहें तो सफलता मिल ही जाती है : दिनेश शर्मा ‘दिनेश’
दिनेश शर्मा “दिनेश”, हिमालिनी अंक दिसम्बर, 025 । ‘व्यक्ति ना कद से बड़ा होता है ना पद से बड़ा होता है वह तो अपने व्यक्तित्व से बड़ा होता है ।’ जी हाँ, उक्त पंक्तियों को चरितार्थ कर दिखाया है १ मार्च, १९८२ को गांव फरल जिला कैथल हरियाणा में जन्में दिनेश शर्मा ‘दिनेश’ ने जो हिंदी, संस्कृत, हरियाणवी, पंजाबी एवं अंग्रेजी भाषाओँ के ज्ञाता हैं । आपने उन्हें शिक्षाविद्, साहित्यकार, संस्कृत साधक, स्वतंत्र पत्रकार, मंच संचालक एवं कार्यक्रम संयोजक के रूप में अनेकों मंचों पर देखा–पढ़ा–सुना होगा । पिछले कई वर्षों से हरियाणा और दिल्ली के विभिन्न महाविद्यालयों और प्रतिष्ठित मंचों से काव्य–पाठ, हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी एवं हिंदी अकादमी दिल्ली के कवि सम्मेलनों में प्रतिभागिता करते हुए भी देखा होगा । यही वजह है कि आज दिनेश शर्मा ‘दिनेश’ किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं । पिछले दिनों हिमालिनी पत्रिका के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख प्रो.एस.एस.डोगरा ने दिनेश शर्मा ‘दिनेश’ से मुलाकात की । आपके समक्ष प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश ः

० बचपन की कुछ यादें जिसका आपके जीवन पर प्रभाव रहा हो ।
– बचपन से ही परिवार से आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक परिवेश मिला । श्री जादो राम (दादा जी) सुप्रसिद्ध फल्गु तीर्थ फरल के प्राचीन फल्गु मंदिर के उपासक रहे और पिता जी श्री जयगोपाल शर्मा अध्यापक रहे । संस्कारों का श्रेय माता जी श्रीमती दर्शना देवी को जाता है ।
० अपनी साहित्यिक यात्रा में प्रोत्साहित एवं प्रेरित करने वाले मुख्य व्यक्तियों का उल्लेख करें !
– मैं सच में सौभाग्यशाली हूँ, मुझे अपने साहित्यिक जीवन में वरिष्ठ साहित्कार–इतिहासकार कमलेश शर्मा जी, डॉ. चन्द्र त्रिखा जी, प्रसिद्ध रेडियोकर्मी जैनेन्द्र सिंह जी, डॉ विजेंद्र कुमार, रविन्द्र कुमार जी जैसे प्रेरक व्यक्तियों के सानिध्य में निरंतर निखरने का सुअवसर मिलता रहा है ।
० अपनी शैक्षणिक यात्रा के बारे में बताएँ
– मैंने स्नातक (शास्त्री)– बिरला संस्कृत महाविद्यालय कुरुक्षेत्र से २००१ में, शिक्षा स्नातक (बी ।एड.)– कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से २००२ में, स्नातकोत्तर (संस्कृत)– कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से २००४ में एवं स्नातकोत्तर (हिन्दी) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से २००७ में किया ।
० हिंदी एवं हरियाणवीं भाषा में आपका साहित्यिक योगदान एवं उपलब्धियां ?
– प्रकाशित कृतियाँ ः ‘विरासतः उज्ज्वल संस्कृति पर एक नजर’, ‘फल्गु तीर्थ का सांस्कृतिक महात्म्य’(शोध कृति), ‘अभिनंदन’ (साक्षात्कार संकलन), ‘घर गाम की बात’ (हरियाणवी काव्य–संग्रह), हिंदी काव्य संग्रह ‘आ अब लौट चलें’ ‘कुछ कही, कुछ अनकही’ (साक्षात्कार संकलन), साहित्य के आईने में कैथल जनपद (शोध कृति).
० शिक्षक एवं मंच संचालक होने नाते अपना अनुभव, दोनों में बेहतर योगदान देने के लिए निजी टिप्स बताएँ ?
– देखिए, क्षेत्र कोई भी हो चाहे शिक्षण अथवा मंच संचालन या फिर कोई अन्य, हर क्षेत्र समर्पण और मेहनत चाहता है । मेरे विचार से निरन्तरता से बढ़कर कोई टिप्स नहीं है । हमेशा सम्पूर्ण निष्ठा से वरिष्ठजनों के कार्यों को मद्देनजर रखते हुए अपने कार्य को करते रहें तो सफलता मिल ही जाती है । यहाँ स्वरचित कविता की कुछ पंक्तियाँ जरूर पेश करना चाहता हूँः
“बढ़ें सपनों की राहों पर रुकावट खूब आती है
परीक्षा हर कदम पर रोज हमको आजमाती है
नहीं भयभीत होते हैं कभी भी हार के डर से
पसीना खून इक हो तो सफलता मिल ही जाती है ।”
० कैथल से आपके व्यक्तित्व के जुड़ाव पर प्रकाश डालें
– कैथल मेरा गृह जनपद है । कैथल से मुझे साहित्य, संस्कृति और सामाजिकता के संस्कार मिले हैं । साहित्य सभा कैथल के सदस्य के रूप में १९९९ से शुरुआत करने के बाद आज यहाँ तक पहुंचा हूँ । यहाँ के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महात्म्य का प्रभाव ही है जो इन्हीं पर आधारित ‘विरासत’, ’फल्गु तीर्थ का सांस्कृतिक महात्म्य’ के बाद तीसरी पुस्तक ‘श्री श्याम महिमा’ जल्द प्रकाशित हो रही है । मेरी बोली, रहन–सहन और आचरण सब कैथल की देन है ।
० प्रिंट, रेडियो एवं टेलिविजन पर आपकी सक्रियता का उल्लेख करें
– वर्ष २००० से मेरी रचनाएं विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं । २००१ में आकाशवाणी कुरुक्षेत्र से पहली बार काव्यपाठ किया । फिर वर्ष २००४ से अनेक वर्ष तक आकाशवाणी कुरुक्षेत्र के कार्यक्रम ‘किसानवाणी’ के लिए बतौर प्रस्तुतकर्ता जुड़ा रहा । आकाशवाणी केंद्रों और टीवी चैनलों से हिंदी और हरियाणवी भाषा में काव्य प्रस्तुति दे चुका हूँ । इसके अतिरिक्त कार्यक्रण संयोजक के रूप में पिछले ज्ञद्ध वर्षों से हरियाणा सरकार की विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर सांस्कृतिक संवर्धन के लिए कार्य कर रहा हूँ ।
० हमारे जीवन में सोशल मीडिया का क्या महत्व है ?
– सोशल मीडिया वर्तमान में अखबार, रेडियो, टेलिविजÞन आदि विभिन्न संचार माध्यमों का स्थान ले चुका है । आज सोशल मीडिया से दूसरे सभी संचार माध्यमों से पहले सूचना आम जन तक पहुँच रही है । शिक्षा, साहित्य, ज्ञान–विज्ञान और अन्य जानकारी भी यहाँ उपलब्ध हो पा रही है । अतः आज के दौर में सोशल मीडिया के महत्व को नकारा नहीं जा सकता । किन्तु इसके माध्यम से जो भ्रामक सूचनाएं प्रसारित होती हैं, उनके प्रसार पर नियंत्रण आवश्यक है । अति सर्वत्र वर्जयेत् ।
० साहित्यिक यात्रा के दौरान मिले कुछ खास सम्मान÷पुरस्कार का उल्लेख करें !
– साहित्य सभा कैथल द्वारा ’फल्गु तीर्थ का सांस्कृतिक महात्म्य’ को डॉ. भगवान दास निर्मोही स्मृति पुस्तक सम्मान, ‘मानवाधिकार संरक्षण संघ सोनीपत’ द्वारा शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में योगदान के लिए ‘मानव शांति अवार्ड–२०२२’, ‘साहित्य सभा कैथल’ द्वारा ’श्री धीरज त्रिखा स्मृति डिजिटल पत्रकारिता सम्मान २०२२’, जी वी एम कालेज सोनीपत द्वारा ‘कविकुल शिरोमणि सम्मान २०२२’, अखिल भारतीय राज साहित्य मंच हिसार द्वारा ‘हिन्दी साहित्य भूषण सम्मान २०२३’, हिन्दी साहित्य प्रेरक संस्था जींद द्वारा ‘गंगा पुत्र साहित्य रत्न सम्मान २०२३’, साहित्य एवं कला के क्षेत्र में योगदान के लिए चाणक्य वार्ता परिवार गुरूग्राम द्वारा ‘संस्कृति संवर्धक सम्मान २०२३’
इसके साथ–साथ हरियाणा भर की अनेक साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं द्वारा साहित्यिक,सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान के लिए सम्मानित
० विशेष उपलब्धि ः
– दो पुस्तकें हरियाणा साहित्य अकादमी से तथा एक हरियाणा ग्रंथ अकादमी से प्रकाशित हुई हैं । जबकि एक पुस्तक हरियाणा लोक संपर्क विभाग के पुस्तकालयों के लिए अनुमोदित है ।
० कोई अभिलाषा जिसे आप अपने जीवन में अवश्य हासिल करना चाहते हैं
– हमेशा इतनी ही इच्छा रहती है कि ईश्वर मुझसे कोई ऐसा कार्य ना करवायें जिससे मेरे परिचितों को मुझसे परिचय होने पर खेद हो । शेष तो सब कर्म के अधीन है, जहां लेकर जाएगा चलते–चले जाऊंगा ।
० वर्तमान में आप किस संस्था में किस पद पर कार्यरत हैं ?
– जी, मैं दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में संस्कृत अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ ।
० साहित्यिक क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी पर आपके क्या विचार हैं ?
– अच्छा साहित्य आज भी बड़े उत्साह से पढ़ा जाता है । बल्कि अब साहित्य पहले से ज्यादा समाज तक पहुँच बना रहा है और अब उसे केवल पाठक ही नहीं वरन श्रोता और दर्शक भी मिल रहे हैं । आज सोशल मीडिया अथवा इलेक्ट्रिक मीडिया के दौर में साहित्य भी बदले स्वरूप में पाठकों तक पहुँच रहा है । अब पाठक तक अपनी बात पहुंचाने के लिए साहित्य का प्रारूप पुस्तक से बदलकर ई–पुस्तक या पॉडकास्ट हो गया है । जिसमें युवाओं की बड़ी भागीदारी है । आज का युवा सजग है और अपनी जिम्मेदारी समझता है ।

