कृषि के प्रति सरकार की उदासीनता और धान दिवस का औचित्य : डॉ.श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक जुलाई 025। नेपाल सरकार के मंत्रिस्तरीय घोषणापत्र मंगसिर २९, २०६१ में हर साल आसाढ़ १५ को ‘धान दिवस’ मनाने का फैसला किया गया था । तब से, नेपाल में धान दिवस आधिकारिक तौर पर मनाया जाता है । नेपाल में कुल खेती योग्य भूमि लगभग ३.१ मिलियन हेक्टेयर है । धान १.५ मिलियन हेक्टेयर भूमि पर बोया जा सकता है । हालाँकि, सिंचाई सुविधाएँ अभी भी ६३ प्रतिशत भूमि तक नहीं पहुँच पाई हैं । नेपाल की धान की खेती सिंचाई पर निर्भर करती है । ऐसे आँकड़े हैं कि नेपाल में धान का उत्पादन कम वर्षा वाले वर्षों में घटता है और अच्छी वर्षा वाले वर्षों में बढ़ता है । धान का उत्पादन सकल घरेलू उत्पाद का ११ प्रतिशत है । जिन वर्षों में धान का उत्पादन कम होता है, सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट आती है और जिन वर्षों में धान का उत्पादन बढ़ता है, घरेलू उत्पादन में सकारात्मक संकेत मिलते हैं । चावल दुनिया की लगभग चार प्रतिशत आबादी का मूल भोजन है । दुनिया में लगभग १७० मिलियन हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती की जाती है । सबसे ज्यादा धान पैदा करने वाला देश चीन है । चीन के बाद भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश और वियतनाम प्रमुख चावल उत्पादक देश हैं । अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान केंद्र (आईआरआरसी) के आंकड़ों के अनुसार, नेपाल दुनिया का १७वां धान उत्पादक देश है । नेपाल सरकार ने झापा जिले को चावल उत्पादन के लिए सुपर जोन घोषित किया है । हिमालय के पार मनांग और मुस्तांग के दो जिलों को छोड़कर नेपाल के सभी जिलों में चावल की खेती की जाती है । पिछले १५ वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि चावल का उत्पादन संतोषजनक नहीं है ।
१९६६ में जब पूरी दुनिया में अकाल फैला हुआ था । संयुक्त राष्ट्र ने अकाल से बचने के लिए धान को सबसे महत्वपूर्ण फसल माना और दुनिया भर में उत्पादन बढ़ाने के लिए अभियान चलाने के लिए धान को वार्षिक फसल बनाया । उस वर्ष भूख से मुक्ति के नारे के साथ धान उत्पादन को मुख्य फसल के रूप में महत्व दिया गया । परिणामस्वरूप, धान दुनिया का मुख्य भोजन बन गया ।
इसके बाद, धान की खेती ने पूरी दुनिया में लोकप्रियता हासिल की । इसलिए, वैश्विक स्तर पर धान को सकारात्मक रूप से बढ़ावा देने के लिए दिन और त्योहार मनाए जाने लगे ।
नेपाल के संदर्भ में, धान की खेती मनांग और मुस्तांग के अलावा अन्य जिलों में भी की जाती है । हमारे देश में धान की खेती समुद्र तल से ६० मीटर की ऊँचाई (झापा जिले में कचना केबल) से लेकर ३,०५० मीटर (जुमला में हुमचौर) तक की जाती है । नेपाल में कुल कृषि योग्य भूमि के १.४७३ मिलियन हेक्टेयर (४७ प्रतिशत) क्षेत्र में धान की खेती की जाती है । दुनिया की तरह, नेपाल में भी धान मुख्य फसल के रूप में स्थापित है । सरकार दो दशक पूर्व यानी २०६१ से ही नियमित रूप से असाढ १५ को धान दिवस व रोपण महोत्सव के रूप में मनाती आ रही है । धान दिवस की शुरुआत के साथ ही धान व इसके मुख्य व्यंजन चावल के प्रति रुचि बढ़ गई है । फिलहाल कृषि व पशुधन विकास मंत्रालय व उसके अधीनस्थ निकाय, किसान भाईचारा संघ व राजनीतिक दलों के संगठन, अन्य स्वतंत्र व खेती से जुड़े संघ व संगठन और स्थानीय सरकारें भी धान दिवस मनाने में व्यस्त हैं । मानसून आधारित बारिश पर निर्भर रहने वाले किसान बुवाई नहीं कर पा रहे हैं। अभी तक देश में पांच प्रतिशत भी बुवाई नहीं हो पाई है । ऐसे में हमारी धूमधाम का क्या मतलब ?
धान दिवस और रोपण महोत्सव मनाते हुए हमें २२ साल हो गए हैं । समयानुकूल नारे लगाकर दिवस मनाते समय हमने कभी यह नहीं देखा कि हमने जो नारा अपनाया था, वह सार्थक है या नहीं । अगर हम बीते दिनों पर नजर डालें तो पाते हैं कि धान उत्पादन की स्थिति में कोई व्यापक सुधार नहीं हुआ है । सरकार की कृषि के तरफ जो पहल होनी चाहिए वह ना के बराबर है । केन्द्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर कृषि के लिए अपेक्षित बजट सरकार नहीं देती है । तराई के क्षेत्र में जहाँ धान की खेती बृहत पैमाने पर होती है वहीं सरकार की नीति विभेदकारी होती है । स्थानीय सरकार भी इस मसले पर विफल ही नजर आ रही है ।
एक तरफ हम कृषि भूमि की रक्षा का नारा लगाते हैं, दूसरी तरफ धान के खेतों को टुकड़े–टुकड़े में बांट कर कंक्रीट में तब्दील करते जा रहे हैं । सड़क और जलविद्युत निर्माण समेत विभिन्न कंपनियों के नाम पर धान की जमीन का अधिग्रहण किया गया है । खेत भूस्खलन और नदी के कटाव से प्रभावित हुए हैं । हर साल बाढ़ और भूस्खलन से हजारों हेक्टेयर भूमि क्षतिग्रस्त होती है । संरक्षण के अभाव में धान उगाने वाली जमीन कम होती जा रही है जिसका असर स्वाभाविक रूप से धान की खेती पर पड़ता है और धान का उत्पादन कम हो रहा है । कल तक जो देश धान और चावल निर्यात करने वाले कृषि प्रधान देश था आज वहाँ के लोग अरबों का चावल खरीद कर खाने को मजबूर हैं । साल में दो बार धान की खेती करने के मनसूबे बनाए गए पर हम बरसात के मौसम में भी कृषि योग्य भूमि पर फसल लगाने का माहौल नहीं बना पाए । जल संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद हम उनका समुचित उपयोग नहीं कर पाए हैं । किसान सिर्फ वर्षा जल के आधार पर खेती करने के लिए मजबूर हैं ।
विगत में नेपाल ने २०३१ में आठ कंपनियां स्थापित की थीं और धान और चावल का निर्यात शुरू किया था । उसी वर्ष नेपाल से भारत, बांग्लादेश और अन्य देशों में ५५ हजार मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया गया था । कंपनी की स्थापना के बाद सात साल तक लगातार धान और चावल का निर्यात किया जाता रहा । जब यह आठवें वर्ष में पहुंचा, तो नेपाल के भीतर चावल का अप्रत्यासित रूप से आयात होने लगा और जब यह दसवें वर्ष में पहुंचा, तो सभी आठ कंपनियां बंद हो गईं । जनसंख्या बढ़ी, खपत बढ़ी परंतु पारंपरिक कृषि प्रणाली में खेती करने के कारण उत्पादन कम हो गया और देश में ही इसकी आवश्यकता बढ़ गई और इसका निर्यात नहीं हो सका । सरका द्वारा समय पर स्थिति का सही विश्लेषण नहीं किया जा सका, नीतियों और नियमों को किसान हितैषी बनाने और उन्हें लागू करने पर ध्यान नहीं दिया गया और किसानों का सम्मान नहीं किया गया, परिणामस्वरूप किसान निराश होने लगे । किसानों की निराशा का मतलब है देश का कृषि क्षेत्र निराश है । यह हमारे लिए स्पष्ट है कि किसानों के प्रति संबंधित निकायों के गैर–सकारात्मक रवैये और किसानों के अस्तित्व को स्वीकार करने में असमर्थता जैसे कारणों से देश के उत्पादन में गिरावट आई है ।
राज्य ७० प्रतिशत से अधिक छोटे किसानों को पारिवारिक खेती के लिए प्रोत्साहित नहीं कर सका । नेपाल की भौगोलिक क्षमताओं, विशेषताओं, स्थानीय स्तरों और किसानों पर निर्भर समुदाय की जरूरतों पर विचार किए बिना वाणिज्यिक कृषि के नाम पर रासायनिक उर्वरकों के उपयोग पर जोर दिया गया । सरकार ने वित्तीय वर्ष २०८१÷०८२ के लिए कुल कृषि बजट का आधे से अधिक हिस्सा रासायनिक उर्वरकों के लिए आवंटित किया है । पिछले साल रासायनिक उर्वरकों पर ३० अरब रुपये खर्च करने के बावजूद किसानों को धान की रोपाई के समय उर्वरक नहीं मिल पाया था । कुछ स्थानों पर सहकारी समितियों द्वारा किसानों को वितरित किए जाने वाले उर्वरकों का सीमित कोटा ५ और १० किलोग्राम के हिस्से में वितरित किया जा रहा है ।
निराशा और सरकार की उदासीनता के साथ ही दूसरी ओर, जंगली जानवरों के प्रकोप के कारण किसान अपनी फसलों को बचाने में असमर्थ होकर अपनी जमीन परती छोड़ने को मजबूर हैं । देश के युवा जो ग्रामीण क्षेत्रों में रहते थे और कृषि कार्य करते थे, वे खेती से आजीविका नहीं मिलने को देखते हुए तेजी से गांवों से शहरों और विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं । नागरिक समाज के दबाव में सरकार ने भूमि उपयोग नीति और नियम पारित किए हैं । इससे उम्मीद जगी थी कि शायद कृषि क्षेत्र में सुधार हो परंतु इसे प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका है ।
केवल १८–२० प्रतिशत कृषि योग्य भूमि पर सिंचाई की सुविधा है । जल संसाधनों से समृद्ध देश होने के बावजूद इसका उपयोग करना संभव नहीं हो पाया है क्योंकि पानी कृषि योग्य भूमि से पांच मीटर नीचे से बहता है । डोजर के विकास के कारण, पारंपरिक रूप से किसानों के श्रम से बनाए गए सिंचाई कुएं क्षतिग्रस्त हो गए हैं और चालू नहीं हो पाए हैं ।
भूमि में जल स्तर घट रहा है । परिणामस्वरूप, सूखा बढ़ रहा है । हमारी अधिकांश भूमि सूखी है । सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं है । किसान आसमान की ओर देखने को मजबूर हैं कि कब आसमान से पानी गिरेगा और वे बुवाई कर सकेंगे । जलवायु परिवर्तन के कारण समय पर बारिश नहीं होने से किसान सही समय पर फसल नहीं लगा पाते हैं । जलवायु परिवर्तन चावल की खेती को प्रभावित कर रहा है, इसे कम करने के लिए जलवायु अनुकूल तकनीकों पर शोध और विकास किया जाना चाहिए, तथा किसानों और अन्य हितधारकों को उपलब्ध तकनीकों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए और उन्हें उचित रूप से अपनाया जाना चाहिए । सिर्फ नारा देने से काम की सफलता संभव नहीं है इसके लिए मजबूत प्रयास की आवश्यकता है ।
धरती पुत्र किसानों के लिए आसाढ एक महत्वपूर्ण समय है । प्राचीन काल से ही किसानों और प्रकृति के बीच घनिष्ठ संबंध रहा है । इस समय होने वाली वर्षा किसानों और फसलों के लिए अमृत के समान होती है । चूंकि देश की मुख्य फसल धान है, इसलिए आसाढ शुरू होते ही किसान बारिश का इंतजार करना शरु कर देते हैं । उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि कब बारिश होगी और कब बुवाई करनी है । किसानों की ऐसी चिंताओं को दूर करने के लिए राज्य को ठोस कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए ।
सिर्फ धान दिवस मनाना सरकार की प्राथमिकता में नहीं होना चाहिए । एक दिन सोशल मीडिया पर खेती मिट्टी से सने होकर फोटो पोस्ट करना या दही चूड़ा खाकर त्योहार मनाना काफी नहीं है । सरकार कई बार वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ रहकर दिवस मनाने में व्यस्त रहती है । एक साल पूरे नेपाल में पेट्रोलियम पदार्थों की कमी थी । सरकार ने एक कोटा तय किया था । आसाढ़ १५ के तीन दिन पहले से वह कोटा भी वितरित नहीं किया जा सका । लेकिन सरकार गांवों में धान दिवस मना रही थी । उन्हें पेट्रोलियम पदार्थों और धान दिवस के बीच संबंध पता नहीं था । दरअसल आज खेतों में बैलों से हल चलाने की जगह ट्रैक्टर से जुताई की जाती है । डीजल की कमी के कारण ट्रैक्टर नहीं चल पाते । लेकिन उस साल खबर आई कि डीजल की कमी की परवाह किए बिना धान दिवस खुशी से मनाया गया । यह कैसी खुशी है ? नेपाल सरकार आज तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि धान की खेती के लिए औजारों और सहायक सामग्रियों की उपलब्धता के बिना धान दिवस मनाने में हमारी कौन सी नैतिकता है । क्योंकि धान की पहली आवश्यकता बीज और पानी है । जो थोड़ी बहुत सरकारी नहरें हैं, वे जरूरत पड़ने पर पानी नहीं देतीं, हमने पर्यावरण को इतना नुकसान पहुंचाया है कि समय पर बारिश नहीं होती । किसानों को समय पर उचित मूल्य पर बीज नहीं मिलते । किसी तरह बीज मिल जाता है, किसी तरह पानी मिल जाता है, लेकिन इस देश में खाद नहीं मिलती । हालांकि सरकार चिल्लाती रहती है कि खाद की कोई कमी नहीं है, लेकिन अगर किसानों को खाद न मिले तो ऐसा लगता है जैसे खाद है ही नहीं । इसलिए अगर धान दिवस मनाना है तो पूरे साल जागरुक रहना चाहिए और धान दिवस के लिए क्या–क्या चाहिए, इसका ध्यान रखना चाहिए । देश भर के किसानों तक पहले से ही बीज और खाद पहुंचाने के लिए पर्याप्त मात्रा में भंडारण करना, खाद की पहले से व्यवस्था करना और पारदर्शी तरीके से उसका वितरण करना, पानी के लिए सिर्फ इंद्रदेव पर निर्भर न रहना, इन जिम्मेदारियों को पूरा किए बिना धान दिवस मनाने का औचित्य सिद्ध नहीं हो सकता । सबसे बड़ी समस्या जमीन की है । देश में राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर भूमि सुधार लागू किया गया, लेकिन भूमि सुधार की बजाय इसने जमीन को खंडित कर दिया और उसे खेती की जमीन नहीं बल्कि आवासीय संपदा में बदल दिया । यह स्थिति खतरनाक है जिसे सरकार को समझना आवश्यक है, नहीं तो इसका परिणाम पूर् देश को भुगतना पड़ सकता है ।

सम्पादक, हिमालिनी


