भारतीय ज्ञान परंपरा में योग : प्रो. मनीषा शर्मा
प्रो मनीषा शर्मा, हिमालिनी अंक जून 025। भारतीय ज्ञान परंपरा में योग एक अद्भुत अनुभव है और भारतीय ज्ञान का एक ऐसा वरदान है जिसने भारत को विश्व में एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया । दुनिया के अनेक देश योग के बहाने भारत के साथ जुड़े और उन्होंने भारतबोध का अनुभव किया । भारतीय संस्कृति जो वैश्विक शांति और सद्भाव की प्रचारक है, योग के द्वारा उसने एक बार फिर संपूर्ण विश्व को हमारी और नतमस्तक किया है । विश्व में फैली कोरोना जैसी भीषण महामारी में भारतीय योग और आयुर्वेद का लोहा सम्पूर्ण विश्व ने माना । योग धार्मिक कर्मकांड नहीं है बल्कि विज्ञान है जिससे मनुष्य का मन और जीवन स्वस्थ रहता है । योग एक वैज्ञानिक पद्धति है जिससे व्यक्ति के अंदर जीवंतता सदैव बनी रहती है । योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने के बाद से सारी दुनिया भारत की ओर देख रही है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २८ जून २०१५ में आकाशवाणी पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम के तहत देशवासियों को संबोधित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर पहली बार विस्तार से चर्चा की और कहा कि पूरी दुनिया ने योग को अपनाया यह भारत के लिए गर्व की बात है । योग ने पूरी दुनिया को आपस में जोड़ा । वर्तमान में मनुष्य का मन बहुत ही अशांत है । चारों ओर हिंसा, आतंकवाद और अशांति का वातावरण है । ऐसी विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों में यदि मनुष्य को शांति और सुकून चाहिए तो वह योग अभ्यास कर अपने मन पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है और अपने अव चेतन को शांति के तल पर ले जाकर मन में हो रहे निरंतर बदलाव और टकराव को टाल सकता है । कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और मस्तिष्क निवास करता है अतः योग मन को शक्ति देता है और शांति भी ।
योग विज्ञान पर आधारित एक अध्यात्मिक विषय है जो मन और शरीर के मध्य सामंजस्य पर ध्यान देता है । योग स्वस्थ जीवन यापन करने की कला और विज्ञान है । योग शब्द संस्कृत की युज धातु से बना है जिसका अर्थ जोड़ना या एकजुट होना या शामिल होना है । डी.वीं.बासावर ईश्वर,योग इसकी उत्पत्ति इतिहास एवम विकास में लिखते है कि “आधुनिक वैज्ञानिको के अनुसार ब्रह्मांड की हर चीज इस परिमाण नाभिकीय अभिव्यक्ति मात्र है जो भी अस्तित्व की इस एकता को महसूस कर लेता है उसे योग में स्थित कहा जाता है और उसे योगी के रूप में पुकारा जाता है । जिसने मुक्त अवस्था प्राप्त कर ली है जिससे मुक्ति निर्माण या फिर मोक्ष कहा जाता है । इस प्रकार योग का लक्ष्य आत्म अनुभूति कर सभी प्रकार के कष्टों से निजात पाना है जिससे मोक्ष की अवस्था या कैवल्य अवस्था प्राप्त होती है ।”
योग को बड़े पैमाने पर सिंधु सरस्वती घाटी सभ्यता जिसका इतिहास २७०० ईसा पूर्व से है, के अमर सांस्कृतिक परिणाम के रूप में बड़े पैमाने पर माना जाता है ।माना जाता है कि जब से मानव सभ्यता प्रारंभ हुई तभी से योग का अस्तित्व है । हजारों साल पहले इसकी उत्पत्ति हुई । योग विद्या में शिव को आदियोगी या पहले गुरु के रूप में माना जाता है । भारतवर्ष में भारत की सनातन संस्कृति में हजारों साल पहले ऋषि– मुनि आदि अपने ज्ञान को योग के माध्यम से बल प्रदान करते थे । माना जाता है आदियोगी ने इस ज्ञान को प्रसिद्ध सप्त ऋषियों को प्रदान किया था । सप्तर्षियों ने योग के इस ताकतवर विज्ञान को एशिया, मध्य पूर्व उत्तरी अफ्रीका,दक्षिण अमेरिका सहित विश्व के भिन्न–भिन्न भागों में पहुंचाया । रोचक बात यह है कि आधुनिक विद्वानों ने पूरी दुनिया में प्राचीन संस्कृतियों के बीच पाए गए घनिष्ठ संबंधो को नोट किया है । तदापि भारत में ही योग ने अपनी सबसे पूर्ण अभिव्यक्ति प्राप्त की । अगस्तय नामक सप्त ऋषि जिन्होंने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया, ने यौगिक तरीके से जीवन जीने के इर्द–गिर्द योग संस्कृति को जड़ा ।
योग करते हुए पितरों के साथ सिंधु सरस्वती घाटी सभ्यता के अनेक जीवाश्म अवशेष और मोहरे भारत में योग की मौजूदगी का संकेत देती है । देवी मां की मूर्तियों के मोहरे लैंगिक प्रत्येक तंत्र योग का सुझाव देते हैं । भारत की लोक परंपराओं, सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक उपनिषदों की विरासत, जैन और बौद्ध परंपरा, दर्शन, महाभारत, रामायण महाकाव्य, शिव और वैष्णव की आस्तिक परंपरा और तांत्रिक परंपराओं में हम योग की उपस्थिति देख सकते हैं । वैदिक काल में हमने सूर्य को सबसे ज्यादा महत्व दिया । इसी प्रभाव के कारण सूर्य नमस्कार का आविष्कार हुआ । प्राणायाम दैनिक संस्कार का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है ।
वैदिक काल में योग सूत्रों के माध्यम से महर्षि पतंजलि ने योग से संबंधित ज्ञान को व्यवस्थित और लिपिबद्ध किया । उनके बाद अनेक योगाचार्य और ऋषियों ने इसको विकसित किया । अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य देखे गए जो बताते हैं कि सूर्य नमस्कार वैदिक काल से किया जा रहा है । भगवत गीता आदि पर लिखी कई टिकाएं अस्तित्व में आई । भगवत गीता में इसका स्पष्ट स्पष्टीकरण मिलता है जिसमें ज्ञान योग, भक्ति, योग, कर्म, योग की संकल्पना को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है । ८०० से १७०० ई के बीच में महान आचार्य आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माधवाचार्य के उपदेश प्रमुख थे । इसी दौरान हठ योग परंपरा के नाथ योगी जैसे मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ,गौरंगी नाथ, घिरांडा श्रीनिवास भट्ट आदि ने हठ योग की परंपरा को लोकप्रिय बनाया ।
अगस्तय ऋषि के बहुत बाद २००० वर्ष पूर्व हिमालय के पूर्व और पश्चिम में भी, भारत से संपूर्ण एशिया में योग विज्ञान का प्रसार हुआ । जब बौद्ध धर्म जापान,तिब्बत पहुंचा तब उसके साथ योग भी वहां पहुंचा । आधुनिक चीन के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक चीनी राजनीतिक,लेखक व विद्वान हू शिह ने चीन का भारतीयकरण शीर्षक से लिखे गए एक निबंध में कहा है कि “भारत ने सीमा के पर एक भी सैनिक भेजे बिना सांस्कृतिक रूप से चीन पर विजय प्राप्त की और २००० वर्षों तक उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित रखा । ”यह बात सिर्फ चीन, जापान, तिब्बत और दक्षिण पूर्व एशिया की नहीं है । विद्वानों ने समरकंद, बुखारा और आगे स्लाव जाति के क्षेत्र में भी इस योग और तंत्र के पहुंचने के चिन्ह खोज निकाले हैं ।
आज योग विश्व भर में प्रचलित है, लोकप्रिय है । अमेरिका के लगभग हर शहर में एक योग केंद्र है । यही हाल यूरोप में है । मध्य एशिया में योग का प्रसार १००० वर्ष तक निरंतर जारी रहा । वर्तमान दौड़ में योग में रुचि आसनों के माध्यम से व्यक्तिगत कल्याण पर केंद्रित है । वैज्ञानिकों और न्यूरोसाइंसटो के लिए आत्म चेतना एक रहस्य है । हिमालय के उस पार योग का प्रसार शिव की पूजा के रूप में हुआ । जिसके साथ बौद्ध पथ भी जुड़ा हुआ था । हिंदू मान्यता से थोड़ा अलग जिसमें आत्मा की सर्वोच्चता स्पष्ट रूप से स्थापित है,बौद्ध पंथ मन पर जोर देता है ।। मध्यकालीन इंडोनेशिया साहित्य बुद्ध को शिव और जनार्दन( विष्णु) के तुल्य कहता है ।
योगसूत्र योग का प्रमुख ग्रन्थ है ।महर्षि पतंजलि ने लगभग ४०० ईसा पूर्व योगसूत्र को लिखा था । योग सूत्र को योग के दर्शन और अभ्यास पर केंद्रित एक प्रमुख और आधिकारिक ग्रंथ माना जाता है । योग सूत्र योग के आठ अंगों के विषय में बताता हैं । यह आठ यंग हमें योगमय तरीके से जीवन जीना सिखाते हैं । सूत्र का अर्थ है धागा जो सूत्रों के बीच संबंधों का वर्णन करता है । यह आपस में जुड़े हुए हैं या फिर एक धागे से बंधे हुए हैं । योग सूत्र में लिखित १९६ सूत्र चार अध्याय में विभाजित है ।ये इन चार अध्यायों के माध्यम से ज्ञान और आत्म साक्षात्कार प्राप्त करने हेतु मार्गदर्शन करते हैं । यह चार अध्याय है –
१. समाधि
२. साधना
३. विभूति
४. कैवल्य
योग सूत्र की अनेक व्याख्या वर्तमान में उपलब्ध है जो बहुत गहन है और व्यावहारिक भी ।
वर्तमान में योग एक लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण अभ्यास है जिससे भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण वैश्विक समुदाय स्वास्थ्य व कल्याण की प्राप्ति कर रहा है । योग जीवन की अवधारणा को सजीवता व जीवंतता से अभिव्यक्ति प्रदान करता है अतः भारतीय ज्ञान परंपरा में योग दर्शन का महत्वपूर्ण स्थान है ।
प्रो मनीषा शर्मा, पूर्व अधिष्ठाता एवं विभागाध्यक्ष पत्रकारिता और जनसंचार
इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय जजा विवि.
अमरकंटक, मप्र

