पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र का वक्तव्य: विगत की छाया में लोकतंत्र का गुणगान
काठमांडू, 13 अप्रैल 025 । नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा हाल ही में दिए गए नववर्ष शुभकामना संदेश ने राजनीतिक हलकों में एक बार फिर बहस छेड़ दी है। तीनकुने में राजावादी प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के पन्द्रह दिन बाद आया यह संदेश केवल औपचारिक शुभकामना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसमें राजनीतिक सन्देशों का समावेश भी था। इस रिपोर्ट में पूर्व राजा के वक्तव्य की पृष्ठभूमि, उनका अतीत, और वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
पूर्व राजा का अतीत और लोकतंत्र विरोधी कदम:
ज्ञानेन्द्र को केवल एक पूर्व राजा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं, वे नेपाल के इतिहास में उस दौर का प्रतिनिधित्व करते हैं जब राजशाही ने लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने की हरसंभव कोशिश की थी। २०५९ साल में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा को ‘अक्षम’ घोषित कर सत्ता को केंद्रीकृत करना, और अंततः २०६१ साल में पूर्ण रूप से सत्ता अपने हाथ में लेना, उनके सत्तालोलुप रवैये को दर्शाता है।
उनकी अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद ने टेलीफोन, इंटरनेट जैसी सेवाएं बंद कर दी थीं, समाचार कक्षों में हथियारबंद सैनिक भेजे गए थे, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला हुआ था। यह वह समय था जब देश भर के लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे और राजशाही के खिलाफ जनआंदोलन का बिगुल बजा था।
तीनकुने घटना और संदिग्ध भूमिकाएं:
तीनकुने में हालिया राजावादी प्रदर्शन के दौरान घरों और कार्यालयों में आगजनी की घटनाएं हुईं। इसमें संलिप्त पाए गए युवाओं—सरोज गौतम और गोर्कण शाही—की उम्र उस समय बहुत कम थी जब ज्ञानेन्द्र ने सत्ता हथियाई थी। उनकी भागीदारी को केवल ‘युवाओं की जोश’ कहकर टालना कठिन है। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों ‘एसटीएफ’ नामक संगठन से जुड़े थे, जो कि दुर्गा प्रसाईं द्वारा गठित किया गया था।
दुर्गा प्रसाईं, जिन्हें स्वयं ज्ञानेन्द्र ने आंदोलन का नेतृत्व सौंपा था, बाद में भारत से गिरफ्तार किए गए। इस संदर्भ में पूर्व राजा की चुप्पी और अपने वक्तव्य में इस घटनाक्रम की कोई आलोचना न करना, उनकी मंशा पर सवाल उठाता है।
वक्तव्य में विरोधाभास और इतिहास की उपेक्षा:
ज्ञानेन्द्र का यह कहना कि “नागरिक स्वतंत्रता से बड़ा कोई तंत्र नहीं” एक विडंबनात्मक वक्तव्य प्रतीत होता है। यह वही व्यक्ति हैं जिन्होंने एक समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया था। आज वे संवाद, सहमति, समन्वय की बात कर रहे हैं, जबकि अतीत में उन्होंने सभी संस्थाओं और दलों को दरकिनार कर एकदलीय शासन का मार्ग प्रशस्त किया था।
उनका यह कहना कि नेपाल “विश्व का सर्वश्रेष्ठ भू-भाग” है और “स्वर्ण युग” था, इतिहास की कपोल-कल्पित व्याख्या है। राजतंत्र के समय नेपाली युवाओं को ब्रिटिश फौज में भाड़े के सिपाही के रूप में बेचने की परंपरा और पलायन की पीड़ा को नजरअंदाज करना इतिहास से छल है।
आर्थिक टिप्पणियां और खुद की असफलता की अनदेखी:
ज्ञानेन्द्र ने देश की आर्थिक स्थिति पर चिंता जताई और आत्मनिर्भरता की बात की, लेकिन यह नहीं बताया कि उनके शासनकाल में अर्थव्यवस्था क्यों चरमराई थी। वे यह भूल गए कि उनके सलाहकार और नीतियां भी उस गिरावट के लिए जिम्मेदार थीं।
निष्कर्ष:
पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा दिया गया वक्तव्य अतीत को भुलाकर वर्तमान में अपनी प्रासंगिकता स्थापित करने का प्रयास लगता है। हालांकि वे लोकतंत्र की बात कर रहे हैं, लेकिन उनके अतीत की परछाई आज भी उन्हें घेरे हुए है। लोकतंत्र की स्थापना सिर्फ नेताओं के प्रति नहीं, पूर्व शासकों के लिए भी उत्तरदायित्व की मांग करती है। यदि तीनकुने जैसी घटनाओं में उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन रहा हो, तो जनता को सच्चाई जानने और न्याय की अपेक्षा रखने का पूरा हक है।


