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अमरेश कुमार सिंह के बयान का मर्म न समझना ही असली झोलापन है : केशव झा

 

काठमांडू, 23 जून – नेपाली संसद में अमरेश कुमार सिंह द्वारा दिए गए एक व्यंग्यात्मक वक्तव्य को लेकर उठे विवाद पर अब उनके समर्थकों और समीपस्थ राजनीतिक धाराओं से तीखी प्रतिक्रियाएँ आने लगी हैं। वक्तव्य को तोड़मरोड़ कर पेश किए जाने पर आलोचना करते हुए विश्लेषक तथा राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के नेता जेशव झा ने  कहा गया है कि “बिरोधको लागि बिरोध” अर्थात् सिर्फ विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है।

क्या कहा था सांसद अमरेश कुमार सिंह ने ?

सिंह ने बजट के असमान वितरण पर कटाक्ष करते हुए कहा था –
“बजेट जति झापा, काठमाडौं, डडेल्धुरा जस्ता २/४ जिल्लामा मात्रै वितरण गर्ने हो भने अरु जिल्लालाई नेपालमा किन राख्नु पर्यो? बाँकी जिल्लालाई अमेरिका, भारत, चाइना जस्ता देशलाई लीजमा दिए भयो नि! तीनै चार पाँच जिल्लालाई नेपाल भने भयो नि!”

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इस कथन का मूल आशय, उनके समर्थन में उठी आवाजों के अनुसार, नेपाल सरकार द्वारा बजट वितरण में क्षेत्रीय असमानता की आलोचना करना था। उनका कहना था कि बजट को समानुपातिक रूप से पूरे देश में बाँटना चाहिए, न कि सिर्फ खास जिलों में। अपने वक्तव्यों में श्री झा ने यह उल्लेख किया है ।

“लीज” शब्द को लेकर हुआ विवाद

बयान के “लीजमा दिए भयो” अंश को कुछ राजनीतिक दलों और विश्लेषकों ने देश की संप्रभुता पर चोट और राष्ट्रविरोधी अभिव्यक्ति के रूप में व्याख्या किया। इस पर पलटवार करते हुए यह तर्क दिया गया है कि यह एक सामान्य राजनीतिक व्यंग्य था, जिसे जानबूझकर तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया।

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एक समीक्षक ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
“यत्तिको भाषिक व्यङ्ग्य पनि नचल्ने, नबुझ्ने र यत्तिकै देशद्रोही बनाइदिने होड़मा लागेछौं।”
उन्होंने कहा कि यह ठीक उसी तरह है जैसे कोई माँ अपने निकम्मे बेटे से गुस्से में कह दे, “डाडूको पानीमा डुबेर मर” – और बेटा इसे आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में पुलिस में रिपोर्ट कर दे।

राजनीति में अतिराष्ट्रवाद की होड़ पर चिंता

बयान के समर्थन में उठे स्वर यह भी कहते हैं कि हर बात में उग्र राष्ट्रवादी भावना ठोकना जरूरी नहीं है। किसी वक्तव्य की गहराई और सन्दर्भ समझे बिना सिर्फ सतही शब्दों के आधार पर राष्ट्रद्रोह का तमगा चिपकाना लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरनाक प्रवृत्ति है।

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“बजेट सबको मिले” – यही था उद्देश्य

अंत में यह कहा गया है कि सांसद अमरेश सिंह की मंशा बजट के न्यायपूर्ण और समान वितरण की माँग करना मात्र थी। इसे देश की अखंडता और स्वाभिमान पर हमले के रूप में देखना या दिखाना नियत की अस्पष्टता का प्रमाण है।

संसद में बोलने की समान सुविधा की माँग

साथ ही यह भी जोड़ा गया कि जनप्रतिनिधियों को संसद में समान रूप से बोलने का अवसर मिलना चाहिए। किसी एक धड़े की बात सुनना और दूसरे को बोलने से रोकना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।

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