दिल्ली में लहराया भगवा, आम आदमी पार्टी काे मिली करारी हारि कांग्रेस रही शून्य पर
सत्ताइस साल बाद दिल्ली की राजनीति में भाजपा की वापसी ने इतिहास रच दिया है । पहले हरियाणा, फिर महाराष्ट्र के बाद अब भाजपा ने दिल्ली के गढ़ पर भी अपना परचम लहरा दिया है, जो कुछ अरसा पहले तक उसके लिए आसान नहीं समझा जा रहा था. इसमें भाजपा की अपनी रणनीति ने तो आम आदमी पार्टी को चित्त करने में भूमिका निभाई ही, लेकिन उससे भी ज्यादा खेल बिगाड़ा कांग्रेस ने. वैसे तो पहले ही संभावना जताई जा रही थी कि कांग्रेस को मिला एक-एक वोट भाजपा के लिए फायदेमंद होगा. और हुआ भी यही. कांग्रेस को जिन 15 सीटों पर 15 फीसदी से अधिक वोट मिले, वे सारी सीटें आम आदमी पार्टी ने गंवा दी हैं. मादीपुर, संगम विहार, कस्तूरबा नगर, बादली और नांगलोई जाट पर कांग्रेस को करीब 20 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं. गुजरात में ‘आप’ ने जो कांग्रेस के साथ किया था, वही दिल्ली में कांग्रेस ने ‘आप’ के साथ कर दिया.
भाजपा की इस दिल्ली विजय ने उसे एक अभेद्य सियासी पार्टी में तब्दील कर लिया है. पार्टी को इसका मनोवैज्ञानिक फायदा केरल को छोड़कर उन तमाम राज्यों में मिलेगा, जहां आने वाले समय में विधानसभा चुनाव होने हैं. खासकर बिहार के लिए तो उसका रास्ता काफी हद तक साफ हो गया है, जहां इसी साल के आखिर में चुनाव होने हैं. दिल्ली के इन नतीजों में भाजपा की विजय से भी अधिक महत्वपूर्ण बात आम आदर्मी पार्टी की पराजय है. यह इस पार्टी के लिए बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि उसकी पूरी राजनीति की धुरी ही दिल्ली रही है. यहीं से वह राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने के ख्वाब देखते आई है. अब इस हार से आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को बड़ी ठेस पहुंची है. खासकर यह अरविंद केजरीवाल के लिए व्यक्तिगत पराजय भी है. केजरीवाल ने दिल्ली के पूरे चुनाव को एक तरह से स्वयं पर रेफरेंडम के तौर पर पेश किया था. इससे एक नेता के तौर पर उनके करिश्मे पर भी सवाल उठेंगे. इतना ही नहीं, अब उनके सामने कानूनी दिक्कतें भी बढ़ जाएंगी. केंद्रीय प्रवर्तन एजेंसियां भी बगैर हिचक के उन पर और नकेल कस सकेंगी. इससे आम आदमी पार्टी से बड़े पैमाने पर भाजपा की ओर पलायन की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.


