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मूछें : सन्तोष कुमार पोखरेल

 

मूछें

बात मेरी जेहन में आई
छू गई दिल की गहराई
मर्दों कटवाते क्यों मूछें
नहीं किसी ने समझाई।

बचपन मे देखे थे हम ने
सब मर्दों की मूछें थीं
थे सब के सब सेर बराबर
कुछ नाटे कुछ ऊचे थीं ।

कुछ की लम्बी दाढी भी थीं
कुछ की छोटे चिकनी थीं
दाढी सब के ना थीं फिर भी
मूछें अपने अपने थीं ।

अब जब हमने होश सम्हाले
देख रहे हैं सब मतवाले
मूछ्मुन्डो की भीड खडी कर
मर्दों को गाली दे डाले।
अप्रिल ०१. २०२०
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कवि सन्तोष कुमार पोखरेल

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