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देश की वर्तमान अवस्था और विजिट वीजा काण्ड :अंशुकुमारी झा

अंशु कुमारी झा, हिमालिनी अंक जून 025। फिलहाल देश की अवस्था बहुत ही नाजुक है । वि.सं.२०६५ साल के बाद देश में संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र की स्थापना हुई । लोगों में एक नए उत्साह का बीजारोपण हुआ । अब उन्हें भी लगने लगा था कि हमारे हित के लिए कुछ अच्छा होगा परन्तु वैसा कुछ नहीं हो पाया । नेपाली जनता असन्तुष्ट ही है । देश में अस्थिरता उत्पन्न हो गई । एक पर एक भ्रष्ट नेताओं का यह देश हो गया । जनता जिस पर विश्वास करती है वही भ्रष्टाचार में लिप्त प्रतीत होता है । नेपाली राजनीतिक दलों के नेताओं का भ्रष्टाचार के मामलों में संलिप्तता एवं दलों का अल्पकालिक लाभ के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर बार–बार रुख बदलने का विषय चर्चा का एक अहम विषय रहा है । विशेष तौर पर सहकारी घोटाला, सोने की तस्करी का मामला, भूटानी शरणार्थी घोटाला, विजिट वीजा काण्ड आदि की मांग लेकर उच्च स्तरीय जाँच पैनल की मांग, समर्थन, विरोध, सरकार और गठबंधन बदलने के साथ बदलते रहे हैं । यह राजनीतिक दलों के अवसरवादी व्यवहार को रेखांकित करता है तथा राजनीतिक दलों की नीयत के प्रति जनता के विश्वास को कम करता है । नेपाली समाज का एक वर्ग जहाँ वर्तमान में उभरते हुए कुछ नए युवा राजनेताओं की तरफ कुछ उम्मीद से देखता है, वहीं, दूसरा वर्ग किसी भी प्रकार के पोपुलिस्ट छवि वाले नेतृत्व पर भरोसा करने को ठीक नहीं समझता है । पर किस पर भरोसा करे ? यह प्रश्न हमेशा से जनता के मन को कचोटता है । आए दिन कभी भी सड़क पर आंदोलन शुरु हो जाता है । वहाँ भारी संख्या में लोगों की उपस्थिति दिखती है । इससे स्पष्ट है कि जनता परिवर्तन की खोज में है । फिलहाल देश में विजिट वीजा काण्ड की बहुत जोरशोर से चर्चा हो रही है ।

आखिर क्या है यह विजिट वीजा ?

विजिट वीजा का अर्थ होता है, ऐसा वीजा जो किसी व्यक्ति को एक निश्चित समय के लिए दूसरे देश में घूमने, रिश्तेदारों से मिलने या निजी कारणों से जाने की अनुमति देता है । इस वीजा पर हर व्यक्ति नौकरी नहीं कर सकता है । परन्तु कन्सल्टेन्सी, ट्राभल और म्यानपावर व्यवसाइयों विजिट वीजा वाले लोगों को रोजगारी में भेज देते हैं । कहीं न कहीं इस प्रक्रिया को सरकारी निकाय भी समर्थन देती है । पहले त्रिभुवन विमानस्थल में मानव तस्करी नहीं हो इसके लिए एक अलग से सुरक्षा व्यवस्था की टीम थी परन्तु अभी उसे हटा दिया गया है । दूसरी बात वैदेशिक रोजगारी के नाम पर हमारे देश में अभी भी बहुत ठगी हो रही है । युवाओं को ले जाते हैं किसी काम के नाम से पर वहाँ जाकर वह कहीं का नहीं रह जाता है । युरोप भेजने के लिए लगभग एक लाख डिपोजिट करने को बोलता है जिसमें मेनपावर का ५० हजार और दलाल का ५० हजार होता है ।

वैदेशिक रोजगार विभाग के तथ्यांक अनुसार वार्षिक सिर्फ चार हजार से ४५ सौ लोग ही युरोप में रोजगारी के लिए गए हैं । इससे स्पष्ट हो रहा है कि ९५ हजार से अधिक युवा युवती ठगे गए हैं । यह तो सिर्फ युरोप की बात है खाड़ी देशों में भी वैसा ही हुआ है । लगभग दो लाख से भी अधिक युवा इस दायरा में आते हैं । तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वैदेशिक रोजगार विभाग उक्त विषय में असक्षम हैं । तथ्यांक अनुसार सन् २०२२ में एक लाख ७७ हजार ३१०, सन् २०२३ में दो लाख चार हजार ५३५, सन् २०२४ में दो लाख ७६ हजार ६२४ और २०२५ के मई महीना तक ९६ हजार ५३८ लोग विभिन्न देशों में भ्रमण पर निकले हैं । कुल मिलाकर सात लाख ५५ हजार ७ नेपाली व्यक्ति अपने देश से अन्य देशों में घूमने हेतु निकले हैं । क्या सच में ये लोग भ्रमण करके अपने देश लौट जायेंगे या वहीं रोजगार में लग जागेंगे ? यह हमारे देश की बिडम्बना है कि अपने देश को रोजगारमूलक न बनाकर अन्य देशों में अपना श्रम और बुद्धि को पानी के तरह बहा रहे हैं । यथार्थ तो यह है कि कुछ लोग तो लौटे हैं परन्तु सही आँकड़ा नेपाल सरकार के पास नहीं है । उक्त अवधि में विमानस्थल से २० हजार ४९८ लोगों को वापस होने की पुष्टि है परन्तु उसमें से कितने लोग विजिट वीजा वाले हैं यह डाटा उपलब्ध नहीं है । जिसके कारण यह उल्लेख करना कठिन है कि कितने लोग रोजगार में लग गये या कितने लोग मुश्किलों से जुझ रहे हैं । अगर इस विषय पर अनुसन्धान हो तो हमें ज्ञात हो सकता है कि कितने लोग कहाँ कहाँ हैं और इससे सेटिंग का भी पता लगाया जा सकता है ।

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विगत में अनुसन्धान से इस प्रकार की कई घटनाओं से पर्दा उठाया गया है । अनुसन्धान से ही पता चला कि विआईपी लोगों के लिए जो लाल पासपोर्ट की व्यवस्था की गई है उसके राहदानी से तस्वीर बदलकर लोगों की तस्करी हो रही थी । इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति से २५ लाख लिया जाता था । इन क्रियाकलापों में सांसदों की संलग्नता देखी गई । इसी प्रकार बंगलादेश के नागरिकों को नेपाली राहदानी में उसका फोटो लगाकर दलालों के सेटिंग में विदेश भेजा जाता रहा । इसके लिए लाखों रुपए लिए जाते रहे । मोटामोटी अनुसन्धान से इतना तो पता चला पर सूक्ष्म रूप से अनुसन्धान नहीं हो पाया । यह सेटिंग अभी भी जारी ही है । इन क्रियाकलाप में बडेÞ–बड़े लोगों का हाथ होने के कारण इसपर पर्दा डाल दिया जाता है । अगर इस विषय पर ढंग से अध्ययन किया जाय तो इसमें ऊपर तक के लोग घसीटे जायेंगे यह नेपाल में जो विजिट वीजा की समस्या है, वह पूर्णरूपेण मानव तस्करी है । क्योंकि जो लोग विजिट वीजा में जाते हैं वह दलालों के प्रलोभन में आकर वहीं फँस जाते हैं । इस बात की खुलासा तब होती है जब वह बुरी तरह से दलाल के चँगुल में आ जाते हैं । जहाँ के लिए उन्हें भेजा जाता है पर वह गन्तव्य तक नहीं पहुँच पाते हैं तब उसके पास वापस लौटने के सिवा कोई उपाय ही नहीं रहता । तभी यह विषय बाहर आता है । नहीं तो, ना तो जाने वाले बोलते हैं और न ही भेजने वाले ।

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प्रायः पाया गया है कि कन्सल्टेन्सी, ट्राभल एजेन्सी और मेनपावर ही बारहवीं का नकली सर्टीफिकेट उपलब्ध करा देता है और आवश्यक कागजात भी उपलब्ध कराता है । यहाँ तक की कागजात में जो नेपाल सरकार की स्टाम्प लगाना पड़ता है वह भी दलाल ही उपलब्ध कराता है । इसके बदले वह मुँहमांगी कीमत लेता है । विजिट वीजा में लोग भी गैरकानुनी ढंग से विदेश जाने के लिए मरे जा रहे हैं । यही तो मानव तस्करी है । पता नहीं हमारे देश में कैसे–कैसे लोग रहते हैं जो खुद से मुश्किलों को न्यौता देते हैं और उसमें फँसने के लिए लालायित रहते हैं । दुख की बात तो यह है कि एक तो सेटिंग के तहत मानव तस्करी होती है और उक्त तस्करी के लिए ढंग का कोई कानून नहीं है । इसके लिए विधेयक तो बना है पर वह कहाँ रखा है किसी को पता नहीं ।
समग्र में एक अनौपचारिक तथ्यांक अनुसार अभी नेपाल से वार्षिक लगभग १२ लाख नागरिक विदेश पलायन हो रहे हैं । जिसमें से लगभग चार लाख नागरिक किसी न किसी समस्या में आ जाते हैं और वह ठगी का शिकार हो जाते हैं । दुर्भाग्य की बात तो यह है कि वैदेशिक रोजगार विभाग के पास इसका कोई हिसाब नहीं है और न ही पीडि़तों को लाने और भेजने का स्रोत साधन । इसलिए हम सभी नागरिकों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए ताकी वह किसी समस्या में फँसे । यह कहा जाता है कि परदेश में कोई अपना नहीं होता है । बहुत सारी विडियो सामाजिक सन्जाल में आए दिन देखने को मिलती है, जिसमें लोग अपने देश को परदेश से गुहार लगा रहा होता है । कृपया हमें किसी तरह अपने देश ले चलिये । हम यहाँ बहुत बड़ी संकट में हें । न खाना के लिए एक दाना अन्न है और न ही रहने के लिए कोई जगह । इस प्रकार का संवाद देखकर तकलीफ तो होती है पर क्या किया जाय जब शासक ही अंधे और बहरे हो तो उनलोगों के दुख को कौन सुनेगा या देखेगा ? अगर सच में, सरकार को इस सेटिंग पर रोक लगानी है तो दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ इस विषय पर केन्द्रीत होना होगा । इन सभी पहलूओं को कानुन के दायरा में रखना होगा । तभी जाकर इस समस्या को नियन्त्रण में लाया जा सकता है ।

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अंशु झा,
बल्खु, काठमांडू नेपाल |

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