नेपाल की राजनीतिक विडम्बना: देवेश झा
संघीयता के प्रश्न में उलझ गई राजनीति और तीन प्रमुखदल के नेताओं द्वारा की जाने वाली सहमति अथवा मोल मोलाई से कोई निष्कर्ष आएगा और देश संविधान सभा द्वारा नया संविधान बना हुआ देख पाएगा, इस सुखद समाचार के इन्तजार की अवस्था में है । मगर सत्य क्या है ? इसके विश्लेषण हेतु नेपाली राजनीति के धुरन्धर दलों के विगत में रहे राजनीतिक नारा, माँग एवं चिन्तन को देखना होगा । २०४६ साल के जनआन्दोलन में नेतृत्व किये हुए ने.काँ. की माँग संवैधानिक राजतन्त्र और बहुदलीय प्रजातन्त्र थी । इसी मूल माँग पर सहमत होकर तत्कालीन बाम मोर्चा उस आन्दोलन में सहभागी हुए थे । उनकी माँग पूरी भी हुई । तत्कालीन अवस्था में आन्दोलन राजा के साथ सहमति में समाप्त किया गया । वैसे तो नेपाल में सभी प्रकार के आन्दोलन अन्ततः समझौता में ही समाप्त होना यथार्थ है । बाद में ने.काँ. और एमाले द्वारा संविधान लेखन तथा बिना निर्वाचन सत्तारोहण करते हुए आम निर्वाचन द्वारा स्वयं को विजयी घोषित भी किया गया । यदि मेरी स्मरणशक्ति कमजोर नहीं है तो उस संविधान को विश्व का उत्कृष्ट संविधान कहा गया था । परन्तु उस संविधान को उसके प्रवर्तकों ने ही फाड़कर फेंक दिया । फिर यह कोई नई घटना भी नहीं थी । इससे पूर्व निर्दलीय पंचायती संविधान को निर्विकल्प घोषणा करने वाले तत्कालीन राजा द्वारा ही पंचायती संविधान को निरस्त बनाया गया । बाद में माओवादी मैदान में आए । उन्होंने गणतन्त्र को मुख्य माँग बनाया । २०६२ के आन्दोलन द्वारा छद्म रूप में प्रस्तुत माओवादी राजतन्त्र की विदाई तक तो सफल दिखे परन्तु अभी नेपाली राजनीति के रंगमंच पर वे हाशिये पर आ गए हैं ।
राजनीति में गुप्त एजेण्डाओं का होना अनूठा नहीं है । पर ऐसे एजेण्डे सहायक रूप में मात्र होते हैं । हमेशा दूसरों को इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति अन्ततः स्वयं को ही कठपुतली बना देती है । कम से कम राणाकाल से अभी तक हुआ यही है । दूसरों का शिकार करने गए हुए वीर स्वयं शिकार हो गए । १९५० की सन्धि करके भी राणा अपनी सत्ता बचा न सके । स्वयं मृत हो चुकी प्रतिनिधि सभा पुनस्र्थापित करने वाले राजा को उसी प्रतिनिधि सभा ने राजगद्दी से ही विदा कर दिया । संविधान सभा की पहली बैठक से गणतन्त्र घोषणा करवा कर भी प्रचण्ड पहले राष्ट्रपति तो न बन सके बल्कि आज एक दिग्भ्रमित क्रान्तिकारी हो गए और पार्टी टुकड़ा टुकड़ा होकर हाल बनने वाले संविधान में साक्षी बनने के अलावा उनके पास अधिक विकल्प नहीं है ।
वर्तमान नेपाली राजनीति में चार प्रमुख शक्ति हैं । ने.काँ., एमाले, माओवादी और मधेस । विचारधारा और उस पर आधारित माँगों सहित प्रस्तुत इन शक्तियों में से ने.काँ और एमाले की माँगों का २०४६ साल में ही सम्बोधन किया जा चुका है । माओवादियों की भी मुख्य माँग “गणतन्त्र” पूरी हो चुकी है । अब मधेस की बारी है । संघीयता मधेस की एकमात्र माँग थी । तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला की सरकार द्वारा चलाई गई गोली से ही ५४ मधेसी शहीद हुए थे । अन्ततः गिरिजा सरकार बाध्य हुई और संघीयता ने अन्तरिम संविधान में स्थान प्राप्त किया । अभी विभिन्न बहाना में पहले किये गये वचन–वद्घता से पीछे हटने का प्रयास जारी है । कभी राष्ट्र के विखण्डन का बहाना, कभी पहचान के नाम पर बिना माँगा हुआ जातीय पहचान लादकर, कभी सामाजिक सद्भाव बिगड़ने का खतरा दिखाकर तो कभी जनमत परिवर्तन की घुर्की दिखाकर । पर आश्चर्य तो ये है कि इन बहानों को दिखाने वाले दल और उनके नेता एक भी मधेसी को अपने पक्ष में खड़ा नहीं कर सके । यहाँ तक कि उन दलों में महत्वपूर्ण पदों पर जमे हुए अपने नेता अथवा कार्यकत्र्ताओं से भी कुछ कहलवाने में ये दल असफल रहे हैं । मधेस की जनमत यथावत है । पहले संविधान सभा में ११.३∞ मतप्राप्त करने में सफल मधेस केन्द्रित दलों को इस संविधान सभा में ११.६∞ मत प्राप्त हुआ है । मतप्रतिशत बढ़ने पर भी गत चुनाव मे ८२ सीट हासिल करने में सफल मधेसी दल इस बार के चुनाव में कुल ५० सीटों पर ही सन्तुष्ट रहने को बाध्य हैं । यह त्रुटि मधेसी जनता की न होकर मधेसी दल और उनके नेताओं की अज्ञानता का परिणाम है ।
महाभारत में एक रोचक प्रसंग है । पांडवों के लिये मात्र पाँच गाँव मांगने गए श्रीकृष्ण को अहंकार में चूर दुर्योधन ने बिना युद्घ सूई के नोक बराबर भी भूमि देने से इन्कार कर दिया । बाद में सम्पूर्ण हस्तिनापुर राज्य के साथ–साथ अपना जीवन ही खो बैठा । नेपाल में भी विभिन्न कालखण्ड में इसी प्रकार की घटनाएं हुई हैं । राणाओं के पारिवारिक शासन में आमजनता ने आंशिक सहभागिता करनी चाही तो चार नेपाली जनता को फाँसी देकर राणाओं ने वीरता का प्रदर्शन किया । राणा शासन का उन्मूलन ही नहीं हुआ अपितु कालान्तर में राणा खलपात्र हो गये । २०३६ के जनमत संग्रह के बाद तत्कालीन दलों ने पंचायती व्यवस्था में ही कुछ उदारता चाही थी पर विजय के मद में चूर शासकों ने उस व्यवस्था को निर्विकल्प कहते हुए सहमति का द्वार बन्द कर दिया । परिणामस्वरूप पंचायती व्यवस्था ही समाप्त हो गयी । माओवादियों ने तत्कालीन राजा के समक्ष संविधान सभा का निर्वाचन को विद्रोह समाप्ति की शर्त के रूप में रखा पर चाटुकार दरबारियों और मूर्ख सलाहकारों के घेरे में बैठे राजा ने नहीं माना । २४० वर्ष पुराना राजतन्त्र इतिहास हो गया ।
अनूठा ही मानना पड़ेगा पाँच गाँव मांगने पर नहीं देने परन्तु बाद में सम्पूर्ण हस्तिनापुर राज्य ही हारना नेपाली राजनीति की विशेषता बन गई है । संघीयता के लिये हुए मधेस आन्दोलन में ५४ मधेसी की शहादत के पश्चात ही तत्कालीन गिरिजा सरकार ने संघीयता को संवैधानिक दर्जा देना स्वीकार किया था । १९ नेपालियों का जीवन समाप्त होने पर तो राजतन्त्र ही इतिहास बन गया तो फिर मधेस ने तो कहीं अधिक प्राणोत्सर्ग कर दिया है । पिछले समय में सिम्रौनगढ में सड़क के लिये, कलैया और गौर में सेवा केन्द्र विस्तार के सरकारी निर्णय विरुद्घ मधेस में जान की बाजी लगाने का क्रम जारी है । अपने नागरिकों को जान की बाजी लगाने की बाध्यता राज्य को समय रहते ही महसूस कर उस परिस्थिति को रोकने के लिये हर हमेशा सचेत रहना उसका कर्तव्य है ।

