क्या स्कूल में पढ़ाई के लिए पिटाई जरूरी है ? : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)
एक स्कूल में शिक्षक पर बच्चे की पिटाई का आरोप
परिवार ने कहा- बच्चा पिटाई के बाद बीमार हुआ और उसकी मौत हो गई। इस मामले में पुलिस ने मामला दर्ज किया।
”परिवार का आरोप है कि स्कूल में शिक्षक ने बच्चे की पिटाई की जिसके बाद वो बीमार पड़ गया। बच्चे को अस्पताल ले जाया गया और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। शिक्षक के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मामले की विवेचना की जाएगी।”
साथ ही पुलिस अधिकारी का कहना है कि शिक्षक की गिरफ़्तारी की कोशिश की जा रही है और फिर पूछताछ की जाएगी। स्कूलों में छात्रों की शिक्षकों द्वारा पिटाई का ये केवल एक मामला नहीं है।
हाल ही में एक मामला काफ़ी उछला था जिसमें परिवार ने ये आरोप लगाया था कि उनके बच्चे की मौत स्कूल में शिक्षक की पिटाई से हुई थी। इस मामले में ये आरोप लगे थे कि शिक्षक ने मटके से पानी पीने के चलते दलित बच्चे को पीटा था।
एक टीचर पर स्कूल में होमवर्क की किताब नहीं लाने वाले एक बच्चे की पिटाई करने का आरोप लगा था। इस बच्चे को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था।
क्या हैं क़ानून?
क्या शिक्षकों को स्कूलों में बच्चों को पीटने का अधिकार है, बच्चों के अधिकारों को लेकर क्या हैं क़ानून?
बच्चों के लिए लाए गए नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा (आरटीई) अधिनियम, 2009 में शारीरिक सज़ा और मानसिक प्रताड़ना को रोकने का प्रावधान है।
वहीं दि जुवेनाइल जस्टिस(केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन) ऐक्ट, 2000 में भी बच्चों के लिए कई प्रावधान किए गए हैं।
आरटीई के सेक्शन 31 के तहत ही बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिल रहा है. इसकी निगरानी करने के लिए नेशनल कमीशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) बनाया गया है।
नेशनल कमीशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) ने स्कूलों में दी जाने वाली ऐसी सज़ा या कॉरपोरल पनिशमेंट को ख़त्म करने के लिए दिशानिर्देश दिए हैं।
आरटीई ऐक्ट के प्रावधानों के तहत कॉरपोरल पनिशमेंट को शारीरिक सज़ा, मानसिक प्रताड़ना और भेदभाव में वर्गीकृत किया गया है।
इनमें बच्चे को दी जाने वाली किसी भी तरह की शारीरिक सज़ा जिससे बच्चे को दर्द हो, चोट लगे, बैचेनी होने लगे शामिल है. उदाहरण के तौर पर इसमें- मारना, पीटना, लात मारना, खंरोच मारना, चोटी काटना, बाल खींचना, कान खींचना, थप्पड़ मारना, मुंह से काटना
किसी चीज़ (डंडा, छड़ी, डस्टर, बेल्ट, कोड़े, जूते आदि) से मारना, इलेक्ट्रिक शॉक देना। वहीं बेंच पर या दीवार के सहारे खड़ा करना मानसिक प्रताड़ना में शामिल है।
इसके अलावा बच्चे पर तंज कसना, अलग-अलग नाम से बुलाना, डांटना, डराना, अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करना या नीचा दिखाना, शर्मसार करना आदि इसमें शामिल है।
अगर स्कूल में बच्चे के प्रति व्यवहार पूर्वाग्रह से ग्रसित होता है तो भेदभाव की श्रेणी में आता है. इसमें जाति, जेंडर, व्यवसाय, क्षेत्र, कमज़ोर तबके में शामिल होने आदि के आधार पर किसी तरह का पक्षपात किया जाता है तो वो इसमें शामिल माना जाता है.
सज़ा का प्रावधान
ऐसे मामले सामने आने के बाद सज़ा में जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट (जेजे एक्ट) और आरटीई के तहत सज़ा का प्रावधान किया गया है।
इसमें ये कहा गया है कि किसी भी बच्चे को शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना नहीं दी जा सकती है। अगर कोई इन प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ मौजूदा सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। प्रताड़ना साबित होने पर शिक्षक, प्राचार्य और सम्पूर्ण प्रबन्ध को जेल होने के साथ-साथ स्कूल की मान्यता भी रद्द की जा सकती है।
स्कूलों में बच्चों की मदद के लिए क्या होना चाहिए?
स्कूल प्रबंधन की कमिटी को हर स्कूल में कॉरपोरल पनिशमेंट निगरानी सेल (CPMC) का गठन करना चाहिए। इस कमिटी में दो शिक्षक, दो अभिभावक, एक डॉक्टर, एक वकील और स्वतंत्र कॉउंसलर, बच्चे या महिला के अधिकारों से जुड़े एक स्वतंत्र ऐक्टिविस्ट और दो छात्र होने अनिवार्य होने चाहिए ।
स्कूलों में बच्चों की मदद के लिए एक तंत्र बनाए जाना चाहिए। इसके तहत स्कूल में बच्चों की शिकायतों के लिए ड्रॉप बॉक्स रखने का प्रावधान दिया जाना चाहिए। अगर बच्चा पहचान नहीं बताना चाहता है तो ये सुविधा दी जानी चाहिए।
शिकायतों को अन्य एजेंसियों से शेयर करते वक्त बच्चे या अभिभावकों की पहचान नहीं बतानी चाहिए।
स्कूल प्रबंधन की ज़िम्मेदारी होगी कि वो बच्चों की ‘कक्षा बाल सभा’ का गठन करे ताकि सभी बच्चे एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से, एक सकारात्मक महौल में इसमें भाग ले सकें।
किन देशों में है क़ानून?
दुनिया के 128 देशों के स्कूलों में क़ानूनी तौर पर कॉरपोरल पनिशमेंट पर रोक है। इनमें यूरोप, दक्षिण अमेरिका के ज़्यादातर देशों और ईस्ट एशिया देशों के साथ नेपाल भी शामिल हैं।

