शब्द, बसन्त :अनिल कुमार मिश्र की दो कवितायें
शब्द
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कविताओं में गढ़े हुए
जो शब्द हैं
रोते, गाते हैं
सुनना तो सीखो।
कह रहे कई बातें अनजानी
कुछ बातें जीवन से बेमानी
धीमे धीमे,सहम सहम कर बोल रहे हैं
सब पाठक को
सुनना सीखो।
गरज रहे कुछ शब्द
और कुछ डरे हुए हैं
कुछ धीमे से मुस्काते हैं
हृदय खोलकर
सुनना सीखो।
चुभते हैं कुछ शब्द व्यवस्था को,विधि को
क्यों चुभते हैं
मंथन कर के शब्द शब्द की गणना सीखो
हड़बड़-हड़बड़ पढ़ो नहीं
तुम सुनना सीखो
शब्द ही अमृत,शब्द ही विष हैं
कभी विष अमृत है,अमृत विष है
शब्द के तल में डूब-डूब कर
पढ़ना सीखो
शब्द जो कहना चाह रहे हैं
सुनना सीखो।
सृजन नहीं करता है कभी कवि
बेचैनी के आमंत्रण को
शांत चित्त और शुद्ध हृदय से
शब्द-शब्द के बंधन को
तुम गिनना सीखो
इनके भीतर से आवाज़ आ रही
सुनना सीखो।
सुनना सीखो।
–अनिल कुमार मिश्र,राँची,झारखंड,भारत।
बसंत
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हँसते,गाते
थोड़ा मुस्काते
तुम फिर आना
जीवन में बसंत!
लेकर आना
खुशियाँ सारी
जो लुप्त हो गयीं
ऋतु-चक्र में
करके
आकुल-व्याकुल
उन सबको संजोकर
फिर से तुम लाना
मेरे घर
ऐ बसंत!
तुम फिर आना
जीवन में
बसंत!
-अनिल कुमार मिश्र,राँची,झारखंड,भारत।

