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बात कम और काम ज्यादा करेंगे – प्रण लें : प्रवीण नारायण चौधरी

 

जीवन में प्रगति-परिवर्तन नहीं हो सकता जो केवल डींग मारना जानते हैं । आज नेपाल की स्थिति देखकर काफी चिन्तित है आम समाज ।

प्रवीण नारायण चौधरी, विराटनगर, १५ सितम्बर ०२५ ।  (एक समग्र समीक्षा)

कई बार हमें देश सुधारने के लिये लम्बी-लम्बी बातें करनेवाले लोग मिल जाया करते हैं । भले चाय दुकान हो, रेस्टोरेन्ट-बार हो, भाषण देनेवाला सभा हो – लम्बी बातें करना उनकी आदत हो गया हो बस बात करना ही मानो उनका फितरत हो । उनका अपना अलग तर्क होता है । विद्यमानता पर प्रहार रहता है । जबकि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा कोई उदाहरण कभी बना पाए हों कि हम उनको आदर्श मानकर थोड़ी देर के लिये भी यह विश्वास कर लें कि इनका कहना सही है, ऐसा बहुत कम मिलता है ।

मैं इनको ‘गप्प-धुरन्धर-गप्पी’ मानकर अन्दर-अन्दर मुस्कुराते रहता हूँ, कभी-कभी मजा भी लेता हूँ । कई बार वीडियो भी बनाता हूँ ।

हमारे मिथिला में गप्प-धुरन्धरों की कोई कमी नहीं है । आपको लगभग हर घर में एक न एक गप्प-धुरन्धर मिल ही जाएंगे ।

नेपाल की राजनीति में गप्प-धुरन्धरों का भरमार

नेपाली राजनीति में कई क्रान्तिकारी नेताओं में गप्प-धुरन्धर जैसा लक्षण मिलता है । उनका दावा होता है कि नेपाल को स्वीटजरलैन्ड बनाया जा सकता है, सिंगापुर जैसा फ्री पोर्ट और हंगकंग जैसा फ्री पोर्ट बनाकर विश्व बाजार में नेपाल को काफी आगे ले जाया जा सकता है । परन्तु आज ३५ वर्षों से नेपाल में ऐसा कुछ भी खास परिवर्तन मुझको नहीं दिखा ।

नकारात्मकता में सकारात्मकता की स्थिति

हाँ, विगत १० वर्षों में ‘सुखी नेपाली, समृद्ध नेपाल’ जैसा नारा सुने, नेपाल में युद्धकाल से बुद्धकाल में प्रवेश होनेवाली बातें सुने, जनयुद्ध के विध्वंस उपरान्त देश में नया निर्माणकाल की बातें सुने – कुछ हद तक इन राहों पर देश को चलते भी देखा – लेकिन अन्त-अन्त में हर निर्माण कार्य के पीछे कमीशन और भ्रष्टाचार का खुलेआम प्रदर्शन देखने को मिला जिसके चलते किये गये कामों का गुणस्तर कमजोर और ‘लूट कांछा लूट’ वाली नेपाली गीतवाला सच्चाई से दिल बैठने जैसा हाल एक साथ लगते रहा ।

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एक नेताजी हैं जो किसी नगर के बड़े पद पर विराजमान हैं, उनसे मेरे एक अभिभावक किसी काम के लिये मिलने गये तो उनको यह बोलते सुना – ‘मैं कौन सा जनता का चुना हुआ हूँ, मैंने अपने पैसे खर्च किये और खरीदे हुए वोट से चुने गये’ । मेरे आदर्श अभिभावक घबरा गये, उन्होंने उनसे आगे कोई बात किये वगैर घर वापिस आ गये । बोले, मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उनसे अपना काम करने के लिये बोलता ।

नेपाल-भारत सम्बन्ध एवं सहयोग

अब आप देखिये, नेपाल में भारत का बहुत बड़ा सहयोग है, निर्माण से लेकर उद्योग-व्यापार, तकनीक, प्रविधि, आदि हरेक क्षेत्र में सहकार्य-सहयोग से मिलजुलकर आगे बढ़ने का सनातन सिद्धान्त है । जनस्तरीय सम्बन्ध है । रक्तसम्बन्ध है । अति-अति-अति-विशिष्ट सम्बन्ध है । लेकिन यहाँ पर कई नेताओं को हमेशा भारत विरोधी भावनाओं में उलझते देखा, मनमानी आरोप और बिना बात का बात बनाते हुए देखा ।

आज नेपाल-भारत मैत्री के लिये करीब-करीब २०० संगठन नेपाल-भारत में कार्य कर रही है, लेकिन मैत्री की वास्तविक पवित्रता कम और आरोप-प्रत्यारोप का वातावरण अधिक दिखा । सिर्फ चन्द बड़े लोगों के गुड बूक में अपना नाम रहे, बाकी मित्रता की जड़ें भाँड़ में जाये, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है । अपना गोटी लाल हो जाये, बाकी कोई मतलब नहीं रहता है इन्हें ।

नेपाल-भारत की राजनयिक सम्बन्धों में जमीनी-जुड़ाव कम और हवा-से-हवा यानि काठमांडू-दिल्ली सम्बन्ध अधिकतर निर्वाह होता आ रहा है । दोनों देशों की मित्रता प्रगाढ़ सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के समानता पर आधारित है, जबकि कूटनीतिक-राजनीतिक सम्बन्ध गैर-सरोकारवाले तय करते आ रहे हैं । आप गौर करके देखियेगा ।

इसका एक बड़ा उदाहरण है दो देशों के अन्तर्सम्बन्धों और सरोकारों पर विशेष सलाह-सुझाव देने के लिये गठित एक प्रबुद्धजन समूह – ईपीजी । देखियेगा कि इसके सदस्य कौन-कौन हुए । अच्छा हुआ कि उस ईपीजी के सुझावों को ‘नमो’ की स्वीकार्यता नहीं मिली अभी तक ।

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नेपाल व भारत के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों में से एक ट्रिटी अफ ट्रेड एन्ड ट्रान्जिट के विभिन्न संस्करणों को देखेंगे और इसके तहत मिली सुविधा का कितना उपयोग-सदुपयोग हो सका यह समीक्षा करेंगे तो आपको समझ में आ जाएगा भारत से प्राप्त मोस्ट फेवर्ड नेशन और नेपाली वस्तु के लिये खुला भारतीय बाजार का लाभ हम नेपाल में कितना उठा सके हैं ।

नेपाल में आर्थिक मन्दी के लिये जिम्मेदार कौन ?

सिर्फ घिसीपिटी बातें मारकर नेपाल आर्थिक प्रगति कभी नहीं कर सकती है । वैदेशिक अनुदान के भरोसे आर्थिक विकास का सपना सच होगी यह असम्भव है । उत्पादकता को बढ़ाने के लिये जो निवेश नीति है, निवेशकों को सुरक्षा की प्रत्याभूति देनेवाली नीति है – इनमें बदलाव बिना लाये पूँजी निवेशकों को नेपाल में लाना असम्भव है । अब तो ‘जेन-जी’ पुस्ता के नाम पर जिस तरह खुद ही खुद के देश में आग लगाये, ऐसी स्थिति में तो और भी मुश्किल है ।

आज भारत की आर्थिक प्रगति पर ही नजर देंगे, वहाँ पर जीएसटी जैसा कर-व्यवस्था से संघ-प्रदेश की राजश्व व्यवस्थापन की नीति है, संघ और प्रदेश दोनों स्तर पर जिस तरह से निवेशकों के प्रति उदार कर-छूट (टैक्स होलिडे), पूँजीगत सब्सिडीज स्किम एवं कई प्रकार के प्रोत्साहन (इन्सेन्टिव स्किम) इत्यादि की व्यवस्था है, युवा उद्यमी के लिये सहूलियत वाला ऋण, स्टार्ट-अप और मेक-इन-इंडिया जैसे कई उम्मीदों को जगाकर कार्य किया जा रहा है ।

नेपाल की कर-प्रणाली और उत्पादनों का मूल्य निर्धारण भारतीय उत्पादन के आधारभूत मूल्यों से तुलना तक नहीं की जा सकती । आप जब तक प्रतिस्पर्धी नहीं बनेंगे, बाजार कहाँ पर मिलेगा ? आज नेपाली उपभोक्ता भारतीय उत्पादनों के प्रति आकर्षित क्यों हैं ? क्योंकि वह काफी सस्ता है । इसीलिये खुला सीमा से पार जाकर प्रतिदिन करोड़ों मूल्यों का उपभोक्ता सामान भारतीय बाजार से खरीदते हैं । नेपाल में वह सामान उन्हें महंगा मिलता है । नीति में बदलाव नहीं लायेंगे तो आप क्या विकास करेंगे ?

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बातें बड़ी-बड़ी – व्यवहार उल्टा

नेपाल में क्या हुआ है सिवाये बड़ी बातें ‘संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र’, ‘समानुपातिक समावेशिकता’, ‘लैंगिक समानता’, ‘विभेदहीन समाज’, ‘समान राष्ट्रीयता’, ‘संघीयता’, ‘प्रादेशिक स्वायत्तता’, ‘सार्वभौमिक सम्प्रभुता’ आदि बड़ी-बड़ी नीतियों के बारे लोकलुभावना शब्दावली प्रयोग का ?

मुख में राम – बगल में छूड़ी – नीतियाँ शब्दाडम्बरों से भरी, व्यवहार में वही ‘माँगि-चाँगि लाउ, लूटि-लूटि खाउ‘ जैसी कहावतों जैसा व्यवहार करने पर हम अपने नये पीढ़ी को क्या दे पाये हैं अभी तक ?

हमेशा राजनीतिक परिवर्तन की बातें करते हैं, जब हाथ में अवसर मिलता है तो फिर से वही घिसीपिटी नीतियों पर चलते हैं । ऐसा लगता है कि हमें अनुदानों के बलबूते ही जीने का आदत पड़ गया है । जितना अनुदान लेते हैं, लेना चाहते हैं – उसका सदुपयोग भी देशहित में कम और स्वहित में अधिक करते हैं – फिर दीर्घकालीन प्रगति कहाँ से होगा ?

अभी जेन-जी पुस्ता के युवाओं ने परम्परावादी राजनीतिक शक्तियों के प्रति अपने भीतर छिपा आक्रोश को उजागर कर दिया है । केवल व्यवस्था परिवर्तन नहीं, व्यवहार परिवर्तन का जनादेश है यह अन्तिम क्रान्ति । सिर्फ तर्क-वितर्क करने से नहीं होगा, काम करना होगा और जमीनी परिवर्तन लाना होगा । बस ।

आशा है कि अब भी देश निर्माण के लिये ईमानदार बनेंगे । नीतियों में परिवर्तन लाकर देश की शिथिल अर्थव्यवस्था को आगे ले जायेंगे । व्यापारियों को भगाने-भागने की बात नहीं करेंगे । एक-दूसरे का सहयोग एवं समर्थन करेंगे । नेपाल की प्रगति दूर नहीं है । बात तो बिल्कुल नहीं बनायेंगे, व्यवहार सही करेंगे, प्रण लें ।

हरिः हरः!

प्रवीण नारायण चौधरी,
समीक्षक, विराटनगर ।

 

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