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योग और आयुर्वेदः समग्र स्वास्थ्य संजीवनी ज्योतिर्वैद्य आचार्यचन्द्रशेखर शास्त्री

 

आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री, हिमालिनी, अंक जून 025 ।

सनातन संस्कृति विश्व कल्याण की संस्कृति है । जिसका उद्देश्य मनुष्य ही नहीं, अपितु प्राणीमात्र का हित है । ऋषियों ने स्वास्थ्य को प्राथमिकता की विषयवस्तु स्वीकारते हुए सबके सुख की कामना की है । मानव सभ्यता के आरंभ से ही यहां सर्वजन हिताय की परंपरा रही है । इसी कारण सनातन के सभी शास्त्र सबके निरामय की बात कहते हैं । हमारी नित्य प्रार्थनाओं में कहा जाता है कि –

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।।

क्योंकि सबसे पहला सुख निरोगी काया ही कहा गया है । इसीलिए अथर्ववेद से ऋग्वेद तक स्वास्थ्य के सूत्रमंत्र और ऋचाएं मिलती हैं । आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद कहा जाता है । अथर्ववेद ही मूल वेद है और वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) इसी के भाग हैं ।
जैसे नदी के दो किनारे जल के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं और प्रवाह को गति प्रदान करते हैं, वैसे ही योग और आयुर्वेद रूपी किनारे जीव के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य को नियंत्रित करते हैं । जिसके प्रभाव से मनुष्य स्वयं, परिवार और समाज के स्वस्थ प्रवाह को गति मिलती है और राष्ट्र प्रगति करता है । योग और आयुर्वेद का उद्देश्य मनुष्य को समग्र रूप से स्वस्थ रखना है । समग्र स्वास्थ्य का अर्थ है शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को संतुलित करना । जिससे मानव सम्पूर्ण मानव होने की ओर अग्रसर हो । शरीर की गतिविधियां स्वस्थ हों, उचित पोषण हो, समयानुकूल निद्रा हो और रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो, मनोदशा पर नियन्त्रण हो, तनाव प्रबन्धित हो और संचेतना की वृद्धि हो । देखा गया है कि समग्र रूप से स्वस्थ व्यक्ति का व्यक्तित्व समाज के प्रति संतुष्ट और लोक कल्याणकारी होता है ।
योग–

योग शब्द की उत्पत्ति युज् धातु से हुई है । महर्षि पाणिनि ने व्याकरण की दृष्टि से इसे तीन प्रकार से प्रयोग किया है ।
प्रथम– युज् समाधौ (दिवादिगण)– जिसका अर्थ है समाधि के लिए सिद्धि से जुडनÞा । साधनाओं को जीवन में उतारना ।
द्वितीय– युज् योगे (रुधादिगण)– जिसका सामान्य अर्थ है मिलना, जुड़ना, जोड़ना । दुःख रूपी संसार से वियोग और ईश्वर से संयोग । इसी को भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट करते हुए कहा था –
तं विद्याद्दुःख संयोग वियोग योग संज्ञितम् ।।
तृतीय – युज् संयमने (चुरादिगण)– जिसका तात्पर्य है मन का नियमन, संयम अथवा मन पर नियंत्रण प्राप्त करके आत्मा का परमात्मा से मिलन करना ।
महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है कि
अयं तु परमो धर्मो यत्योगेनात्मदर्शनम् ।।
अर्थात् जिस साधना द्वारा आत्मदर्शन और ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, वह योगशास्त्र है । योग साधना से न केवल शारीरिक शक्तियों का विकास होता है, अपितु निरोगता पूर्वक जीवन जीने की कला प्राप्त होती है । श्वेताश्वरोपनिषद कहता है कि
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः ।
प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ।।
अर्थात् जिस मनुष्य ने योगरूपी अग्नि से अपने शरीर को तपा लिया, वह रोग, वृद्धावस्था और अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है ।
वर्तमान में तनाव भरे जीवन में योग के प्रयोग मानसिक रोगों का महत्वपूर्ण निदान है । योग द्वारा चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण करने की कला का विकास होता है, जिससे मन स्वस्थ रहता है । मन के स्वस्थ होने से शरीर की ऊर्जाएं सुव्यवस्थित होती हैं और ईष्र्या, घृणा, असंतुष्टि, क्रोध, सशंकित रहने की प्रवृत्ति, कटुता, द्वेषभाव के कारण शरीर दुर्विचारों से दूषित नहीं होता है । रक्त विषयुक्त नहीं होता है, जिस कारण ओजस्विता निरंतर बढ़ती है और तनाव रहित होने से मानसिक एकाग्रता की वृद्धि होती है । क्योंकि मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारक होता है । अतः योग के आध्यात्मिक प्रभावों से तत्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है । ऐसा होने पर परिवार में शान्ति और समृद्धि की वृद्धि होती है । नकारात्मक चिंतन नष्ट होने लगता है, जो व्यक्ति को समाज में सुसभ्य मानवों की श्रेणी में ला खड़ा करता है और मनुष्य को नैतिकता से जोड़ता हुआ उसके आचरण से असभ्यता के लक्षण नष्ट कर देता है ।

आयुर्वेद–
आयुर्वेद शब्द की निरुक्ति है आयुषो वेदः अर्थात् यह आयु का वेद है । चैतन्य की स्थिति को आयु कहा गया है । अमरकोष में इसे जीवित काल कहा गया है । चरक संहिता में इसे शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग कहा गया है । वस्तुतः आयुर्वेद,आयुः+वेद, इन दो शब्दों के संयोग से बना है । आयुर्वेद में वेद शब्द विद् ज्ञाने धातु से बना है । जिसका अर्थ है ज्ञान, विचार और प्राप्ति । जिससे अस्तित्व का बोध हो सके, वह ज्ञान वेद कहलाता है । अतः जिस शास्त्र में आयु का ज्ञान हो, अस्तित्व हो, आयु की प्राप्ति हो, रोगरहित जीवन की अवस्था प्राप्त हो, वह आयुर्वेद कहलाता है । महर्षि चरक के अनुसार –
तत्र आयुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्यनर्थान्तरम् ।।
अर्थात् शाखा, विद्या, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण, और तन्त्र आयुर्वेद के पर्याय है । जो शास्त्र हितायु, अहितायु, सुखायु और दुःखायु का ज्ञान प्रदान करे, सभी आयु संबन्धी और स्वास्थ्यवर्धक उपचारों और प्रयोगों का ज्ञान देने वाला, शरीर रचना और पथ्य अपथ्य की जानकारी देने वाला, साध्य और असाध्य रोगों की भी चिकित्सा करने वाला शास्त्र है, वह आयुर्वेद है । महर्षि वाग्भट कहते हैं कि–

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आयुकामयमानेन धर्मार्थसुखसाधनम् ।
आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः ।।

अर्थात् आयुर्वेद शास्त्र का ज्ञान पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है । जीवन को आरोग्यमय कर देता है । क्योंकि रोगी व्यक्ति न तो धार्मिक क्रियाएं कर सकता है, न धनार्जन कर सकता है, न आजीविका व्यवस्थित कर सकता है, न सुख सुविधाओं का आनन्द ले सकता है, न मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है और उसका जीवन कठिन परिस्थियों से घिर जाता है । लेकिन आयुर्वेद की शरण में गया मनुष्य न केवल पुरुषार्थों की प्राप्ति कर सकता है, अपितु आरोग्यमय जीवन की भी प्राप्ति करता है । क्योकि आयुर्वेद जीवन देने वाला शास्त्र है । इसलिए पुण्य से परिपूर्ण है ।
योग और आयुर्वेद में अनेक समानताएं हैं । योग से मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है और आयुर्वेद योग से युति करे तो यह औषधियों के द्वारा उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति कराता है । योग छोटे स्थान पर भी किया जा सकता है और आयुर्वेद की औषधियां सहजता से प्राप्त हो जाती हैं ।

योग और आयुर्वेद का संबंध
योग और आयुर्वेद दोनों, प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपराएं हैं जो शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य की वृद्धि के लिए महान् उपयोगी हैं । जीवन को प्रकाशित करने वाली ये दोनों विद्याएं प्रायशः एक सी लगती हैं । जिनके नियमित सेवन से शरीर निरोग रहता है और कर्मशीलता के प्रति जाग्रत होता है । तनाव नष्ट होता है और स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन, स्वस्थ इन्द्रियां मानव जीवन को सुख की ओर अग्रसर करती हैं । योग और आयुर्वेद के सायुज्य से व्याधियों का संहार हो जाता है । योग आत्मा और मन का पोषक होकर शरीर को प्रकाशित करता है और आयुर्वेद मन व शरीर के असंतुलन को नष्ट करके मानव को रोगमुक्त करता है । योग और आयुर्वेद में अद्भुत समानता हैं, इन दोनों के सेवन से व्यक्ति को रोगमुक्ति तो प्राप्त होती ही है, साथ ही भौतिक जीवन में आध्यात्मिक अस्तित्व का ज्ञान होने से वह आत्म साक्षात्कार कर सकता है और ज्ञान की उच्चतम अवस्था को प्राप्त हो सकता है । योग प्राण का वह स्फुरण है, जो आत्म विकास की परमोच्च अवस्था उत्पन्न करता है और आयुर्वेद उसकी उपचारात्मक शक्ति है । जो शरीर के विकास के लिए जीवन की प्रणालियों को सुदृढ़ कर देती है । योग और आयुर्वेद, दोनों ईश्वरीय ज्ञान हैं । योग का ज्ञान आदि योगी परम पिता शिव से ऋषिमार्ग से मानव तक पहुंचा और आयुर्वेद का विस्तार ब्रह्मा के द्वारा ऋषियों को प्रदान की गई ज्ञान परंपरा से हुआ । योग और आयुर्वेद को वैदिक ज्ञान वृक्ष की दो शाखाओं के रूप में स्वीकार किया गया है । जिसकी जड़ों को ऋषियों ने वेदों के गहन अध्ययन और विज्ञान प्रयोगों के अभ्यास से सींचा है । यह गहन ज्ञान शरीर, मन और आत्मा को स्वस्थ करने के लिए संयुक्त रूप से कार्य करे तो निश्चय ही कल्याणकारी है । वस्तुतः सनातन परंपरा की सभी ज्ञान और अभ्यास प्रक्रियाएं मनुष्य को पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती हैं और उसके कल्याण के लिए सतत निरंतर कार्य करती हैं । योग और आयुर्वेद भी ईश्वर की वही कल्याणकारी वैदिक व्यवस्था है, जिसे ऋषियों ने हम तक पहुचाया है । इस प्रकार योग और आयुर्वेद श्वास प्रश्वास से आहार और प्रकृति सान्निध्य से औषधि प्रयोग तक मनुष्य को समग्र रूप से स्वस्थ रखने का कार्य करते हैं । इन दोनों के सायुज्य से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है । शरीर के सब चक्र अपने उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं । शरीर की सब नाडियां शुद्ध हो जाती हैं । पंच कोष शोष, कुंडलिनी शक्ति सहित समग्र कल्याण का मार्ग खुल जाता है । भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में आत्मा के उद्धार का उपदेश करते हुए कहा है कि

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मना ।।

अर्थात् मनुष्य को स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए और पतन के मार्ग से दूर हो जाना चाहिए । क्योंकि वह स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही शत्रु है । गीता के इस उपदेश का पालन करने के लिए सर्वप्रथम शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है और स्वस्थ शरीर में आत्मा और मन भी स्वस्थ रहें, उसके लिए ज्ञान और कर्म का आश्रय लेना चाहिए । क्योंकि शरीर ही धर्म का प्रथम साधन है ।
योग और आयुर्वेद के प्रयोगों के नामों में भी समानता स्पष्ट करती है कि दोनों का लक्ष्य एक ही है ।
योग के आठ अंग कहे गए हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहा जाता है । आयुर्वेद के भी आठ अंग कहे गए हैं, जिन्हें अष्टांग आयुर्वेद कहा जाता है ।
योग में त्रिगुण– सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के संतुलन के लिए कार्य किया जाता है तो आयुर्वेद में त्रिदोष– वात, पित्त कफ के संतुलन के लिए कार्य किया जाता है ।
योग में षट्कर्मों का उल्लेख है

धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिः लौकिकी त्राटकं तथा ।
कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ।।
आयुर्वेद में पंचकर्म को प्रश्रय दिया गया है ।
वमनं रेचनं नस्यं निरुहस्चानुवासनम् ।
एतानि पञ्चकर्माणि कथितानि मुनीश्वरैः ।।

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योग में आसनों को स्थान दिया गया है तो आयुर्वेद में व्यायाम को प्रश्रय दिया गया है । आसन और व्यायाम परस्पर आश्रित हैं ।
योग में प्राणायाम को प्राण शोधक कहा गया है, जबकि आयुर्वेद में पञ्च प्राण की अवधारणा है ।
योग और आयुर्वेद, दोनों ही ध्यान, धारण और समाधि पर साक्वयता रखते है और दोनों ही पंचमहाभूत के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं ।
वस्तुतः योग और आयुर्वेद की चिकित्सा अवधारणाएं शास्त्रों के वचन यत्पिण्डे तत्ब्रह्माण्डे के सूक्ष्म विवेचन पर आधारित हैं । समस्त ब्रह्माण्ड में जो ग्रह नक्षत्रों की ऊर्जा जगत् को प्रकाशित कर रही है, वही देह को भी प्रकाशित कर रही है । देश भी एक पिण्ड होने के कारण ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं से परिपूर्ण है । देह और ब्रह्माण्ड सूर्य से संचालित हैं । वह बाह्य जगत् में सर्वोत्पादक है और देह में प्राण स्वरूप आत्मा का कारक । वेदों ने सूर्य को जगत् की आत्मा कहा गया है । वेदों ने तीन प्रकार के रोग कहे हैं– दैहिक, दैविक और भैतिक । जिनके उपचारों की प्रशस्ति भी तीन प्रकार की है । – सत्वावजय, युक्तिव्यापाश्रय और दैवव्यापाश्रय । क्योंकि योग और आयुर्वेद दोनों का जन्म वेदों से हुआ है, इसलिए इन दोनों के सायुज्य से लोक कल्याण की साधना संभव है ।

अष्टांग योग
पातंजल योग दर्शन में योग के आठ अंग कहे गए हैं, जिन्हें अष्टांग योग भी कहा जाता है । इस अष्टांग योग के अनुष्ठान से चित्त की शुद्धि होती है । विवेक जाग्रत होता है । ज्ञान का प्रकाश अन्तस को प्रकाशित करता है । यह जीवन को अनुशासित करता है । यह बहिरंग योग और अन्तरंग योग, दोनों को समाहित करता है । इसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार बहिरंग योग हैं और धारणा, ध्यान व समाधि अंतरंग योग कहाते हैं । योग के इन आठ अंगों का अञ्जयास मनुष्य को आन्तरिक और बाह्य रूप से न केवल शुद्ध और स्वस्थ करता है, अपितु उसकी मेधा इतनी प्रखर हो जाती है कि वह संसार को चमत्कृत कर सकता है । इनके अभ्यास से मनुष्य जगत् को प्रकाशित करने की क्षमता से परिपूर्ण हो जाता है और शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास प्राप्त कर सकता है ।

अष्टांग योग के आठ अंग हैं ।–
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ।

१. यमः अष्टांग योग का पहला अंग यम है । यक्वयते नियक्वयते चि इति यमः । यह अवांछनीय कार्यों से मुञ्चित दिलाता है, इसलिए यम कहलाता है । कायिक, मानसिक और वाचिक संयम का अञ्जयास यम के द्वारा संभव है । यम पांच हैं– अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह । अहिंसा के प्रभाव से मन, कर्म और वचन से मनुष्य द्वेष और शत्रुता से मुञ्चत हो जाता है । वह न स्वयं हिंसा का विचार करता है, न किसी को हिंसा के लिए प्रेरित करता है, न किसी को हिंसा के लिए अनुमोदित करता है । सत्य का आचरण करता है, मन और वाणी एकरस हो जाते हैं । अस्तेय से मन कर्म वचन से परद्रव्य के प्रति लालसा की प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है । ब्रह्चर्य की प्रतिष्ठा होने पर तेजस्वी और अपरिमित शक्ति को प्राप्त हो जाता है और अपरिग्रह द्वारा वह भोग साधन से मुञ्चत हो जाता है । इस प्रकार यम का पालन करने वाला साधक सहज भाव को प्राप्त होता है तो रोग स्वयं ही दूर हो जाते हैं और मानव आनन्द को प्राप्त हो जाता है ।

२. नियमः नियम भी पांच ही हैं । शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान नियम कहे गए हैं । शौच अर्थात् शुद्धि, पवित्रता । जिसमें बाह्य और आंतरिक शुद्धि करने का नियम है । शरीरिक शुद्धि और वाचिक शुद्धि बाह्य शुद्धि है और मानसिक शुद्धि आन्तरिक शुद्धि है । शुद्ध मन और शुद्ध तन में कोई रोग नहीं पनप सकेगा । संतोष प्राप्त होने पर मनुष्य जीवन के उतार चढ़ावों से प्रभावित नहीं होता है और वह सुख दुःख में समान व्यवहार में रहता है । अन्तःकरण की सन्तुष्टि सन्तोष का लक्षण है । शुचिता और सन्तोष को तप के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है । उचित अभ्यास से शरीर, प्रण, इन्द्रियों और मन को नियन्त्रित करना तप है । जिसका सम्बन्ध स्वाध्याय से है । स्वाध्याय से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है । इन सबके साथ ईश्वर की शरणागत होना सभी कष्टों का निवारण कर देता है ।
३. आसनः आसन योग का तीसरे अंग है और इसमें विभिन्न शारीरिक मुद्राएं सम्मिलित हैं । जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की वृद्धि करती है । आसन की सिद्धि से सभी प्रकार के द्वंद अर्थात् शीत, गर्मी, भूख प्यास, हर्ष और विषाद का आघात नहीं होता है । यह समग्र स्वास्थ्य का लक्षण है ।

४. प्राणायामः प्राणायाम योग का चौथे अंग है और इसमें विभिन्न श्वास–प्रश्वास की तकनीकी का विशेष प्रयोग होता है, जो प्राण (जीवन ऊर्जा) को नियंत्रित करने में सहायक होता है । प्राणायाम का का कार्य वायवीय शञ्चित पर नियंत्रण पाना है । यह समस्त ब्रह्माण्ड वायु से परिपूर्ण है । प्राण का विस्तार तभी संभव है, जब श्वास प्रश्वास की गति पर नियंत्रण हो जाए । प्राणायाम की सिद्धि से धारणा की योग्यता उत्पन्न होती है ।

५. प्रत्याहारः प्रत्याहार योग का पंचम अंग है, इसमें इंद्रियों को नियंत्रित करने और उन्हें बाहरी वस्तुओं से हटाकर आंतरिक जागरूकता पर केंद्रित करने की प्रक्रिया सक्विमलित है । विषयमुञ्चत इंद्रियां चित्त की चंचलता, चपलता को नष्ट कर देती हैं ।

६. धारणाः मन को एक बिंदु पर केंद्रित करने की प्रक्रिया धारणा कहाती है । यह चित्त की स्थिरता का प्रतीक है और इसकी सिद्धि से ध्यान का मार्ग प्रशस्त होता है ।

७. ध्यानः ध्येय का निरन्तर मनन ही ध्यान है । गहन एकाग्रता और मन की स्थिरता की अवस्था ही ध्यान का लक्षण है, जहां व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव कर सकता है । ध्यान सिद्धि से अहंभाव नष्ट हो जाता है । जो पूर्ण निरोगता का प्रभाव उत्पन्न करता है ।

८. समाधिः योग के समस्त सूत्र अन्त में समाधि पर ही प्रगट होते हैं । यह साधना की चरम अवस्था है । इसमें द्वैतभाव भी नष्ट हो जाता है । यही जीवन काा परम उत्कर्ष होता है । मनुष्य पूर्ण आत्मजागरूकता से आत्म–साक्षात्कार को प्राप्त होता है ।

इस प्रकार योग के आठ अंग मनुष्य को पूर्ण स्वस्थ और जीवन के उत्कर्ष को प्राप्त कराने में सहायक सिद्ध होते हैँ ।

अष्टांग आयुर्वेद

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योग की भांति आयुर्वेद के भी आठ मुक्चय अंग हैं, जो आयुर्वेदिक चिकित्सा और स्वास्थ्य को समझने में सहायता करते हैं । ये आठ अंग हैं ।–
१. काय चिकित्साः चीयते प्रशस्तदोषधातुमलैः इति कायः । काय चिकित्सा अग्नि के संतुलन की चिकित्सा है । आयुर्वेद में अग्नि महत्वपूर्ण महाभूत है । जिसके उपयोग से शरीर की प्रत्येक कोशिका को शुद्ध करने की प्रकिया काय चिकित्सा है । शरीर में अग्नि संतुलन से त्रिदोष और सप्तधातु संतुलित होती हैं । इस विधि में ज्वर, रक्तपित्त, शोथ, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह और अतिसार आदि रोगों की औषधिप्रयोग द्वारा चिकित्सा की जाती है । आमाशय तथा पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले रोगों की शान्ति का उपाय किया जाता है । अतः कार्यचिकित्सा कहा जाता है ।
२. भूतविद्याः मानसिक रोगों की चिकित्सा में भूत विद्या की भूमिका महत्वपूर्ण है । आयुर्वेद में बैक्टीरिया और जीवाणुओं को राक्षस, पिशाच,असुर आदि नामों से पुकारा जाता है । हमारे शरीर में होने वाले अनेक रोग इन्हीं बैक्टीरिया और जीवाणुओं के कारणहोते हैं ।
३. शल्य चिकित्साः किसी शस्त्रााघात या चोट लगने या गंभीर घाव होने पर शल्य चिकित्सा की आश्यकता होती है । शल्य चिकित्सा आयुर्वेद का महत्वपूण अंग है जो जो शस्त्र आदि के द्वारा किया जाता है ।
४. शालाक्य तंत्रः गले और गले के ऊपर मौजूद सभी अंगों जैसे कि मुंह, नाक, कान, आंख आदि से जुड़ी समस्याओं का इलाज शालाक्य तंत्र के अंतर्गत किया जाता है । इसमें शलाका द्वारा चिकित्सा की जाती है ।
५. अगद तंत्रः विषों की परीक्षा और उसके दुष्प्रभावों की चिकित्सा अगद तंत्र के अंतर्गत आता है । आयुर्वेद के अनुसार विषाक्त पौधों और विषाक्त खनिज,जीव जंतुओं सांप–बिच्छू आदि के विष की चिकित्सा इस पद्धति से होती है ।
६. रसायन तंत्रः रस और धातुओं एवं शोधन के बिना शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता है इसलिए रसों और धातुओं का असंतुलन शरीर में जो रोग उत्पन्न करते हैं । जिनकी चिकित्सा रसायन तंत्र के अंतर्गत की जाती है ।
७. वाजीकरण तंत्रः शरीर के प्रजजन तंत्र के रोगों की चिकित्सा वाजीकरण चिकित्सा कहाती है । जिसके अन्तर्गत नपुंसकता आदि की चिकित्सा की जाती है, जो प्रजनन स्वास्थ्य और कामशक्ति को बढ़ाने से संबंधित है ।
८. कौमारभृत्यः कौमारभृत्य बाल चिकित्सा को कहा जाता है । जो बच्चों के रोगों की चिकित्सा से संबन्धित है ।
योग के षट्कर्म
१. नेतिः नेति नासिका के माध्यम से शरीर को शुद्ध करने की क्रिया है ।
२. धौतिः धौति उदर को शुद्ध करने की क्रिया है ।
३. नौलिः नौलि पेट की मांसपेशियों को शक्तिशाली बनाने और उदरशुद्धि की क्रिया है ।
४. वस्तिः वस्ति आंत्रशोधन की महत्वपूर्ण क्रिया है ।
५. कपालभातिः कपालभाति फुक्रफुस शुद्धि और प्राणशुद्धि की क्रिया है । यह शरीर को प्रकाशित करती है, रोगों को भस्म करती है और ललाट को कांतिमय करती है ।
६. त्राटकः त्राटक एकाग्रता और ध्यान की क्रिया है, जिसमें एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित किया जाता है ।
आयुर्वेद के पंचकर्म
१. वमनः वमन उदर को शुद्ध करने की क्रिया है, जिसमें पेट से विषाक्त पदार्थों को निकालने के लिए वमन कराया जाता है ।
२. विरेचन–ः विरेचन आंतों को शुद्ध करने की क्रिया है, जिसमें आंतों से विषाक्त पदार्थों को निकालने के लिए विरेचक औषधियों का प्रयोग किया जाता है ।
३. स्तिः बस्ति आंतों को शुद्ध करने की क्रया है, जिसमें आंतों में औषधीय पदार्थों आंत्रशोधन किया जाता है ।
४. नस्यः नासिका मार्ग से शरीर को शुद्ध करने की क्रिया है, जिसमें नाक में औषधीय पदार्थों को डाला जाता है ।
५. रक्तमोक्षणः रक्तमोक्षण रक्त को शुद्ध करने की क्रिया है, जिसमें शरीर से विषाक्त रक्त को निकालने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयोग किए जाते हैं

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