पशुपतिनाथ मंदिर की दिव्यता गजब है : डॉ. दीप्ति अग्रवाल
डॉ दीप्ति अग्रवाल, हिमालिनी, अंक दिसम्बर, 024 । पिछले दिनों त्रिभुवनविश्वविद्यालय में हिन्दी केन्द्रीय विभाग एवं कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिन्दी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ, डा भीमराव अंबेदकर विश्वविद्यालय आगरा तथा अन्य के संयोजकत्व में आयोजित विश्व फलक में राम विषयक अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सबकी आकर्षण का केन्द्र डॉ. दीप्ति अग्रवाल द्वारा बनाई गई चित्रों की प्रदर्शनी थी । राम जीवन पर आधारित कविताओं को माध्यम बनाकर कैनवास पर चित्रों के द्वारा उसे प्रदर्शित किया गया था जो अद्भुत था । इसी अवसर पर रचनाकार एवं कलाकार डॉ दीप्ति अग्रवाल से संक्षिप्त बातचीत करने का अवसर मिला जिसके आधार पर तैयार यह साक्षात्कार पाठकों के समक्ष है ।
० आप अपनी जीवन यात्रा के बारे में कुछ बताएँ ?
– बहुत बहुत धन्यवाद श्वेता जी, जो आपने मुझे अपने विचार सबके साथ साझा करने का सुअवसर दिया । शिक्षा के क्षेत्र में मेरी जीवन यात्रा उतार–चढ़ावों वाली रही । अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. सम्पूर्ण करते ही १९९० में २१ वर्ष की उम्र में विवाह हो गया था । तत्पश्चात १८ वर्ष के लंबे अंतराल के बाद पुनः औपचारिक शिक्षा आरंभ की और हिन्दी साहित्य, समाज कार्य और अनुवाद में स्नातकोत्तर किया । उसके बाद इसी वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय से भारतीय डायसपोरा ःअनुबंधित श्रमिक, भारतीय संस्कृति और हिन्दी साहित्य लेखन (मॉरीशस, गयाना, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम और पिÞmजी के संदर्भ में) विषय पर डॉक्टरेट पूर्ण किया और फिलहाल में इग्नू से माइग्रैशन एंड डायस्पोरा में स्नातकोत्तर कर रही हूँ और दिल्ली विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक के तौर पर हिंदी पढ़ा रही हूँ । पर्यटन, पढ़ना कविता और शोध–पत्र लिखना मेरी हाबी हैं ।
० आपकी त्रिभुवन विश्व विद्यालय में रामचरितमानस की कविता और चित्रकला की प्रदर्शनी देख कर मन भाव विभोर हो गया । आपके मन में कविता को चित्रकला के साथ समायोजित करने का खयाल कैसे आया ?
– अपने शोधकार्य के दौरान गयाना सूरीनाम त्रिनिदाद और मॉरीशस की यात्रा के सुअवसर और गहन अध्ययन से मुझे गिरमिट श्रमिकों की पीड़ा और संघर्ष की जानकारी ने उद्वेलित किया और वह पीड़ा कविता के रूप में सृजित हुई । ज्यादा से ज्यादा जनमानस इस संघर्ष से कैसे परिचित हो पाए यह ख्याल कचोटता रहता था । अचानक एक दिन मेरे मन में विचार आया कि मेरी संवेदनाओं के विवरण मेरे पास कविता के रूप में है बस मुझे चाहिए अपनी कविताओं को दृश्य में रूपांतरित करना । और बस तलाश शुरू हुई एक चित्रकार की जो मेरी कविताओं को रंगों और ब्रश के माध्यम से कैनवस पर उतार सकें । इस पर अपने एक साथी लोकेश के साथ काम किया और नतीजा बहुत फलदायक निकला । कविता और चित्रों के माध्यम से अधिक से अधिक सुधीजन उन श्रमिकों के संघर्ष, पीड़ा को जान पाये और इतिहास का सच मुखर रूप से सामने आया जो कुछ हद तक दबा–ढका था । कविता पढ़ने के साथ जब पाठक उस समय के दृश्य को अपने समक्ष देखेगा तो शायद अधिक गहनता से जुड़ पाएगा, ऐसा मुझे लगता है । हालांकि यह काम बहुत चुनौतीपूर्ण और नए अनुभवों के द्वार खोलने वाला सिद्ध हुआ ।
० रामचरितमानस पर कविता और चित्र प्रदर्शनी का ख्याल कैसे आया ?
– रामचरितमानस के पात्र बचपन से ही बहुत प्रभावित करते रहे हैं और उन पर लेखन करती रही हूँ । जब प्रदीप श्रीधर सर का नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रतिभागिता के लिए आमंत्रण आया और उन्होंने पूछा कि गिरमिट जैसी प्रदर्शनी रामचरितमानस पर नेपाल में लगा सकती हो क्या ? मैंने कहा, “सर विचार करती हूँ और बस कविताएँ तो लिखी हुई थी ही अब उन पर चित्र के माध्यम से काम करना था इन ६ महीने में मैं इसी काम में लगी रही और आप सबका बहुत आभार जो आप सबने इस प्रदर्शनी को सराहा और सफल बनाया ।

० कविता के माध्यम से चित्रों में भाव को व्यक्त करने में किन–किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?
– रामचरितमानस की कविता के भाव चित्र में आ भी जाए और कुछ पाठकों और दर्शकों की कल्पना से भी समाहित हो जाए इन विचारों को कैनवस पर उतारने के लिए बहुत शोध और मशक्कत करनी पड़ी । लेकिन अनुभव बहुत सुखदायी भी रहे । हाँ गिरमिट पर आधारित कविता पर चित्र बनवाना बहुत ही गहन अध्ययन और श्रमसाध्य काम रहा देश, काल, परिस्थिति का दस्तावेजीकरण करने में कोई त्रुटि ना रह जाए इसका विशेष ध्यान रखा गया ।
० कविता लेखन के अलावा साहित्य की और कौन–कौन सी विधा आपको पसंद है ?
– मुझे पढ़ने के तौर पर साहित्य की लगभग सभी विधाएं पसंद हैं लेकिन लेखन के तौर पर कविता, यात्रा संस्मरण, कहानी, पुस्तक समीक्षा करना बहुत पसंद है ।
० नेपाल यात्रा कैसी रही ?
– बहुत ही अद्भुत और अविस्मरणीय । आप लोगों का स्नेह और आतिथ्य, त्रिभुवन विश्वविद्यालय की भव्यता हिमालय का अनुपम सौन्दर्य, पशुपतिनाथ मंदिर की दिव्यता गजब है । बहुत बार ऐसा लगा दो आँखों और एक हृदय से इतना सौन्दर्य कैसे अपने आपमें समोया जा सकता है, काश बहुत सारी आँखें हो और बहुत विशाल हृदय । जनकधाम और लुम्बिनी जैसी तीर्थ ना देख पाने का अफसोस है ।

० रामचरितमानस के कौन से पात्र आपको सबसे अधिक पसंद है और उन्होंने आपको कैसे प्रभावित किया ?
– बचपन से ही रामचरितमानस का पाठ सुनते देखते करते आए हैं, तो पात्र और उनके आदर्श घर जैसे लगते रहे । इसके सभी पात्र अपने स्थान पर प्रभावित करने लायक है । सीता का स्वाभिमान, राम का मर्यादित रूप, भरत का भ्रातृप्रेम, उर्मिला और मांडवी का त्याग, मंदोदरी का पति को सही राह पर लाने का प्रयास सुलोचना का सतीत्व और त्रिजटा का सीता के प्रति प्रेम, रावण की विद्वता सभी किसी ना किसी रूप में प्रभावित करते रहे ।
० आपने गिरमिट श्रमिक का जिक्र किया । उनका रामचरितमानस से संबंध कैसे जुड़ा ? इसके बारे में पाठकों को बताएँ ?
– १८३३ में विश्व से दास प्रथा का अंत हुआ । सभी दास मुक्त कर दिए गए । भारत उस समय ब्रिटिश साता का गुलाम था अतः श्रमिकों की आपूर्ति के लिए ब्रिटिश उपनिवेश ने भारत से भारतीयों को मॉरीशस, गयाना, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम और पिÞmजी भेजा । भारतीय अपने जहाजी बंडल में आम जामुन तुलसी के बीजों के साथ साथ रामचरितमानस के गुटके के रूप में संस्कृति के बीज भी अपने साथ ले गए थे और उन्होंने वहाँ की धरती पर उन बीजों के साथ संस्कृति के बीजों को भी बो दिया जिनके फल आज चौथी पाँचवीं पीढ़ी खा रही हैं । उनके तकलीफ के क्षणों में रामचरितमानस उनका सहारा बनी । आज भी इन देशों में रामचरितमानस को खूब पूजा जाता है और दैनिक जीवन में इसका प्रचार प्रसार किया जाता है ।
० रामचरितमानस की दृष्टि से आप नेपाल और भारत के संबंध कैसे देखती हैं ?
– भारत और नेपाल का संबंध बहुत मजबूत और पुराना है । सीता जी नेपाल की बेटी हैं तो राम जी भारत के बेटे । नेपाल का स्थान भारत की नजरों में हमेशा ऊंचा है जैसा कि जब जनक सीता को विदा कर रहे थे तो राजा दशरथ के समक्ष हाथ जोड़ने लगे तब दशरथ जी ने आदरपूर्वक कहा आप का स्थान ऊंचा है आप दाता हैं आप अपनी बेटी हमें सौंप रहे हैं हम याचक हैं आपकी बेटी ले जा रहे हैं अतः नेपाल हमारे लिए हमेशा आदरणीय है ।
० आपकी भविष्य में क्या योजना हैं ?
– हिंदी भाषा को वैश्विक बनाने के लिए कार्य करना, और भारतीय डायसपोरा पर शोध कार्य करना । कुछ किताबें प्रकाशन में जाने वाली हैं ।
बहुत बहुत धन्यवाद आपका ।
प्रस्तुतिः श्वेता दीप्ति

