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अगर मेरा सरनेम पौडेल,थापा या भट्टराई होता, तो सवाल ही नहीं उठता : टासी सी ल्हाजोम का बयान

 

काठमांडू, 12 अक्टूबर 2025 । नेपाल में जेन–जी आंदोलन की युवा प्रतिनिधि टासी ल्हाजोम हाल ही में तब विवादों में घिर गईं जब उनके नाम को संभावित मंत्री के रूप में चर्चाओं में लाया गया। उनके नाम पर नागरिकता और पहचान को लेकर उठे सवालों के बीच, उन्होंने कान्तिपुर से खुलकर बातचीत की।

“मैं जनजाति हूँ, इसलिए सवाल उठाए जा रहे हैं”

ल्हाजोम कहती हैं —

“शायद यह विवाद सिर्फ इसलिए उठा क्योंकि मैं जनजाति समुदाय से हूँ। अगर मेरा नाम टासी पौडेल, थापा, भट्टराई या घिमिरे होता, तो शायद किसी को सवाल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन मैं टासी ल्हाजोम हूँ — एक सीमांत समुदाय से आने वाली युवती, नेपाल के एक ऐसे सुदूर इलाके लिमी घाटी से, जिसके बारे में बहुत कम लोगों ने सुना होगा। मेरे चेहरे और बोली को देखकर कहा गया कि मैं नेपाली जैसी नहीं दिखती, क्योंकि मेरी मातृभाषा खस नेपाली नहीं है।”

साभार: कान्तिपुर दैनिक

“कोलम्बिया यूनिवर्सिटी की प्रोफाइल हटाई गई, मुझे भी नहीं पता क्यों”

 

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ल्हाजोम ने बताया कि उन्होंने अमेरिका की कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में हरित उद्यमशीलता (Green Entrepreneurship) से संबंधित एक फेलोशिप कार्यक्रम में भाग लिया था। यह फेलोशिप “तिब्बती और हिमालयी समुदायों” के युवाओं के लिए थी।

“मैं वहाँ प्रतिस्पर्धा के आधार पर चयनित होकर गई थी। हमारे समूह में नेपाली, भारतीय और तिब्बती पृष्ठभूमि के प्रतिभागी थे। विश्वविद्यालय ने मेरी प्रोफाइल क्यों हटाई, यह मुझे खुद नहीं पता,” — ल्हाजोम ने कहा।
उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य केवल अपने क्षेत्र लिमी घाटी के लिए इको-टूरिज्म और सहकारी विकास के मॉडल सीखना था, ताकि स्थानीय समुदाय को आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

“जेन–जी आंदोलन हिमाली और जनजातीय युवाओं का भी प्रतिनिधित्व करता है”

टासी ल्हाजोम ने कहा कि उन्होंने जेन–जी आंदोलन में हिमालय क्षेत्र के युवाओं की आवाज़ को मुखर करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाई।

“अगर हमने नेतृत्व नहीं किया, तो आने वाले समय में हमारी आवाज़ दब जाएगी। इसलिए मैंने हिमाली और आदिवासी युवाओं को एकत्र कर ‘इंडिजिनियस जेन–जी कलेक्टिव्स’ की शुरुआत की,” उन्होंने बताया।
उनके अनुसार, जेन–जी आंदोलन किसी एक जाति या वर्ग का नहीं, बल्कि विविधता से भरा एक जनआन्दोलन है —
“इसमें मधेसी, दलित, मुस्लिम और जनजातीय सभी समुदायों के युवा हैं। फर्क इतना है कि सीमांत इलाकों के युवाओं ने भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का ज्यादा दर्द झेला है।”

“मंत्री बनने की चर्चा बिना सलाह के चली”

जब उनसे पूछा गया कि क्या वे खुद मंत्री बनना चाहती थीं, तो उन्होंने स्पष्ट कहा —

“मेरा नाम कभी भी मैंने खुद आगे नहीं बढ़ाया। मैं तो चाहती थी कि अन्य साथियों को अवसर मिले। उस समय मैं भारत में थी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक क्षेत्रीय कार्यशाला में भाग लेने के लिए। मुझे बाद में पता चला कि मेरा नाम चर्चा में है।”

“जेन–जी आंदोलन बिखरा हुआ है — यही उसकी ताकत और कमजोरी दोनों है”

ल्हाजोम का मानना है कि जेन–जी आंदोलन में विविधता जितनी बड़ी शक्ति है, उतनी ही चुनौती भी —

“यह आंदोलन बहुत बिखरा हुआ है। हर कोई अपनी जगह से बोल रहा है। यही हमारी ताकत भी है और कमजोरी भी। अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम व्यक्तिगत स्वार्थ और राष्ट्रीय स्वार्थ के बीच की रेखा को साफ़ कर सकें।”

निष्कर्ष:
टासी ल्हाजोम का यह बयान नेपाली समाज में जातीय पूर्वाग्रह, पहचान और समान प्रतिनिधित्व के सवालों को फिर से केंद्र में ले आया है। जेन–जी आंदोलन से जुड़ी यह नई बहस सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि नेपाल के सामाजिक न्याय और समावेशी पहचान की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। साभार: कान्तिपुर दैनिक

 

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