काश ! वह सुबह कहां चली गई : वसन्त लोहनी
काश! वह सुबह कहां चली गई
वह दिन बेकाबू होते-होते गुजर गया,
जब हमको न्योता मिलता था—
दावत के लिए नहीं,
सिर्फ आमने-सामने होने के लिए।
कुछ पढ़ने के लिए—
पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं,
एक-दूसरे की आंखें पढ़ने के लिए।
उन आंखों में तो सारा विश्व छुपा था,
संवेदना से भरा,
जिसकी बातें मन में ऊंची लहरें उठातीं।
इसीलिए, संभलकर, सावधानी बरतते हुए
हम आंखों में छिपा भाव पढ़कर
आहिस्ता-आहिस्ता
अंदर तक पहुंचाने की कोशिश करते,
जैसे समुद्र में छुपे मोती को पकड़ना हो।
पूरा दिन निकल जाता,
लेकिन हमें लगता—अभी-अभी तो मिले हैं।
फिर भी हम दोनों ढूंढ नहीं पाते—
पता नहीं, कहां छुपा लिया हमने
उदयाचल से अंकुरित उजेला,
अखंड किरण से अभ्युदित
वह खोई हुई सुबह—केवल हमारी सुबह।
हम दोनों, एक-दूसरे के न्योते पर
आते-जाते रहे हैं,
पर काश! वह सुबह कहां चली गई?
अभी तक मिली नहीं।



