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नेपाल की बर्बादी की दास्तान कहाँ से शुरु की जाय, हर ओर तबाही का मंजर है : श्वेता दीप्ति

Shweta Deepti
 
श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति

२५ मई , काठमांडू | सच तो यह है कि नेपाल की बर्बादी की दास्तान कहाँ से शुरु की जाय यह समझ में नहीं आ रहा । हर ओर तबाही का मंजर है । आज भी मलबों के अन्दर लोगों के दबे होने की आशंका है । कहना न चाहते हुए भी यह अनुमान किया जा सकता है, उनके जीवित होने की सम्भावना अत्यन्त न्यून है । किन्तु जिनके अपने लापता हैं, उनकी आँखें आज भी उनके सकुशल लौटने की प्रतीक्षा कर रहीे हैं । दर्द तो मिल गया, जो चले गए वो वापस नहीं आ सकते पर, जो जिन्दा हैं वो जिन्दगी की लड़ाई लड़ रहे हैं । सर पर छत नहीं है, खाने को अन्न नहीं है और जो बीमार हैं वो दवा का इंतजार करते–करते दम तोड़ रहे हैं । राहत की सामग्री है किन्तु, उसकी वितरण व्यवस्था तय नहीं हो पा रही है । लोग अभी भी खुले आकाश के नीचे जीने को बाध्य हैं, जाएँ तो कहाँ जाएँ । आवश्यकता थी युद्धस्तर पर कार्यवाही की किन्तु यह तत्परता कहीं दिखाई नहीं पडीÞ । कितनी अजीब सी बात है जहाँ भूकम्प के मात्र आधे घन्टे के भीतर मित्र राष्ट्र भारत में प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा आपातकालीन बैठक बुलाकर राहत का निर्णय लिया गया वहीं हमारी सरकार ने मंत्रीपरिषद् की बैठक साढे छ घन्टे के बाद बुलाई । सरकार एक महीने के लिए भूकम्प पीड़ित क्षेत्र में संकटकाल की घोषणा कर के चिन्तामुक्त हो गई । जबकि आज भी भूकम्प पीड़ित क्षेत्र में उद्धारकर्मी के नहीं पहुँचने से क्षति का पूर्ण विवरण नहीं आ पाया है ।

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नेपाली सेना, सुरक्षा निकाय, उद्धारकर्मी, रेडक्रास जैसी संस्थाओं के काम में समानता और सहमति की कमी की वजह से उद्धारकार्य में जो तेजी आनी चाहिए थी वह नहीं हो पा रहा है । बावजूद इसके सशस्त्र प्रहरी सेना के जवानों और ट्रैफिक पुलिस की सराहना तो करनी ही होगी जो स्वतःस्फूर्त रूप से सामने आए और जिन्दगियों को बचाने में, जिन्दगी को पटरी पर लाने में निःस्वार्थ भाव से लगे । उन्हें न तो अपनी चिन्ता थी और ना अपने परिजनों की, उस वक्त प्रकृति की मार से आहत सम्पूर्ण जनता उनकी अपनी थी । उनके दुख में वो उनके साथ थे । चिकित्सकों ने हर पल लोगों का साथ दिया । अस्पतालों में जगह नहीं थी तो सड़कों पर इलाज किया । अमीर गरीब सभी उनके लिए एक थे, सबका उन्होंने ख्याल रखा । व्यक्तिगत संस्थाएँ सामने आईं और लोगों की सेवा में और सहायता में जी जान से लगी । जहाँ–तहाँ खाने की व्यवस्था की गई, पानी दिया गया और पीड़ितों को बचाया गया उन्हें सुरक्षा दी गई । बंधुत्व की ये भावना निःसन्देह अतुलनीय है । जिस वक्त लोग अपने परायों की खबर लेने के लिए बैचेन थे, ये जानने के लिए बैचेन थे कि वो कहाँ हैं और कैसे हैं, किस हाल में हैं ऐसे में नेपाल टेलीकोम, एनसेल, यूटीएल इन सबने जो साथ दिया उसने तो लोगों को एक नई जान दी । मुफ्त सेवा देकर उन्होंने सबको जोड़ा । भारत सरकार ने भी इसमें अपना सहयोग दिया । भारतीय डाक्टरों की टीम और सेना के जवानों ने भी अपना सर्वस्व लगा दिया । तभी तो मलबों में दबे लोगों का उद्धार हो सका । दुर्गम क्षेत्रों में हेलीकाप्टर के सहारे जन मानस को बचाया गया ।

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कई तो इतने खुशनसीब निकले कि उन्होंने मौत को भी हरा दिया । सेना के प्रयास से ही तेह्रथुम की सुनीता सिटौला मलबे से ३३ घंटे के बाद जिन्दा निकाली गई । १२८ घंटा मलबे में दबे होने के बाद गोंगबु गेस्टहाउस से २८ वर्षीया कृष्णकुमारी खड्का को निकाला गया । १५ वर्षीय पेम्बा लामा को १२० घंटे के बाद निकाला गया । चार महीने के बच्चे को भी कई घंटों के बाद जीवित निकाला गया और यह सब सेना के कठिन उद्धार कार्य की वजह से सम्भव हो सका । जिन्दगी देने वाला ईश्वर है किन्तु उसे पुनर्जीवन हमारे सेनानियों ने दिया और इस सब में उनके साहस के साथ विदेशी तकनीकि ने भी सहयोग दिया । मानवता के इतिहास में इनका कार्य हमेशा सराहनीय रहेगा । उद्धार कार्य में कई जवानों ने अपनी कुर्बानियाँ भी दीं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है । इस आपदा के बाद सम्पूर्ण काठमान्डौ पर अंधकार का साम्राज्य छा गया था । शनिवार की रात दूर–दूर तक कहीं रोशनी नहीं थी । धरती में हर पल हो रहे कम्पन और अंधकार में रात गुजारने की बाध्यता ने समपूर्ण काठमान्डौवासी को त्रसित कर रखा था । दो दिनों तक यही अवस्था थी । किन्तु बिजली आपूर्ति देने में विद्युत विभाग ने अपनी तत्परता दिखाई । और दो दिनों के पशचात् धीरे धीरे हर जगह विद्युत आपूर्ति की गई और लोगों ने राहत की साँस ली । एक और जो बात देखने में आई वो निःसन्देह मन को छू गई थी । कई जगहों पर लोगों ने सोलार उपकरण का प्रयोग करके लोगों को मोबाइल चार्ज करने की सुविधा मुहैया कराई थी । इन सभी के जज्बों को सलाम है हमारा ।

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श्वेता दीप्ति, सम्पादक, हिमालिनी

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