ब्रमह ज्ञान की सहज व्याख्या, समीक्षा-अष्ट्रावक्र गीता
महाभारत में जहाँ गीता ज्ञान आध्यात्म का प्रकाश बन कर आलोकित है , वहीं रामायण में ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक का संवाद ब्रहम ज्ञान की सहज ही व्याख्या कर जाता है | इसी अनूठे ज्ञान को ही अष्टावक्र गीता कहते है , जिसका भावानुवाद अजय जी ने बहुत ही खूबसूरती से किया है | रामायण महाकाव्य भक्ति और एक आदर्श परिवार के अनुपम संदेश से परिपूर्ण होने के कारण वहाँ अध्यात्म का संदेश देती अष्टावक्र गीता गौण होकर रह गई है | अजय जी ने इस गीता का ज्ञान पाठकों के समक्ष लाकर क्ष्रम साध्य कार्य किया है ,जो प्रशंसनीय है |
कवि ने हृदय से इस अष्टावक्र गीता के मर्म को समझा है और उसका पद्य अनुवाद प्रस्तुत किया है | जीवात्मा , परमात्मा का शुद्ध चैतन्य स्वरूप ही है | तभी ऋषि कहते हैं –
मैं हूँ ज्ञान स्वरूप परम आत्मा ,
शुद्ध चैतन्य हूँ ,मैं ही विश्वात्मा | ( प्रष्ठ 21 )
योगी बनना सरल नहीं होता | यह कठिन तपस्या का मार्ग है | योगी क्या होता है ,ऋषि समझाते हैं –
भोग औ त्याग का मन में भाव नहीं
चित्त है शांत मुक्त , है योगी वही | (पृष्ठ 22 )
इस विश्व के तीन आधार हैं , परमात्मा ,जीवात्मा और प्रकृति | जीवात्मा क्या होती है ? उसका स्वरूप क्या है , वर्ण क्या है आदि के बारे में ,इस रहस्य से पर्दा उठाते ऋषि कहते है –
आत्मा अविनाशी है कालजयी ,
निर्विकल्प अद्वैत है चैतन्यमई | (पृष्ठ 12 )
हर साधु सन्यासी या विद्धवान आत्मज्ञानी नही होता | आत्म ज्ञानी अध्यात्म में मन की एक विशेष अवस्था होती है , जो कठिन साधना से प्राप्त होती है | आत्म ज्ञानी कौन होता है ,ऋषि समझाते हैं –
आत्म ज्ञानी को धन की जरूरत नहीं ,
पंच तत्वों में न उसकी रूचि रही | ( प्रष्ठ 12 )
विश्व मिथ्या है ,सत्य आत्मा को समझ ,
बृम्ह से योग हो ना कि जग में उलझ | ( पृष्ठ 18 )
जब व्यक्ति आत्म ज्ञानी हो जाता है , उसका अंत:करन शुद्ध हो जाता है | वह पाप पुण्य से ऊपर उठ जाता है | तभी ऋषि कहते हैं –
बृहम ज्ञानी का अंत:कर्ण शुद्ध है ,
पाप पुण्य रहित वह परम शुद्ध है | ( पृष्ठ 16 )
जब तक मनुज इस मृत्युलोक में भौतिक सुख संसाधनों में उलझा रहता है ,तो वह यहीं का होकर रह जाता है | जिस दिन वह यह जान लेता है कि यह सब तो मूल्यहीन हैं , तभी उसकी बृहम ज्ञान प्राप्ति का मार्ग खुलता है | ऋषि यही ज्ञान देते हुए कहते हैं –
दृश्य जग का नहीं कोई मूल्य अहो ,
जानकर सत्य बृहम में लीन रहो | ( पृष्ठ 18 )
यह मैं हूँ , यह मेरा है , जब मनुष्य इस आकर्षण से मुक्त हो जाता है ,तभी वह मोक्ष कि अवस्था को प्राप्त करने में समर्थ होता है | तभी ऋषि कहते हैं –
देह आकर्षण से मुक्त हुआ जो यहाँ ,
मोक्ष चूमे कदम उस मुनि का यहाँ | ( पृष्ठ 26 )
संत किसे कहते हैं , यह समझाते हुए ऋषि कहते हैं –
स्रष्टा ईश्वर ही है जग का अन्य नहीं ,
ज्ञान हो दृढ़ जिसका है संत वही | ( पृष्ठ 30 )
सुख व दुख के मूल कारण पर प्रकाश डालते हुए ऋषि कहते है –
चित्त वृति ही दुख का है मूल अहो ,
चित्त निवृति है सुख का फूल अहो | ( पृष्ठ 49 )
इस शरीर के सभी कर्म देह से होते है | जो मनुष्य देह को गौण मानकर आत्मा में ही रमते है | उसी में रह कर जीवन का हर कर्म करते है , वे देह में रहते हुए भी विदेह होकर आत्म ज्ञानी हो जाते हैं | तभी ऋषि कहते हैं –
कर्म हैं देह से आत्मा से नहीं ,
जान ले जो इसे आत्म ज्ञानी वही | ( पृष्ठ 67 )
अष्टावक्र गीता के इस भावानुवाद में ज्ञान का अतुलनीय भंडार है , जो पठन , मनन और संग्रह के योगी है | भाई अजय कुमार झा के इस श्रम साध्य करी के लिए उन्हें हार्दिक बधाई |
समीक्षक
विष्णु सक्सेना
भाषा विभाग हरियाणा , हरियाणा साहित्य अकादमी ,
उ प्र हिन्दी संस्थान उत्तर प्रदेश , जयपुर साहित्य संगीति राजस्थान
कादंबरी संस्थान मध्य प्रदेश , पंजाब ललित क्ला साहित्य अकादमी से क्ष्रेष्ठ कृति सम्मान से पुरुसकृत
निवास -गाजियाबाद उ प्र
मो 9896888017 


