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पतंजलि जमीन घोटाला कांडः नीतिगत निर्णय की आड़ में राज्य को करोड़ो की हानि : लिलानाथ गौतम

 

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक जुलाई, ०२५। नेपाल की समसामयिक राजनीति और कानूनी बहस के केंद्र में इस समय एक मामला है–पतंजलि जÞमीन घोटालाकांड । पतंजलि आयुर्वेद कंपनी को तत्कालीन मंत्रिपरिषद् (प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में) द्वारा निर्णय लेकर दी गई जÞमीन से जुड़ा यह प्रकरण आज पूरे राजनीतिक माहौल को हिला कर रख दिया है । इस प्रकरण ने नेपाल में होने वाले नीतिगत और संस्थागत भ्रष्टाचार को भी कुछ हद तक उजागर कर दिया है ।

हालाँकि यह मामला नया नहीं है, लेकिन इस बार यह विशेष रूप में सामने आया है । कारण है– पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल समेत ९३ लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज होना । इस प्रकरण में एक ओर जहाँ अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग की सक्रियता दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताकर प्रचार भी किया जा रहा है । इसके बावजूद यह मामला नेपाली लोकतंत्र और सुशासन के कई स्तरों पर सवाल उठा रहा है । लोकतांत्रिक नेपाल के इतिहास में पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ अख्तियार द्वारा भ्रष्टाचार का मामला दर्ज हुआ है । इस घटना के साथ ही सुशासन का अनुभव न करने वाले एक बड़े युवा वर्ग में नई आशा भी जगी है ।

लेकिन इस प्रकरण में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और नेकपा (एमाले) पार्टी की राजनीतिक बदला लेने की भावना की भी चर्चा हो रही है । उल्लेखनीय है कि माधव कुमार नेपाल नेकपा एमाले के पूर्व महासचिव रहे हैं, और वर्तमान पार्टी अध्यक्ष ओली तथा नेपाल के बीच रही व्यक्तिगत दुश्मनी ने इन अटकलों और चर्चाओं को और बल दिया है ।

घटना की पृष्ठभूमि
विक्रम संवत २०६६ माघ १८ गते, तत्कालीन प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद ने पतंजलि योगपीठ को काभ्रेपलाञ्चोक जिले (नासिकास्थान, साँगा) में ८१५ रोपनी जÞमीन भूमि सीमा कानून (हदबंदी) से बाहर कर खरीदने की स्वीकृति दी थी । लेकिन कंपनी ने जÞमीन खरीदने के कुछ समय बाद ही उस जÞमीन को बेचने की अनुमति माँगी । वि.सं. २०६६ फागुन १७ गते, भूमि सुधार मंत्री डम्बर श्रेष्ठ के पास पतंजलि नेपाल के प्रमुख शालीग्राम सिंह ने जÞमीन बेचने का प्रस्ताव पेश किया । मंत्री श्रेष्ठ ने प्रधानमंत्री के निर्देश के आधार पर इस प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद में प्रस्तुत किया । प्रधानमंत्री नेपाल के सीधे आदेश पर जÞमीन बिक्री से संबंधित प्रस्ताव को स्वीकृति भी मिल गई । उसके चार महीने बाद, वि.सं. २०६७ असार ११ गते, पतंजलि नेपाल ने ३१४ रोपनी १५ आना जÞमीन काष्ठमण्डप बिजनेस होम्स प्रा.लि. को बेच दिया ।
कहा जाता है कि जÞमीन सीमा से अधिक जÞमीन देने और फिर बेचने की पूरी प्रक्रिया में करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार हुआ, जिससे राज्य को भारी नुकसान पहुँचा । इस समय चर्चा में आया विवाद का मूल विषय यही है । उद्योग संचालन के नाम पर सीमा से अधिक जÞमीन प्राप्त करना और कानूनी खामियों का दुरुपयोग कर उसे बेच देना–यह पूरा मामला खुला भ्रष्टाचार है । समय बीतने के साथ जब इस जÞमीन खरीद–बिक्री प्रकरण में कानूनी और प्रशासनिक गड़बडि़याँ देखी गईं, तब अख्तियार ने जाँच शुरू की ।

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जाँच के क्रम में अब पूर्व प्रधानमंत्री नेपाल के खिलाफ लगभग १८ करोड़ रुपये की हानि क्षतिपूर्ति माँग के साथ विशेष अदालत में मामला दायर किया गया है । मामला दर्ज होते ही नेता नेपाल की सांसद सदस्यता भी निलम्बित हो गई है । नेपाल समेत अख्तियार ने जÞमीन घोटाले में संलग्न ९३ लोगों के खिलाफ मामला दायर किया है, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल, अन्य मंत्री और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं ।
जैसे कि तत्कालीन कानून मंत्री प्रेम बहादुर सिंह, तत्कालीन भूमि सुधार मंत्री स्व. डम्बर श्रेष्ठ और उनके पुत्र सन्तोष श्रेष्ठ, तत्कालीन मुख्य सचिव स्व. माधव प्रसाद घिमिरे और उनकी पत्नी कमला घिमिरे, भूमि सुधार मंत्रालय के तत्कालीन सचिव छविराज पन्त, सह–सचिव जीतबहादुर थापा और लालमणि जोशी के विरुद्ध अख्तियार ने मामला दायर किया है । इसी प्रकार भूमि सुधार मंत्रालय के तत्कालीन उपसचिव कलानिधि पौडेल, उपसचिव गांधी प्रसाद सुवेदी और हुपेन्द्रमणि केसी, भूमि सुधार तथा प्रबंधन विभाग के तत्कालीन महानिदेशक केशर बहादुर बानियाँ, विभाग के तत्कालीन उपसचिव राजाराम थापा, शाखा अधिकृत सिताराम पोखरेल और नायब सुब्बा बुद्धि बहादुर कार्की समेत ९३ लोगों को प्रतिवादी बनाया गया है ।

यह कैसा नीतिगत निर्णय ?
अब बहस इस बात पर छिड़ी है– क्या मंत्रिपरिषद के निर्णय ‘नीतिगत’ माने जाएँ या ‘निर्णयात्मक’ ? नेपाल के वर्तमान कानून (अख्तियार ऐन की धारा ४(ख)) के अनुसार मंत्रिपरिषद द्वारा सामूहिक रूप से लिया गया नीतिगत निर्णय अख्तियार की जाँच सीमा से बाहर होता है । लेकिन जब नीतिगत निर्णय के नाम पर राज्य को हानि पहुँचाने वाले फैसले होने लगे, तो इस नियम पर भी सवाल उठने लगे हैं । यदि राज्य को घाटा और किसी व्यक्ति या कंपनी को विशेष लाभ पहुँचाने के लिए मंत्रिपरिषद निर्णय करती है, तो उसे ‘नीतिगत भ्रष्टाचार’ माना जा रहा है । ऐसे नीतिगत भ्रष्टाचार को अख्तियार की जाँच से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए –यह माँग अब जÞोर पकड़ रही है । इसी पृष्ठभूमि में पूर्व प्रधानमंत्री नेपाल पर दायर भ्रष्टाचार मामला कुछ नई उम्मीदें भी लेकर आया है । कहा जा रहा है कि अब इसी आधार पर मंत्रिपरिषद के अन्य निर्णयों की भी जाँच शुरू हो सकती है ।

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राजनीतिक प्रतिशोध की बातें
पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और उनकी पार्टी नेकपा (एकीकृत समाजवादी) ने इस मामले को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है । उनके अनुसार, यह मामला वर्तमान सत्ता गठबंधन या पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली के प्रभाव में अख्तियार द्वारा चलाया गया है । यह एक गंभीर आरोप है, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है । हालाँकि, अख्तियार में की जाने वाली राजनीतिक नियुक्तियाँ, अख्तियार प्रमुख की पृष्ठभूमि, और उनका एमाले नेतृत्व से संबंध–इन सबने इस आरोप को बल देने में मदद की है ।

नेपाल के संविधान के अनुसार, प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद के निर्णयों के लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार होता है । कोई भी निर्णय, चाहे वह नीतिगत हो या प्रशासनिक, उसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं । इसलिए निर्णय में शामिल रहने के बाद यह कहना कि ‘मुझे पता नहीं था’ या ‘मैं शामिल नहीं था’, एक गैर–जिम्मेदाराना बयान भर हो सकता है । इस समय माधव नेपाल की ओर से ठीक यही प्रकार का बचाव देखा जा रहा है । यदि पतंजलि प्रकरण में कोई ‘अनियमितता’ हुई है, तो उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी तत्कालीन प्रधानमंत्री माधव नेपाल पर ही आती है । इसलिए इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताकर इससे बच निकलना उचित नहीं है ।
हाँ, इस मामले ने हमारे संसद और अख्तियार दोनों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं । एक ओर, संसद में भ्रष्टाचार निवारण ऐन (कानून) का संशोधन प्रस्ताव समिति में अटका पड़ा है । कारण क्या है ? कुछ लोग कहते हैं कि समिति के नेता ही दलालों और बिचौलियों के प्रभाव में हैं । रोलैक्स घड़ी प्रकरण से लेकर नीतिगत बहाने में लाभदायक निर्णय करनेवाली मंत्रिपरिषद की संरचना ने सुशासन की कल्पना को ही कमजोर बना दिया है । दूसरी ओर, अख्तियार ने पतंजलि प्रकरण में पूर्व प्रधानमंत्री पर मामला दायर कर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है– अब ‘नीतिगत निर्णय’ के नाम पर प्रधानमंत्री भी जाँच के दायरे में आ सकते हैं । लेकिन जिम्मेदार संस्थाओं की यह दोहरी भूमिका और रवैये ने नेता नेपाल पर राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका को भी बल दे दिया है ।

अदालत की परीक्षा
अब यह मामला अदालत में है । विशेष अदालत ने माधव कुमार नेपाल को ३५ लाख रकम (धरौटी वापत) लेकर तत्काल के लिए हिरासत से बाहर रखने का आदेश दिया है । सामान्यतः अदालत सबूत देखती है, व्यक्ति का कद नहीं । लेकिन बाजÞार में अफवाह चलने लगी है कि यह तो सिर्फ माधव नेपाल को डराने और उनकी पार्टी को समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री ओली की एक चाल है । यह भी कहा जा रहा है कि अब नेता नेपाल प्रधानमंत्री ओली की मनमानी के खिलाफ आवाजÞ नहीं उठा सकेंगे । जो भी हो, अब अदालत का निर्णय ही ‘नीतिगत निर्णय’ की परिभाषा और उसकी सीमा को लेकर देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिए मानक बनेवाला है, ऐसी उम्मीद है । यदि अदालत इस निर्णय को भी कानूनी छूट (उन्मुक्ति) देती है, तो ‘नीतिगत निर्णय’ के नाम पर किए गए भ्रष्टाचार पर कार्रवाई का दरवाजÞा फिर से बंद हो सकता है ।

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अब क्या ?
नेपाल में पतंजलि प्रकरण जैसे भ्रष्टाचार से जुड़े मामले पहले भी कई बार आ चुके हैं–ललिता निवास प्रकरण, वाइडबडी विमान खरीद मामला, भूटानी शरणार्थी घोटाला, दरबारमार्ग जÞमीन विवाद, एनसेल काण्ड, ओम्नी प्रकरण आदि इसके उदाहरण हैं । इन सभी में एक जैसी समस्या देखने को मिलती है, ऊँचे स्तर पर निर्णय लेने वालों को छूट मिल जाना । अंत में सिर्फ कर्मचारियों को दोषी ठहराकर बड़े–बड़े भ्रष्टाचार के फाइलों को बंद कर दिया गया है, ऐसे कई उदाहरण हम देख चुके हैं ।
लेकिन पहली बार किसी प्रधानमंत्री रह चुके व्यक्ति पर भ्रष्टाचार का मामला दायर हुआ है, इसलिए कहा जाने लगा है कि ‘अब अख्तियार ने बड़े मछलियों को पकड़ने का साहस दिखाया है ।’ हाँ, पतंजलि प्रकरण में अख्तियार ने प्रधानमंत्री पर जाँच का रास्ता खोल दिया है, जो कि पुरानी प्रवृत्तियों में बदलाव का संकेत है । अगर यही रास्ता मजबूत किया गया, तो भविष्य में कोई भी प्रधानमंत्री या मंत्री इस प्रकार का निर्णय करते समय जÞरूर सोचेंगे ।
कहा जा सकता है कि पतंजलि प्रकरण अब बहुतों की आँखें खोल देगा । यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध है या नहीं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि नीतिगत निर्णय के नाम पर देश को नुकसान पहुँचाने और भ्रष्टाचार करने की छूट प्रधानमंत्री और मंत्रियों को आखिर कब तक मिलती रहेगी ? अब इस मुद्दे के साथ–साथ जनता की आशा और विश्वास को मजबूत करने की दिशा में काम करने का अवसर भी हाथ आया है ।

लिलानाथ गौतम

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