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जनकपुरधाम के अधूरे सपने, विकास के वादे, टूटता भरोसा : कैलाश दास

 

कैलास दास, जनकपुरधाम । वर्ष २०७९ के स्थानीय चुनाव ने जनकपुरधाम उपमहानगरपालिका में नई राजनीतिक हवा बहाई। सड़कों पर उत्साह था, गलियों में चर्चाएँ थीं, और दीवारों पर विकास के रंग-बिरंगे वादे। चुनावी मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों ने जनता के सामने सपनों का ऐसा संसार रखा जिसमें जनकपुरधाम को एक आधुनिक, स्वच्छ, रोजगारयुक्त और पारदर्शी शहर के रूप में चित्रित किया गया।
उम्मीदवारों ने घोषणापत्र जारी किए—किसी ने 11 बिंदु, किसी ने 21 वादों का पुलिंदा, तो किसी ने दर्जनों योजनाओं का ब्यौरा दिया। जनता ने भी इन वादों को गंभीरता से लिया। ऐसा लगा, जैसे अब जनकपुरधाम की तस्वीर बदलने ही वाली है।
लेकिन तीन साल बीतते-बीतते तस्वीर साफ हो गई—विकास का वह सपना सिर्फ कागज़ पर ही था। न वादे ज़मीन पर उतरे, न शहर की हालत में कोई बुनियादी परिवर्तन आया।

कागज़ पर लिखे सपने
जनकपुरधाम के मेयर पद के लिए कई उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। मनोज कुमार साह, जिन्हें कांग्रेस से टिकट न मिलने पर उन्होंने स्वतन्त्र रूप से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उनके 21 बिंदुओं वाले प्रतिवद्धता-पत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, पारदर्शिता, और दलित व वंचित समुदाय के अधिकारों की गारंटी थी।
इसी तरह बलराम महतो, जानकी राम साह जैसे अन्य स्वतन्त्र उम्मीदवारों ने भी योजनाओं से भरपूर दस्तावेज जनता के सामने रखे। पारंपरिक दलों के उम्मीदवार भी पीछे नहीं थे—जनता समाजवादी पार्टी, नेकपा एमाले, लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी और तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के प्रत्याशियों ने भी बड़े-बड़े वादे किए।
लेकिन चुनाव समाप्त होते ही ये दस्तावेज अलमारियों में बंद हो गए। तीन वर्षों में ज़्यादातर वादे ज़मीन पर नहीं उतर पाए। न सामुदायिक स्कूलों की हालत सुधरी, न पारदर्शिता के वादे दिखे, और न ही रोजगार या पीने के पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान दिया गया।

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मेयर की कांग्रेस में वापसी: भरोसे को ठेस

मनोज साह की जीत को जनता ने इसलिए भी सराहा क्योंकि वे ‘स्वतन्त्र उम्मीदवार’ थे—एक ऐसा चेहरा, जो पारंपरिक दलों से हटकर जनआशाओं का प्रतीक बनकर उभरा। लेकिन जीत के कुछ समय बाद ही साह ने नेपाली कांग्रेस में वापसी कर ली। इससे जनता को गहरा झटका लगा।
लोकतंत्र में दल बदलना अवैध नहीं, लेकिन यह तब अनैतिक प्रतीत होता है जब जनता को एक अलग पहचान दिखाकर वोट मांगा गया हो। यह सिर्फ राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के साथ धोखा है। मतदाताओं को यह महसूस हुआ कि उनके वोट का उपयोग सत्ता प्राप्ति के लिए किया गया, न कि सच्चे बदलाव के लिए।

हारने वाले भी खामोश
चुनाव हारने वाले उम्मीदवारों से भी उम्मीद थी कि वे जनकपुरधाम की समस्याओं पर नजर बनाए रखेंगे, जनदबाव बनाएंगे, और विकास की प्रक्रिया में भागीदार रहेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हार के बाद अधिकतर उम्मीदवार राजनीति से लगभग गायब हो गए। न कोई प्रेस विज्ञप्ति, न कोई जनसभा, न ही कोई जनहित याचिका—एक तरह की राजनीतिक चुप्पी छा गई।
यह चुप्पी सिर्फ व्यक्तिगत निराशा नहीं,बल्कि लोकतंत्र की जिम्मेदारी से पलायन है। जनता को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या वे लोग चुनाव सिर्फ सत्ता पाने के लिए लड़ रहे थे?

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विकास की अनदेखी हकीकत
जनकपुरधाम एक ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर है। रामायण से लेकर मिथिला संस्कृति तक, इस नगर की विरासत अत्यंत महत्वपूर्ण है। परंतु जब बात आधुनिक विकास की आती है, तो शहर की हालत निराशाजनक है।
सड़कें टूटी हैं, नालियां जाम हैं, कचरा प्रबंधन अस्त-व्यस्त है, और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर नगण्य हैं। पर्यटन की असीम संभावनाओं के बावजूद न कोई दीर्घकालिक योजना है, न ही कार्यान्वयन की इच्छाशक्ति।
नगर निगम की बैठकों, योजनाओं या खर्च के बारे में जनता को जानकारी नहीं होती, जिससे पारदर्शिता के सारे वादे खोखले प्रतीत होते हैं।

जागरूकता ही है असली ताकत
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को बदलने का सबसे प्रभावी हथियार है—जनता की जागरूकता। जब तक मतदाता यह नहीं समझेंगे कि उनका वोट केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है, तब तक परिवर्तन मुश्किल है।
मतदान से पहले भाषणों और वादों की गहराई को परखना, और जीतने के बाद नेताओं की जवाबदेही तय करना अब मतदाता की प्राथमिकता होनी चाहिए। केवल चुनाव के दौरान जागने और फिर पांच साल तक सो जाने की आदत को छोड़ना होगा।

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अब ज़रूरत है राजनीतिक शुद्धता की
जनकपुरधाम को अगर वास्तव में स्मार्ट सिटी या समृद्ध नगर बनाना है, तो सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, राजनीतिक सोच और व्यवहार को भी आधुनिक बनाना होगा। यह ज़रूरी है कि नेता अपने वादों को केवल प्रचार का साधन न बनाएं, बल्कि उन्हें कार्य में परिणत करें।
दल बदल, निष्क्रियता और मौन समर्थन की जगह अब ज़िम्मेदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही की राजनीति होनी चाहिए। विकास भाषणों से नहीं, काम से होता है।

जनकपुरधाम का निर्वाचन २०७९ जनता के लिए उम्मीदों की एक नई किरण लेकर आया था। लेकिन आज, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वादों और हकीकत के बीच की खाई साफ़ नज़र आती है। यह खाई तब तक पाटी नहीं जा सकती, जब तक जनता खुद जागरूक न हो जाए।
राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का मंच मानने की सोच जितनी जल्दी विकसित होगी, उतनी जल्दी शहर के हालात बदलेंगे। अब समय है कि हम वादों से नहीं, परिणामों से नेताओं को परखें।

कैलास दास
जनकप्रधाम

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