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सत्ता में कुपात्र  : अजयकुमार झा

 
अजयकुमार झा, जलेश्वर । वर्तमान में नेपाली राजनीति में दो धाराएँ हैं, एक गणतंत्रवादी, दूसरी राजतंत्रवादी। बाकी अन्य, लोभियों का झुंड है जो माफिया, बिचौलियों और भ्रष्ट लोगों को पालने के साथ ही सत्ता और अधिकार से चिपके रहकर लोगों को अंधेरे में रखते हैं। वे बिना यह समझे भौंकते हैं कि देश या राष्ट्र क्या है और अगर उन्हें मौका मिले तो वे अपनी क्षुद्रता को प्रकट भी करने से पीछे नहीं हटते हैं। यही उनकी खेती है। 10-20 साल में व्यवस्था बदल जाएगी, लूट मच जाएगी, आंदोलन के नाम पर आम लोगों की हत्या होगी और सामंती लोग वैसे ही मौज करेंगे। बाकी देश और उसकी जनता भाड़ में जाएगी। अन्यथा कोई भी व्यवस्था किसी देश के निर्माण में बाधा नहीं बनेगी। दुनिया में कई व्यवस्थाएं हैं और इन व्यवस्थाओं में देशों के बनने और बिगड़ने के उदाहरण मिल सकते हैं। बात यह है कि सरकार के स्तर तक पहुंचने वाले व्यक्ति की राय सही होनी चाहिए, अन्यथा देश का निर्माण नहीं हो पाएगा, भले ही राजा, राष्ट्रपति, कार्यकारी प्रधानमंत्री आदि स्वयं भगवान कृष्ण के अवतार क्यों न हों।

आज हम छाती ठोक कर यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं कि हमारा नेता भी वैश्विक राजनीतिक नेतृत्व के आदर्श को जानता है। वल्कि हमें शर्मिंदगी महसूस होती है। खुद पर शर्म होता है कि हम किस घटिया माहौल में पैदा हो गए? जो देश, जो भूखंड, पौराणिक गरिमा को अपने आंचल में समेटे हुए है, मानवीय ऐतिहासिकता को संजोए हुए है,  प्राज्ञिक सभ्यता का आधार स्तंभ रहा है, जहां गौतम बुद्ध के एक एक कदम आर्य सत्य के सूक्ष्मतम् मानदंडों से विश्व मानवता को प्रज्ञा हेतु ललकार रहा हो। जहां विश्व मानवीय इतिहास के प्रथम विदुषी गार्गी और महा प्रज्ञावान याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ करते हों, जहां ब्रह्मांड के एक मात्र उत्कृष्टम शिष्य राजा जनक और अद्वितीय गुरू अष्टावक्र के बीच अतुलनीय और अवर्णनीय ब्रह्मज्ञान पर संवाद हुआ हो। जहां की मिट्टी और हवा में प्रस्फुटित नाद से सिद्धों और संतो को अनहद नाद का उपनिषदीय संज्ञान मिला हो; उस भूमि में आज मार्क्सवादी, लेकिनवादी, माओवादी, गांधीवादी और फ्रायड वादी नेपाली मूढों की कतार को देखकर किसी भी संस्कारी पुरुष का शीर झुक जाना स्वाभाविक है। पिछले 40 वर्षों में नेपाली राजनीति के क्षितिज को दानवों की इस भीड़ ने क्षुद्रता और मूढ़ता रूपी काले बादलों से ढक दिया है। और भस्मासुर की तरह आज खुद भी उसी काले बादल के आगोश में सिमटते जा रहे हैं।
जिस प्रकार कुपात्र में डाला गया अमृत विष के समान हो जाता है उसी प्रकार नेपाली क्षुद्र राजनीतिक दलों ने गणतंत्र रूपी कोहिनूर को कोयले में बदल दिया है। नेपाल के जिन दिव्य आत्माओं ने गणतंत्र लाने के लिए अपने हजारों संतानों का बलिदान दे दिया आज वही लोग इन दुष्टों के अराजक करतूतों से अजीत होकर गणतंत्र के जड़ को उखाड़ फेंकने पर आमादा दिख रहे हैं।
कोई भी सभ्य, संस्कारी तथा सुसंस्कृत व्यक्ति गुलामी को कदापि नहीं स्वीकार करता है। लेकिन नेपाल के वही सुसभ्य लोग गणतांत्रिक नेतृत्व को कुशासन से अपनी अस्तित्व को बचाने के लिए अपने ही संतानों के शाहिदगी को नजरअंदाज कर राजा के स्वागत और सम्मान में अपनी हृदय को बिछाए हुए नजर आ रहे हैं।
ध्यातव्य हो! इन कुशासकों के द्वारा पालित और पोषित अराजक तत्वों के द्वारा नेपाली सपूतों को पुनः बलिदान देने पर बाध्य किया जा सकता है। नेपाली राष्ट्रवादी युवाओं खून के प्यासा इन नर पिशाचों के द्वारा विदेशी के इशारों पर निश्चित रूप से नेपालियों के खून से होली खेलने का दुष्चक्र रचा जा सकता है। आंदोलन के क्रम में युवाओं को सावधान रहने की आवश्यकता होगी। जीवन से बढ़ कर कुछ नहीं होता, नेपाली राजनीतिक परिदृश्य में बलिदान का कितना सम्मान है? यह हम आप जानते हैं। “शहीदों के लाश पर वार्ता करो, लेकिन उसे कभी भी पूरा नहीं करना है।” यह पिछले 40 वर्ष से सम्मानित नेपाली राजनेताओं का संस्कार है। अपने ही नागरिकों के साथ छल करना इनके कूटनीतिक संस्कार है। डालर के लाभ में नेपाली अस्मिता को बेचना इनके परंपरागत संस्कार है। खुले हृदय से झूठ बोलना, अपनी आका को खुश करने के लिए सबकुछ अर्पण कर देना, निर्लज्जता को अपनी पैतृक आभूषण समझना और भौतिकता में जीवन का अंतिम लक्ष्य देखना इनकी जड़ता का प्रमाण है।
न कोई वैचारिक आंदोलन, न विवेक का सम्मान, न स्वाध्याय और नहीं साधना का अनुभव; सिर्फ और सिर्फ उद्दंडता और उच्छृंखलता के दम पर जनता को बेवकूफ बनाने का काम करते रहने के कारण आज उसी जनाक्रोश से प्रकंपित दिखना नियति का दंड विधान लगता है। प्रकृति सबसे बड़ा चिकित्सक, अभियंता, वैज्ञानिक और प्रज्ञापूर्ण है। अतः प्रकृति प्रदत्त दंड को सहने की शक्ति इन अज्ञानी पशुओं को प्राप्त हो। अपनी ही नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ करने की सोच बनाते समय हजार बार सोचें। याद रखें ! आपलोग आम नागरिक के हृदय से कब के निकाल दिए गए हैं। नेपाली युवा युवती आपको नेपाल माता को कलंकित करनेवाला कुपात्र ही मानते हैं। और कुपात्र से सुरक्षित भविष्य की कल्पना करना महा मूर्खता है। अतः विचार करने की हिम्मत करें।
अजय कुमार झा
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