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रेशम चौधरी: गिरफ्तारी से रिहाई तक क्या-क्या हुआ?

 

17 बैशाख, 2082 / काठमांडू । नागरिक उन्मुक्ति पार्टी (नाउपा) के संरक्षक रेशम चौधरी को बुधवार को अचानक गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद कुछ ही घंटों में घटनाक्रम तेजी से बदलते गए। उनकी गिरफ्तारी क्यों हुई, किस आरोप में हुई—इन सवालों को लेकर समाज में भ्रम की स्थिति बनी रही।

जब तक काठमांडू पुलिस परिसर ने उन्हें डिल्लीबजार कारागार पहुंचा दिया, तब तक सर्वोच्च अदालत खुद उनकी गिरफ्तारी के कारणों को लेकर स्पष्ट नहीं थी। परिसर के प्रवक्ता एसपी अपिलराज बोहोरा ने कहा कि गिरफ्तारी सर्वोच्च अदालत के पत्र के आधार पर की गई है और इसकी विस्तृत जानकारी अदालत से ही ली जा सकती है।

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क्या-क्या हुआ इन पांच घंटों में?

जनमत पार्टी के नेता सीके राउत के साथ नागरिक उन्मुक्ति पार्टी के एकीकरण की औपचारिक घोषणा के ठीक पहले, चौधरी को कार्यक्रम स्थल—प्रज्ञा भवन परिसर से plain-clothes पुलिसकर्मियों ने गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तारी सर्वोच्च अदालत के आदेश के कार्यान्वयन के तहत की गई। उनका कहना था कि राष्ट्रपति द्वारा दी गई आममाफी को सर्वोच्च अदालत ने उलट दिया है।

गौरतलब है कि २०७२ भदौ में टीकापुर में हुई हिंसक घटना के चलते चौधरी को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। लेकिन २०८० जेठ १५ गते (गणतंत्र दिवस) के अवसर पर सरकार द्वारा दी गई आममाफी के आधार पर वे डिल्लीबजार कारागार से रिहा हुए थे।

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गिरफ्तारी का असली कारण क्या था?

चौधरी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद जनमत पार्टी और नाउपा के बीच प्रस्तावित एकीकरण की घोषणा स्थगित कर दी गई। सीके राउत ने स्पष्ट किया कि चौधरी की गिरफ्तारी के चलते कार्यक्रम रद्द करना पड़ा।

लेकिन कुछ ही समय में गिरफ्तारी का असली कारण सामने आ गया। सर्वोच्च अदालत के मुद्दा तथा रिट शाखा के शाखा अधिकृत महिमानसिंह विष्ट ने एक पत्र जारी कर चौधरी की आममाफी को अमान्य करार दिया और उसी आधार पर चौधरी को गिरफ्तार किया गया।

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फिर क्या हुआ?

यह खुलासा होने के बाद कि विष्ट द्वारा जारी पत्र ‘अनधिकृत’ था, सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि वह आदेश विधिसम्मत नहीं था और इस विषय में कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। पुलिस ने विष्ट को सर्वोच्च अदालत परिसर से ही गिरफ्तार कर लिया।

इसके थोड़ी ही देर बाद रेशम चौधरी को डिल्लीबजार कारागार से रिहा कर दिया गया।

इसतरह नाटक का अंत हुआ

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