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मंत्री देश के हैं या किसी खास झुंड के ? बजट बंटवारे में पक्षपात पर सत्ता पक्ष के सांसदों का फूटा गुस्सा

 

क्या बजट लोकतांत्रिक प्रक्रिया और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर बन रहा है या महज चुनावी गणित और सत्ता समीकरणों का उपकरण बन चुका है?

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एक रिपोर्ट: नेपाल में चालू आर्थिक वर्ष के बजट पर संसद में चली बहस ने सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही असंतोष की परतें खोल दी हैं। नेपाली कांग्रेस और एमाले के सांसदों ने बजट में झापा, काठमाडौं, डडेल्धुरा और रुपन्देही जैसे सीमित जिलों पर अत्यधिक ध्यान दिए जाने को लेकर सरकार पर गहरा असंतोष जाहिर किया है। सांसदों का आरोप है कि बजट देशभर के लिए नहीं, बल्कि चुनिंदा मंत्रियों और नेताओं के क्षेत्रों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

“पांच जिलों के लिए है देश?”

कांग्रेस सांसद डॉ. सुनील शर्मा ने संसद में भावनात्मक ढंग से सवाल उठाया—”क्या केवल पांच जिलों में ही नेपाली नागरिक रहते हैं? क्या अन्य ७२ जिले नेपाल में नहीं आते?” उन्होंने प्रधानमंत्री और मंत्रियों पर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में बिना किसी औचित्य के भारी बजट आवंटित करने का आरोप लगाया और इसे “अघोषित ढंग से राज्य की लूट” कहा।

उनका कहना था कि जब सभी नागरिक बराबरी से कर देते हैं, तो बजट का भी निष्पक्ष वितरण होना चाहिए। उन्होंने तीखे लहजे में पूछा—”क्या आप देश के मंत्री हैं या किसी विशेष झुंड के?”

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कांग्रेस नेताओं के भीतर से ही उठा विरोध

कांग्रेस के ही सांसद कान्छाराम तामाङ ने सहरी विकासमंत्री प्रकाशमान सिंह को निशाने पर लेते हुए व्यंग्यात्मक धन्यवाद दिया कि “आपने काठमांडू के लिए 207 योजनाएं दीं, रामेछाप के लिए कुछ भी नहीं।” उन्होंने कहा कि ये मंत्री गणेशमान सिंह के पुत्र हैं, लेकिन आचरण पिता से मेल नहीं खाता। तामाङ ने देश को “डूबा हुआ” बताया और मांग की कि इस प्रकार की असमान बजट वितरण करने वाले उपप्रधानमंत्रियों को आगामी चुनाव में पराजित किया जाना चाहिए।

एमाले भी पीछे नहीं

एमाले सांसद सूर्य थापा ने प्रकाशमान सिंह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्हें बताया गया था कि सिंह गणेशमान के पुत्र हैं, लेकिन मंत्रालय के बजट को देखकर “इस पर संदेह होता है।” थापा ने सहरी विकास मंत्रालय को “सबसे अस्तव्यस्त और भ्रष्टाचारग्रस्त” मंत्रालय बताया।

अर्जुननरसिंह केसी की संसदीय समिति की मांग

कांग्रेस सांसद अर्जुननरसिंह केसी ने बजट में भारी अनियमितता और मनमानी वितरण का आरोप लगाते हुए एक संसदीय छानबीन समिति की मांग की। उन्होंने कहा कि बजट पारदर्शी और सन्तुलित होना चाहिए, लेकिन वर्तमान बजट में “गंभीर विचलन” है।

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स्वतंत्र सांसद अमरेश सिंह की तीखी टिप्पणी और उसका हंगामा

स्वतंत्र सांसद अमरेश सिंह ने जब यह कह डाला कि “अगर बजट सिर्फ पांच जिलों को ही मिलना है, तो बाकी ७२ जिलों को अमेरिका, चीन या भारत को लीज़ पर दे दिया जाए,” तो संसद में बवाल मच गया। एमाले प्रमुख सचेतक महेश बर्तौला ने इसे राष्ट्रविरोधी और देशद्रोही अभिव्यक्ति बताया और रेकॉर्ड से हटाने की मांग की। सभामुख देवराज घिमिरे ने तुरंत आदेश दिया कि सिंह का यह वक्तव्य संसद की कार्यवाही से हटाया जाए।

अमरेश सिंह ने इसका विरोध करते हुए कहा, “अगर बोलने की भी आज़ादी नहीं है, तो क्या संसद सिर्फ बजट पाने वालों के लिए है?” उन्होंने कहा कि सभामुख एमाले के इशारे पर काम कर रहे हैं।

समीक्षा

इस समूचे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि नेपाल की वर्तमान सत्ता संरचना में बजट के बहाने क्षेत्रीय असंतुलन और सत्ता का केंद्रीकरण गहराता जा रहा है। विडंबना यह है कि असंतोष विपक्ष से पहले सत्ता पक्ष के भीतर ही फूट रहा है। संसद में व्यक्त भावनाएं केवल व्यक्तिगत क्षेत्रवाद का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह जनता के प्रतिनिधित्व और समावेशी विकास की मूल भावना पर सवाल उठाती हैं।

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मुख्य सवाल यह है: क्या बजट लोकतांत्रिक प्रक्रिया और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर बन रहा है या महज चुनावी गणित और सत्ता समीकरणों का उपकरण बन चुका है?

सरकार के लिए यह केवल आलोचना नहीं, चेतावनी है कि यदि बजट पारदर्शी और न्यायपूर्ण नहीं बना, तो गठबंधन का आंतरिक संतुलन ही सबसे पहले बिगड़ेगा—जिसका परिणाम २०८४ का चुनाव स्पष्ट रूप से दे सकता है।बजट किसी पार्टी या गुट का नहीं, समूचे राष्ट्र का दस्तावेज होता है। सत्ता पक्ष को चाहिए कि वह संसदीय समिति की मांग को गंभीरता से ले और देश के प्रत्येक जिले व नागरिक को बराबरी का दर्जा दे, अन्यथा यह असंतोष राजनीतिक विस्फोट का रूप ले सकता है।

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