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राष्ट्रीय गरिमा को कमजोर बनाने का काम:लिलानाथ गौतम

 

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक जनवरी 025 । किसी भी देश के लिए प्रधानमन्त्री तथा राष्ट्रपति सर्वोच्च और सम्मानीय पद है । राजनीति करनेवालों के लिए भी प्रधानमन्त्री तथा राष्ट्रपति होना गर्व की बात है । उनके लिए यहां से ऊपर और कोई जगह (पद) नहीं है । अधिकांश देशों में प्रधानमन्त्री को सर्वोच्च कार्यकारी पद माना जाता है । नेपाल में भी यही व्यवस्था है । राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानन्यायाधीश जैसे पदों को संवैधानिक पद माना गया है । इन पद में पहुँचनेवाले व्यक्तियों को एक सामाजिक व्यक्तित्व माना गया है । कहा जाता है कि ऐसे व्यक्ति एक सीमित राजनीतिक पार्टी, विचार, वाद और आस्था से ऊपर उठ कर रहना होगा ।

इसीलिए संवैधानिक दृष्टिकोण से सर्वोच्च पद पर पहुँचनेवाले व्यक्ति सेवा निवृत्त होने के बाद खास चर्चा में नहीं रहते हैं । चर्चा हो भी जाती है तो सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में होती है । ऐसे व्यक्ति सक्रिय राजनीति से पूर्ण रूप में अलग रहते हैं । उनका विगत किसी भी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ क्यों ना हो, जितने भी शक्तिशाली राजनीतिक पात्र का इतिहास क्यों ना हो, संवैधानिक पद (प्रमुख) पर पहुँचनेवाले व्यक्ति को देश का अभिभावक माना जाता है । कहा जाता है कि ऐसे व्यक्तित्व की सामाजिक गतिविधि सर्वमान्य होनी चाहिए, साझा होनी चाहिए । किसी भी पार्टी के प्रति विशेष झुकाव और आबद्धता स्वीकार्य नहीं है । यही मान्यता विश्व के हर प्रजातान्त्रिक मुल्कों में है । और इसी मान्यता के अनुसार अभ्यास भी हो रहा है ।

नेपाल भी एक प्रजातान्त्रिक देश है । यहां बहुसंख्यक राजनीतिक पार्टी चुनावी प्रतिस्पर्धा करते हैं, चुनाव में जिस पार्टी को बहुमत प्राप्त होता है, वही पार्टी सरकार निर्माण करती है । संसद् में बहुमत सिद्ध करनेवाले व्यक्ति कार्यकारी प्रधानमन्त्री बन जाते हैं । राष्ट्रपति संवैधानिक और सर्वोच्च पद है । राष्ट्रपति पद से अलग हो जाने के बाद वह एक सामाजिक व्यक्तित्व माने जाते हैं । लेकिन हमारे यहां ऐसी मान्यताओं में कुछ गड़बड़ दिखाई देने लगी है । प्रसंग है– पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी और पूर्व उप–राष्ट्रपति नन्दबहादुर पुन की ! दोनों पात्र संवैधानिक दृष्टिकोण से सर्वोच्च पद पर पहुँच चुके हैं । राजनीतिक दृष्टिकोण से अब वे लोग किसी एक पार्टी से आबद्ध होना ठीक नहीं है । लेकिन आज दोनों राजनीति में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं ।

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पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी विगत में नेकपा एमाले से आबद्ध थीं । पूर्व उप–राष्ट्रपति नन्दबहादुर पुन भी नेकपा माओवादी केन्द्र से आबद्ध थे । लेकिन राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति होने के बाद उनकी राजनीतिक सदस्यता निस्क्रिय की गई थी । लेकिन आज के दिन दोनों नेताओं ने राजनीतिक सदस्यता नवीकरण किया है । यहाँ तक की पूर्व राष्ट्रपति भण्डारी के ऊपर आरोप है कि वह अब नेकपा एमाले की पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए लालायित हैं । पूर्व उपराष्ट्रपति पुन भी नेकपा माओवादी केन्द्र के पार्टी उपाध्यक्ष बन रहे हैं । आज भण्डारी और पुन दोनों पात्रों की आलोचना हो रही है ।
भण्डारी और पुन एक नहीं, दो कार्यकाल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति बने हैं । अर्थात् यह दोनों पूर्व राष्ट्र प्रमुख और उप–प्रमुख हैं । अब उन लोगों को राज्य की ओर से आवास, खाना, स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षा व्यवस्था, यातायात सुविधा जैसी कई सेवा–सुविधाएँ मिल रही हैं, जो आजीवन मिलने वाला है । ऐसे व्यक्ति पुनः राजनीति में क्यों आ रहे हैं ? इसीलिए उनकी आलोचना हो रही है । राज्य की ओर से प्राप्त सेवा–सुविधा कटौती करने के लिए भी मांग हो रही है । भण्डारी और पुन की राजनीतिक सक्रियता एक सोचनीय विषय भी है ।

नैतिक प्रश्न
वर्तमान व्यवस्था अनुसार पूर्व राष्ट्रपति को मासिक ५० हजार रुपये ‘जीवन निर्वाह भत्ता’ मिलता है । काठमांडू में घर नहीं है तो मासिक २ लाख रुपये घर किराए के लिए मिलता है । खुद का घर है तो भी मर्मत–सम्भार के नाम से मासिक १ लाख मिल जाता है । एक सवारी साधन, मासिक २७० लीटर पेट्रोल, २० सुरक्षाकर्मी, अतिथि सत्कार के लिए मासिक १० हजार, पत्रपत्रिका और टेलिफोन खर्च के नाम से मासिक ४ हजार, बिजली और पानी में बिल अनुसार रकम, स्वकीय सचिव से सवारी चालक और कार्यालय सहयोगी तक का कर्मचारी राष्ट्रपति को मिल रहा है । पूर्व उपराष्ट्रपति को भी नियमित भत्ता, सचिवालय सुविधा, गाड़ी तथा चालक की सुविधा मिल रही है । यह सब सुविधा बिना कानून मन्त्रिपरिषद् के निर्णय से दिया जा रहा है । राष्ट्र प्रमुख तथा उप–प्रमुख रह कर राष्ट्र के लिए योगदान करने के हेतु उल्लेखित सुविधा दिया जा रहा है । सुविधा प्रदान के लिए कानून निर्माण करना चाहिए, ऐसी मांग वर्षों से है । सम्मानित व्यक्तित्व को दी गई सुविधाएं को लेकर ज्यादा विरोध भी नहीं है । लेकिन ऐसे व्यक्ति पुनः राजनीति में क्रियाशील हो जाते हैं तो विरोध होना स्वभाविक है । यह सम्बन्धित व्यक्तियों के लिए नैतिक प्रश्न भी है । राजनीतिक विश्लेषक से लेकर संवैधानिक ज्ञाता तक भण्डारी और पुन की राजनीतिक सक्रियता को लेकर आलोचना कर रहे हैं । वे लोग कहते हैं कि संवैधानिक रूप में राष्ट्र प्रमुख और उपप्रमुख की हैसियत प्राप्त करनेवाले व्यक्ति पुनः राजनीति में आना मर्यादा के विपरित है । क्या अब पूर्व राष्ट्रपति राजनीति में क्रियाशील रह कर प्रधानमन्त्री और मन्त्री बनना चाहते है ? यह प्रश्न स्वभाविक है ।

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राजनीतिक स्वार्थ का शिकार
पूर्व उपराष्ट्रपति नन्दबहादुर पुन पुनः राजनीति में क्रियाशील होने के पीछे नेकपा माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष तथा पूर्व प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ की गलत नीयत भी एक कारण है । बताया जाता है कि पुन को पार्टी उपाध्यक्ष बना कर प्रचण्ड नेकपा एमाले के भीतर राजनीति करना चाहते हैं । इसके लिए वह एक नजीर स्थापित करना चाहते हैं । आलोचकों की माने तो इसी योजना के अनुसार पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी तथा उनके पक्षधर नेताओं को उकसाने का काम हो रहा है ।
एमाले के भीतर पार्टी अध्यक्ष तथा प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली के प्रति असन्तुष्ट नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है । वे लोग पार्टी अध्यक्ष ओली की निरंकुशता और स्वच्छेचारिता से तंग आ चुके हैं, लेकिन खुल कर कोई नहीं बोल पाते हैं । जो ओली की निरंकुशता के विरुद्ध बोलते हैं, वे पार्टी से निकाले जाते हैं । पिछली बार पूर्व पार्टी उपाध्यक्ष तथा पूर्व उप–प्रधानमन्त्री भीम रावल इसीतरह निकाले गए हैं । इसीलिए एमाले के भीतर असन्तुष्ट नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है और पार्टी अघोषित रूप में दो ध्रुव में विभाजित हो रही है ।
ओली के प्रति असन्तुष्ट नेता मानते हैं कि अगर पूर्व राष्ट्रपति भण्डारी राजनीति में क्रियाशील हो जाती हैं तो ओली की स्वच्छोचारिता को रोका जा सकता है । यहां तक कि असन्तुष्ट समूह भण्डारी को पार्टी नेतृत्व में भी लाना चाहते हैं । इधर भण्डारी की सक्रियता से पार्टी अध्यक्ष तथा प्रधानमन्त्री ओली असन्तुष्ट हैं । उन्होंने भण्डारी को पार्टी राजनीति में क्रियाशील ना करने के लिए नेताओं को चेतावनी भी दिया । लेकिन भण्डारी पक्षधर नेताओं ने उनकी राजनीतिक गतिविधियों को स्वागत किया है । ऐसे ही पृष्ठभूमि में माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने पार्टी के पूर्व नेता तथा पूर्व उपराष्ट्रपति पुन को पार्टी उपाध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया है । प्रचण्ड सोचते हैं कि इससे एमाले के भीतर भण्डारी को उक्साया जा सकता है । प्रचण्ड की चाहत है कि अगर एमाले में भण्डारी पक्षधर को उकसाकर ओली को कमजोर बनाया जाता है तो उनकी राजनीतिक भविष्य भी सुरक्षित हो सकती है । इसके लिए एमाले के असन्तुष्ट नेताओं ने भी साथ दिया है ।

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घिनौनी राजनीति
इसतरह राजनीतिक पार्टी की पार्टीगत स्वार्थ और कुछ नेताओं की गलत नीयत के कारण पूर्व राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद को विवादित बनाया जा रहा है । इसमें एमाले, माओवादी से लेकर संसद् की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति नेपाली कांग्रेस के नेता तक शामील है । नेपाली कांग्रेस के कई नेताओं ने पूर्व राष्ट्रपति भण्डारी की राजनीतिक गतिविधियों को स्वागत किया है । कांग्रेस नेताओं की चाहत भी यह है कि एमाले विभाजित हो सके और इसकी राजनीतिक लाभ कांग्रेस को मिल सके । माओवादी तथा प्रचण्ड भी यही चाहते हैं । इसतरह की घिनौनी राजनीतिक हरकत के कारण आज संवैधानिक पद विवादित है । इसमे स्वयम् विद्यादेवी भण्डारी और नन्दबहादुर पुन भी जिम्मेदार हैं । किसी के उकसाने से राष्ट्र की गरिमा को कमजोर बनाने का काम उन लोगों से हुआ है । अब यह बन्द होना चाहिए ।

लीलानाथ गौतम
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