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नेपाल की अर्थव्यवस्था में छिपी हुई संकट: राकेश मिश्रा

 
राकेश मिश्रा
अर्थ विज्ञ
काठमांडू, ४ नवंबर । बैंक भरे पड़े हैं नकदी से, लेकिन कर्ज क्यों नहीं बढ़ रहा ? नेपाल में एक चिंताजनक रुझान चल रहा है जिस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। बैंकों में नकदी का भंडार भर गया है, लेकिन नए कर्जों का वितरण लगभग ठप हो चुका है।

नेपाल राष्ट्र बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के पास लगभग 1.161 ट्रिलियन नेपाली रुपये की अतिरिक्त तरलता जमा है। जमा राशि में भारी उछाल आया है, लेकिन नए कर्ज महज टपक रहे हैं।इसी बीच, ब्रॉड मनी सप्लाई 7.8 ट्रिलियन नेपाली रुपये को पार कर चुकी है, जो पिछले साल की तुलना में 12.4% की बढ़ोतरी दर्शाती है।यह हमें क्यों चिंतित करना चाहिए?

  1. पूंजी पलायन का खतरा बढ़ रहा है
    जब इतनी बड़ी राशि बेकार पड़ी रहती है, तो लोग और संस्थाएं ऊंचे रिटर्न या सुरक्षित ठिकानों की तलाश में विदेश की ओर रुख कर सकती हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार घटेगा, नेपाली रुपया कमजोर होगा और पूरी अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ेगा।
  2. विकास रुक रहा है, निवेश सूख रहा है
    कर्ज न मिलने से व्यवसाय पीछे हट रहे हैं, नई परियोजनाएं शुरू नहीं हो रही हैं, नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं। कাগजों पर तरलता भले ही प्रचुर दिखे, लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था में मंदी का खतरा मंडरा रहा है।
  3. राजनीतिक अस्थिरता की आग में घी
    हाल की राजनीतिक उथल-पुथल और सामाजिक अशांति के बाद कारोबारी विश्वास पहले से ही डगमगा रहा है। बेरोजगारी, पूंजी बहिर्वाह और आर्थिक सुस्ती मिलकर विरोध प्रदर्शन, आरोप-प्रत्यारोप और शासन संकट को जन्म दे सकती है।
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क्या किया जाए?सरकार और केंद्रीय बैंक को मिलकर इस बेकार नकदी को उत्पादक निवेश में बदलना होगा:

  • बुनियादी ढांचा परियोजनाएं तेज करें
  • निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन दें
  • निर्यात आधारित उद्योगों को बढ़ावा दें
  • विश्वास बहाली के ठोस कदम उठाएं

अगर नीति-निर्माता किताबी उपायों से हटकर व्यावहारिक समझदारी दिखाएं, तो इस संकट को अवसर में बदला जा सकता है।आशा है, तूफान आने से पहले जागें नीति-निर्माता!अर्थव्यवस्था का संकट सिर्फ आर्थिक नहीं, राजनीतिक भी है। समय रहते कदम न उठाए गए तो परिणाम भयावह होंगे। स्टेटस से

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