ट्रम्प जेलेन्स्की वाक युद्ध से रूस-यूक्रेन गोला युद्ध का भविष्य : कैलाश महतो
1 year ago
कैलाश महतो, नवलपरासी । ट्रम्प का दूबारा राष्ट्रपति होना उनके लिए बड़ी जीत तो पक्का है, मगर दुनिया के बहुत से जमीनों के लिए करारा हार साबित हो सकता है। वैसे गंभीर मिजाज के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प अब पूरे अमेरिकन हो चुके हैं, भले ही उनके पुरखों का खून जर्मन रहा हो, और उन्होंने ठीक वही करना आरम्भ किया है – जो अमेरिकन विदेश नीति कहता है। उस नीति के अंतर्गत ही विदेश मामिलों के जानकारों का कहना है कि अमेरिका दुनिया में हर जगह है, पर वह किसी का भी अपना नहीं है।
ट्रम्प भले ही अभी शक्तिशाली अमेरिकन नागरिक हैं, परन्तु उनका खानदानी खून किसी जमाने का शक्तिशाली जर्मनी का ही है। हिटलर पूरे यूरोप का मालिक बनना चाहते थे और आज ट्रम्प दुनिया का शातिर व्यापारी नेता। हकीकत यही है कि हिटलर और ट्रम्प के बीच तात्विक भिन्नता में खास ही फर्क नहीं है। हिटलर पूरे दुनिया के सम्पत्ति पर शासन करना चाहते थे, ट्रम्प पूरे दुनिया के खनिज संपत्तियों पर मालिकाना हक कायम करना चाहते हैं। उसीका परिणाम है कि बिना कोई शर्त रूस को कमजोर करने के लिए जेलेन्स्की को मोहरा बनाकर अमेरिका ने युद्ध के बीच राह में ना केवल यूक्रेन को धोखा दे रहा है, बल्कि उसके जमीन के नीचे छुपे भू-जायदादों को भी हड़पने के जुगाड़ लगा रहा है।
अमेरिका ने वस्तुतः न केवल यूक्रेन और जेलेन्स्की को, अपितु पूरे युरोप समेत को बहुत बड़ा झटका दे डाला है। ट्रम्प का यह जो रवैया है, उससे अमेरिका को वर्तमान में भले ही क्षणिक लाभ प्रतीत होता हो, मगर कालान्तर में अमेरिका को इसका भाडी कीमत चुकाना पड़ सकता है।
आज अमेरिका जिस फायदे के व्यापार में अपना टाँग पसारने को सफलता मानता है, कल्ह युरोप अमेरिका को फूटी कौड़ी का न तो भाव देगा, ना विश्वास करेगा। रूस तो अमेरिका को कभी मित्र मानेगा नहीं। उत्तर कोरीया और चीन अमेरिकी नीति से हमेशा दूर खड़ा होने में ही सुरक्षित समझता रहेगा। उस हालत में दुनिया का शक्ति रहे युरोप अगर अमेरिका से दूरी बना ले, तो कल्ह अमेरिका बिल्कुल अलग थलग पड़ सकता है और रूस, चीन, कोरिया, भारत लगायत के राष्ट्रों का शक्तिशाली एक समूह खड़ा हो सकता है। उस हालत में अमेरिका को नये समूह बाला राष्ट्र संघ जब चाहे, मुसीबत में लपेट सकता है।
जहाँतक यूक्रेन का सवाल है, व्हाइट हाउस में ट्रम्प के साथ जिस लहजे में जेलेन्स्की अपने को प्रस्तुत किया है, वह स्वाभाविक है। भारतीय कुछ मीडिया बाले जेलेन्स्की को भले ही अयोग्य, पागल और जोकर समझे, दर्द से बेहाल जेलेन्स्की ने दुनिया के सर्वशक्तिशाली देश के राष्ट्रपति के सामने आँख में आँख मिलाकर जो बात रखी है, वह काबिले तारीफ है। क्योंकि वह अमेरिका ही है, जिसने यूक्रेन को रूस के साथ युद्ध करने को उकसाया था। नि:शुल्क और बिना कोई शर्त पैसे और हथियारों का सहयोग करने की जो वादे किये गये थे, उसके विपरीत अमेरिका द्वारा धोखा देते हुए यूक्रेनी खनिजिय संपदाओं पर लालची निगाह रखना किसी को योजनवद्ध होकर कमजोर बनाना और तब जाकर उससे गलत सौदाबाजी करने जैसा होता है। उस हालत में जेलेन्स्की ही नहीं, दुनिया का कोई भी साफ इंसान विद्रोही भाव व्यक्त करेगा। फर्क इतना हो सकता है कि कोई जेलेन्स्की के तरह करेगा, तो कोई नेपाली नेताओं के तरह।
वाकई अमेरिका ने जेलेन्स्की को रकम और हथियार दिया है। यूक्रेन, जेलेन्स्की और यूक्रेनी जनता को अमेरिका, बाईडन प्रशासन और अमेरिकी जनता के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। वो शायद होंगे भी। मगर सहयोग के नाम पर यूक्रेन और जेलेन्स्की को इस कदर कमजोर भी कर दिया है जहाँ से ना तो यूक्रेन वापस आ सकता है, ना जेलेन्स्की आगे जा सकता है। यह सब अमेरिकी रणनीति के तहत हुआ होगा, जो अमेरिका जैसे महाशक्ति राष्ट्र को नहीं करना चाहिए।
जेलेन्स्की ने दो गलतियाँ की है, और वे ये हैं कि – पहला, उन्हें रूस के साथ युद्ध में नहीं जाना चाहिए था और दूसरा ये कि अमेरिका पर विश्वास नहीं करना चाहिए था। क्योंकि उनके अपने पास युद्ध लड़ने की सामर्थ्य नहीं था-जिस बात को जेलेन्स्की ने खुलकर ट्रम्प के सामने भी स्वीकार किया है यह कहते हुए कि उन्होंने युद्ध के शुरुवात से ही गलती कर दी दूसरे के बहकावे में।
युद्ध अब जेलेन्स्की को केवल रूस से ही नहीं, अपितु अमेरिकी सोच से भी लड़ना होगा। उसी क्रम को आगे रखते हुए उन्होंने बेहिचक ट्रंप और उनके पूरे शक्तिशाली मौजूदगी से मानसिक और मनोवैज्ञानिक ढंग से लड़ा है व्हाइट हाउस में। इस युद्ध में जेलेन्स्की भले हार जाये, मगर वो अमेरिका को भी हैसियति दांव और साहसी जंग में जितने नहीं देंगे। क्योंकि जेलेन्स्की का हार केवल यूक्रेन और जेलेन्स्की का हार नहीं, बल्कि अमेरिका का गुमान, विदेश नीति और वैश्विक रणनीति का भी होगा।
और हकीकत तो यह होगा कि आने बाले कल्ह में युद्ध इतिहासकारों द्वारा यह दावा किया जायेगा कि रूस-यूक्रेन युद्ध में जोकर और कमेडियन जेलेन्स्की नहीं, अमेरिकी नीति और डोनाल्ड ट्रम्प रहे। इतिहास यह कहेगा कि वह जेलेन्स्की ही था, जिसने किसी के भरोसे अपना सारा साहस और जीवन को दांव पर लगाकर एक महाशक्ति से अनवरत तीन सालों से ज्यादा युद्ध लड़ा और हार नहीं माना। अन्तिम अन्तिम तक उसने अमेरिका से भी वाक, नजर, छल और नफरत युद्ध लड़कर अपनी शहादत दे दी।



