गणतन्त्र किसके लिए ? : अंशुकुमारी झा
अंशुकुमारी झा, हिमालिनी अंक जनवरी 025 । लोकतन्त्र विश्व का ही सबसे अति उत्तम शासन व्यवस्था माना गया है । लोकतन्त्र में सभी वर्ग समुदाय और व्यक्तियों के हकहित के लिए अधिकार सुनिश्चित किया जाता है । लोकतन्त्र में अपने अधिकार का सदुपयोग कर व्यक्ति खुलकर जीता है इसलिए लोकतन्त्र को सबसे सहज और उत्तम व्यवस्था मानी गयी है । नेपाल में भी वि.सं ।२०६२÷६३ के जनआन्दोलन के बाद राजतन्त्र का विधिवत रूप से अन्त हुआ और २०६५ साल जेष्ठ १५ गते गणतन्त्र की स्थापना की गई । उसके बाद संविधान सभा द्वारा डा.रामवरण यादव को प्रथम राष्ट्रपति घोषित किया गया । दूसरे संविधान सभा ने वि.सं । २०७२ आश्विन ३ गते को नेपाल का संविधान जारी किया और गणतन्त्र को संस्थागत किया गया । इस प्रकार नेपाल भी राजतन्त्र से गणतान्त्रिक देश बना परन्तु अभी तक जनता को शासन शैली में कुछ खास परिवर्तन दिखाई नहीं दिया है । गणतन्त्र का अर्थ ही होता है जनता के हक की शासन व्यवस्था, जिसमें अखण्ड देश की जनता आती है न कि केवल पुँजीपति या धनी वर्ग । परन्तु यहाँ का गणतन्त्र गरीबों से बहुत दूर है ।
नेपाल का गणतन्त्र फिलहाल किसी के कब्जे में ही है, जैसा लगता है । राजतन्त्र में एक राजा के अन्दर हमें रहना होता था पर अभी कई महाराजाओं का शासन चल रहा है । जब लोकतन्त्र धनीपति तथा पुँजीपति दलाल वर्ग के हाथ में पहुँच जाता है तो उसके बाद लोकतन्त्र का महत्व कम हो जाता है । उनलोगों के लिए लोकतन्त्र एक हथियार हो जाता है जिसका प्रयोग शासक वर्ग अपनी स्वार्थ पुर्ति हेतु करने लग जाते हंै । अभी जनमानस में राजनीतिक दल, नेता तथा व्यवस्था प्रति तीव्र घृणा और वितृष्णा पैदा हो गई है । जनता का गणतन्त्र से भरोसा ही उठने लगा है । राजनीतिक दलों में राजनीतिक, वैचारिक सिद्धान्त हीन होने लगा है । पीडि़त वर्ग और राष्ट्र के हित के लिए काम ही नहीं हुआ है, जैसा लग रहा है । गलत विचारों के समर्थन से राज्यशक्ति क्षीण होती जा रही है । जनता निरीह बनती जा रही है । युवा विदेश पलायन के तरफ अग्रसर हैं । देश में अस्थिरता का आभास हो रहा है । फिर भी लोग आस लगाए बैठे हैं कि कभी न कभी हम भी हमारे लिए बने अधिकार का अनुभूति कर पायेंगे । हम देख सकते हैं कि अभी तक राज्य और राजनीतिक गतिविधि में धनी तथा दलाल वर्ग ही आगे रहते हैं ऐसा क्यों ? क्योंकि राज्य से भी शक्तिशाली वही लोग हंै । नेता लोग भी उनलोगों की चाकरी में लगे रहते हैं । उनके आगे आत्मसमर्पण के लिए हमेशा तैयार दिखते हैं । राज्य चाहे जितना भी नियम बना लें पर होगा वही जो पुँजीपति के हित में होगा । इससे स्पष्ट होता है कि गणतन्त्र में गरीबों का कोई अधिकार नहीं है ।
दलाल पुँजीपतियों का मुख्य उद्देश्य जितना हो सके धन एकत्रित करना और उस धन को विदेश में छुपाना, वहाँ जाकर लगानी करना और धन बढ़ाना । क्योंकि जिसे धन की भूख लग जाती है उसे अपने देश से भी ममता नहीं रह जाती है । वे लोग इतना गिर जाते हैं कि पीडि़तों का राहत भी निगल जाते हैं, इससे लज्जास्पद बात और क्या हो सकती है ? यह रबैया सिर्फ धनी वर्ग का ही नहीं राजनीतिज्ञों का भी है । कुछ प्रमाण के तहत कहा जाता है कि यहाँ के प्रायः तथाकथित बडेÞ बड़े राजनीतिज्ञों का विदेश में भी निवेश है । बड़े पैमाने पर राज्य को रिक्त कर विदेशों में सम्पत्ति छिपाने की प्रवृति विकास हो रही है । जो देश के हित में नहीं है । राज्य की आर्थिक अवस्था गम्भीर होने के बावजुद भी राज्य को लूटना राज्यप्रति थोड़ा सा भी प्रेम न होना स्पष्ट होता है । नेपाली उच्च राजनीतिक नेतृत्वोें का विभिन्न देशों में निवेश के सम्बन्ध में समय समय पर चर्चा होती रहती है जो निंदनीय है । यह प्रवृति राज्य को खोखला बना रही है । वैसे भी हमारा देश आर्थिक मामलों में कुछ कमजोर ही है ऊपर से और कमजोर बनाने का श्रेय भ्रष्ट, दलालों को जाता है ।
हमारे देश में वैसे भी राष्ट्रीय पुँजीपति वर्ग का अभाव ही है जिससे देश में कल कारखाना, उद्योग धन्दा का भी अभाव है । पहले से जो था वो भी बन्द पड़ा है कारण अन्य देशों से आए पुँजीपतियों जो नेपाल में लगानी करना चाहता है, उसके लिए राज्य सहज वातावरण नहीं बना पा रहा है । जो राष्ट्रीय धनी वर्ग हैं उसे विदेशी कहा जाता है । इस प्रकार के व्यवहार से देश आगे कैसे बढ़ सकता है ? पुराने धनी वर्ग अब यहाँ निवेश करना नहीं चाहते यानि कि यहाँ रहना ही नहीं चाहते, नये धनी जो रातोंरात पैदा हो जाते हैं उसके पास अनुभव ही नहीं है तो इससे हम देश विकास की कल्पना कैसे कर सकते हैं ?
उदाहरण के लिए मैं नेपाल के होटलों के निवेश के बारे में तथ्यांक अनुसार कुछ लिखना चाहती हूं । नेपाल में एक लाख ४२ हजार दो सौ २३ होटल, रेस्टुरेन्ट का तथ्यांक है । ‘राष्ट्रिय होटल तथा रेस्टुरेन्ट सर्वेक्षण २०८०’ अनुसार होटल का कुल स्थायी सम्पत्ति पाँच खरब ४३ अरब २५ करोड़ ८२ लाख है । तथ्यांक अनुसार होटल उद्योग में साढ़े १० अरब से अधिक विदेशी निवेश पाया गया है । अगर विदेशी निवेश कर रहा है तो उसे भी उस प्रकार का वातावरण मिलाना राज्य का दायित्व है । उसके निवेश से यहाँ के कितने बेरोजगारों को रोजगार मिला है । जनता को सुविधाएँ मिली है । हमारे देश के लिए पर्यटकों को आकर्षित किया गया है । राज्य को टैक्स मिला है । इसलिए बाहर के निवेश कर्ताओं का संरक्षण करना उसके लिए सहज तथा अनुकूल व्यवस्थापन राज्य का कर्तव्य होता है । चाणक्य ने कहा है कि ‘अगर हमारे देश में धनीवर्ग नहीं है तो बाहर से मँगवाकर उन्हें अपने देश में रखिये, आवश्यकता पड़ने पर उनसे धन लीजिये और देश चलाइए ।’
फिलहाल हमारे देश की परिपाटी ऐसी हो गई है कि, परिश्रम नहीं करना है, देश के हित में काम नहीं करना है पर रातोंरात धनी बनने का सपना देखना है जो गम्भीर विषय है । विडम्बना तो यह है कि जो लुटेरा है, भ्रष्ट है, विदेशी शक्ति भी उसे ही पहचानती है । यहाँ पर सर्वसाधारण दमित, पीडि़त को कोई नहीं पहाचनाता है । जनता से फायदा उठायेगा, उसे निचोड़ेगा, ठगेगा पर उसका अधिकार नहीं देगा । पुराने दलों का तो यह गम्भीर रोग है ही नए दलों में भी यह बिमारी तेजी से फैल रही है । दुख की बात यह है कि यह राजनीतिक दल इतना रोगग्रस्त है फिर भी बाहर वाले भी इन्हें ही स्थान देते हैं । इन्हीं को प्राथमिकता देते हैं । जिसे राज्यशक्ति की आवश्यकता है उसे बार–बार नकारा जा रहा है ।
समग्र में लोकतन्त्र केवल बड़े लोगों के लिए नहीं सभी के लिए आवश्यक है । राज्य का खेत बाँझ बना हुआ है, देश का जनशक्ति देश में रहना नहीं चाहता है । स्वच्छ राष्ट्र निर्माण के लिए सभी का सहयोग लेना चाहिए । सभी की सहभागिता से ही एक असल देश का निर्माण होता है । शोषित, उत्पीडि़त तथा राज्य द्वारा जो अवहेलित है उस समुदाय को अग्रणी अधिकार देना चाहिए साथ ही उसे समानता की अनुभूति दिलानी चाहिए । यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा तथा मानवीय स्रोत साधन का नेपाल के हित में प्रयोग करना चाहिए । गणतन्त्र की प्रत्याभूति सर्वसाधारण को भी होना चाहिए ।



