काफ़िला लूटने वाले : वसन्त लोहनी
काफ़िला लूटने वाले : वसन्त लोहनी
शिकायत किसी से नहीं —
न काफ़िला लूटने वालों से,
न लुटाने वालों से,
न लूट का नेतृत्व करने वालों से,
न लुटेरों को रफ़ा-दफ़ा करने वालों से।
शिकायत सिर्फ़ अपने आप से है —
कि निकम्मों को सत्ता में दाख़िला दिया।
नहीं… नहीं —
दुख इस बात का है कि
बिल्ली को दूध की रखवाली सौंपी,
और लुटेरों को सिंहासन पर बैठाया।
चंबल घाटी के डाकुओं में
फिर भी कोई उसूल तो थे।
इन लुटेरों में तो वह भी नहीं।
गहरी पीड़ा से गुज़र रहा हूँ —
क्या कहूँ गुज़रे हुए कल के बारे में?
लूट से कहीं ज़्यादा
एक लंबा लम्हा बर्बाद हुआ।
और अब —
आने वाला कल भी
विक्षिप्त नज़र आता है।


