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राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, मधेश प्रदेश कार्यालय द्वारा अन्तरक्रिया का आयोजन

 

जनकपुरधाम, 17 असार। आर्थिक रूप से पिछड़े, बेरोजगारी से पीड़ित और आत्मनिर्भरता से वंचित समाज में मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाएँ अधिक होती हैं—यह निष्कर्ष जनकपुरधाम में आयोजित एक अन्तरक्रिया कार्यक्रम में सामने आया।

यह कार्यक्रम राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, मधेश प्रदेश कार्यालय द्वारा मंगलवार को आयोजित किया गया था। अन्तरक्रिया का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक आवधिक समीक्षा (UPR) प्रक्रिया के तहत नेपाल को प्राप्त सिफारिशों के कार्यान्वयन की स्थिति पर विमर्श करना था।

मधेश प्रदेश सरकार के खेलकूद तथा समाज कल्याण मंत्री प्रमोद कुमार जयसवाल ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश सरकार मानव अधिकारों के संरक्षण और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को व्यवहार में उतारने के लिए प्रदेश स्तरीय नीतियों के निर्माण पर ध्यान देना आवश्यक है।

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प्रदेशसभा सदस्य शारदा थापा ने तीनों तह की सरकारों द्वारा नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “महिला मानव अधिकार की अवधारणा आई है, लेकिन आज भी महिलाओं के प्रजनन अधिकार से लेकर सामाजिक सुरक्षा तक की गारंटी दूर की बात है।”

उन्होंने मधेश प्रदेश की 62 लाख जनसंख्या में दृष्टिविहीन और अपांगता पीड़ित नागरिकों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी उचित प्रतिनिधित्व नीति, कार्यक्रम और बजट में नहीं है, जिसे मानव अधिकारों का उल्लंघन माना जाना चाहिए। “कानूनी संरचनाओं के भीतर दृष्टिविहीन नागरिकों के अधिकारों की स्पष्ट स्थापना जरूरी है,” उन्होंने जोर दिया।

एक अन्य प्रदेशसभा सदस्य रूपा कुमारी यादव ने कहा कि महिलाओं पर हिंसा की घटनाएं अब भी उच्च स्तर पर हैं। उनके अनुसार, “महिलाएं और बालिकाएं शिक्षा से लेकर रोजगार तक और यहां तक कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भी उपेक्षित हैं। सरकार की बजट प्रणाली खिचड़ी जैसी है—जिसमें स्पष्ट लक्ष्य नहीं होता और खर्च किया जाता है।”

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उन्होंने शिक्षा का उदाहरण देते हुए कहा, “अब तक एक भी नमूना विद्यालय नहीं बन पाया है। अस्पताल खुद बीमार हैं—उपकरण नहीं हैं, दक्ष जनशक्ति की कमी है। ऐसे में जनता का इलाज कैसे संभव होगा?”

महोत्तरी जिले के एकडारा गाउँपालिका के अध्यक्ष दीपनारायण मण्डल ने कहा कि यदि सरकार शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, रोजगार और सड़क निर्माण जैसे क्षेत्रों में प्रभावकारी रूप से कार्य करे तो मानव अधिकारों के उल्लंघन को कम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि उनकी पालिका में जैविक खेती, शुद्ध पेयजल और पोषणयुक्त आहार कार्यक्रम को नीति के स्तर पर आगे बढ़ाया जा रहा है।

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उन्होंने पर्यावरणीय अधिकारों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा, “पर्यावरणीय प्रदूषण स्वास्थ्य, कृषि उत्पादन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल रहा है। इसलिए पर्यावरणीय मानव अधिकारों की बहस को भी आगे बढ़ाया जाना चाहिए।”

मानव अधिकारकर्मी सबिना ने कहा कि जनता को आज भी मानव अधिकारों की वास्तविक अनुभूति नहीं हो पाई है। उन्होंने कहा, “मानव अधिकारों के विषय को केवल कानूनी या दस्तावेज़ी रूप में नहीं, बल्कि जनता के जीवन में जीवंत रूप में महसूस कराने योग्य काम होना चाहिए।”

कार्यक्रम की अध्यक्षता आयोग के मधेश प्रदेश संयोजक बुद्धनारायण सहनी ने की। अन्तरक्रिया में UPR के तीसरे चक्र के अंतर्गत नेपाल को प्राप्त सिफारिशों के कार्यान्वयन की स्थिति पर समूहगत चर्चा भी हुई।

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