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मेरी नेपाल यात्रा : सरोज दहिया

सरोज दहिया, हलालपुर सोनीपत हरियाणा भारत ।

27 जून 2022, मैसेंजर पर वरिष्ठ साहित्यकार बंधु मेरे बड़े भाई श्री सनत रेग्मी जी का भेजा आमंत्रण पत्र और दाजू की मिस काल, ओह ! लिखा था, ” फोन उठाओ, मेरी बहन ।”

मैंने तुरंत फोन मिलाया, भाई ने सब बताया, मुझे अपार खुशी हो रही थी कि बड़े भाई के देश साहित्यिक आयोजन का हिस्सा बनने जा रही हूं ।
बीच में चार दिन शेष, वृद्ध पति में न साथ चलने का उत्साह, न साथ देने की परवाह, घर बैठे रहकर चिंता झेलना ही जिनका स्वभाव।
लेकिन पड़ोसी देश से आमंत्रण और साथ में प्रेम पूर्ण आग्रह, कौन टाल सकता है भला ?
30.06.2022 को घर से चल पड़ी, गूगल पर सर्च किया रास्ता बार बार ‘नानपारा’ आ रहा था, तो बस में स्लीपर की बुकिंग नानपारा तक की करवाई थी, कश्मीरी गेट दिल्ली मैट्रो गेट नंबर पाँच पर निश्चित समय से एक घंटे पहले पहुंच गई, नेपाल-नेपाली भाई , आदि कवि भानू भक्त जी की मूर्ति का अनावरण, सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन सभी के एक ही दिन में दर्शन किसी आकस्मिक मिले देव दर्शन से कम नहीं थे ।
रात नौ बजे बस दिल्ली से चली, सुबह आठ बजे नानपारा आने वाला था, पहले ही पता चल चुका कि बस आगे नेपाल बॉर्डर रूपैड़िया तक जायेगी ।
भाईसाहब के पास मैसेज किया, उन्होंने बताया बिल्कुल नजदीक है, साथ में घर का पता लिख दिया और कहा कि बिल्कुल दिक्कत नहीं होगी, मैं नेपाल की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी, सामान उठाने के लिए एक लड़का ले लिया था बोर्डर से ही, चैकपोस्ट पर नेपाल को बारम्बार नमन किया, कैसे ?
प्रश्न उछल चुका होगा पाठक के मन में, सुनिए, ” चैक पोस्ट पर सामान चैक करने के लिए रोक लिया गया, तीन नग थे, सबसे बड़े में मेरी प्रकाशित पुस्तकों की दो दो काॅपी थी, वे भाईसाहब और प्रज्ञा संस्थान के लिए लाई थी, सबसे पहले वही खोला गया, पुस्तकें दिखाई दी जिन्हें देखकर निरीक्षण कर्मचारी का मुझ विदेशी के लिए सम्मान में सिर झुकाकर बोलना, ” अरे ! आप साहित्यकार हैं क्या ? जाइए, जाइए
और बैग की चेन बंद कर मेरे थैलै उठाने वाले लड़के को थमा दिया, जिस देश में साहित्यकारों का इतना सम्मान हो उस देश को बुलंदियों पर जाने से कोई नहीं रोक सकता, साहित्यकार का सम्मान मतलब ज्ञान का सम्मान और जहांँ ज्ञान का सम्मान वहाँ सोच में समृद्धि ।
75 वर्षीय दाजू सनत रेग्मी घर से चल कर मुझे रिसिव करने मोड़ तक ही आ पाये थे कि आॅटो में बैठी बहन को पहचान आॅटो वाले को रुक जाने का इशारा कर खुद भी खड़े हो गए थे ।
आॅटो में साथ बैठकर घर तक आये और घर आने से कुछ कदम पहले ही आॅटो वाले से किराया पूछकर पकड़ा दिया और फूर्ति से घर के आगे उतर कर भीतर चले गए, मैं कुछ समझती उससे पहले ही भाईसाहब सम्मान पट्टी लेकर अपने दरवाजे पर खड़े मुस्कान के साथ मुझे आगे की ओर बढ़ने का इशारा कर रहे थे, साहित्यकार आगन्तुक के लिए गले में सम्मान पट्टिका डाल कर दरवाजे पर स्वागत और चेहरे पर झलकता प्रेम भाव चित्र भले ही बता दे, मेरे पास शब्द चित्रण के लिए शब्द नहीं ।
प्रसन्नता बढ़ती जा रही थी, भाईसाहब का पुस्तकालय देखकर मन में एक अजीब सी स्फूर्ति भर गई, नेपाली साहित्य की भरमार के साथ साथ अंग्रेजी और हिंदी की पुस्तकें, डॉ नगेन्द्र जी का साहित्य, अज्ञेय जी का साहित्य!!!!
वाह ! भाई साहब, बहुत खूब और बहुत खूब पुस्तकालय जिसकी चारों ओर की दीवारों पर भाई साहब को समय समय पर मिले देश और विदेश के सम्मान। पत्र और स्मृति चिन्ह
शीशों के पीछे झाँककर मुस्कुरा रहे थे, मुझ गंवार पर और शायद व्यंग्यात्मक कि तू जहाँ आई है वह पुस्तकालय, वह घर उस साहित्यकार का है जिसकी लिखी कहानियों के अनुवाद अमरीका और यू०के० के स्कूल सिलेबस में पढ़ाये जा रहे हैं ।
भाभी जी के दिव्य दर्शन और जलपान की ट्रे साथ साथ दिखाई दी, अभिवादन के बाद सबसे पहले विडियो बना कर बच्चों के पास भेज दी क्योंकि पतिदेव को तो वाट्स एप और फेसबुक लाख सिखाने पर भी नहीं आया, बस यूट्यूब देखते हैं और फोन कर या सुन लेते हैं, विश्वास था बच्चे विडियो देखते ही पापा को फोन करके सब बता देंगे ।
चलने फिरने से लाचार भाभी श्री को देखकर अपनी तीन साल पहले की अवस्था कैसे याद न आती, जैसे अपना इलाज खुद किया था, वे ही नुख्शे भाभी जी को लिख दिए और जलपान के बाद भाई साहब के साथ होटल में आ गई, जो समारोह में आमंत्रित मेहमानों के लिए पहले से नेपाल गंज महानगर पालिका और भेरी समाज ने बुक करवा रखा था । कमरे की चाबी लेकर भाई साहब मुझे कमरे तक छोड़ने आये और कमरा खोल कर सबसे पहले बाथरूम में झांक कर होटल से साथ आये लड़के को कमरा बदल देने को कहा। यह भाई साहब की सूक्ष्म बुद्धि का कमाल है कि मेरे बताए बगैर मेरी दिक्कत का अंदाजा लगा कर कमरा बदलवा कर और उसमें मेरा सामान रखवा कर ताला बंद कर मुझे होटल के ग्राउंड फ्लोर पर लेकर आए और जब मैंने उन्हें बताया कि मैं यहां खाना नहीं खा सकती क्योंकि होटल पर नाॅनवेज लिखा था तब मुझे वहां से दूसरे रेस्तरां में ले गये जो पूर्णतया शाकाहारी भोजनालय था । मुझे खाना खिलाकर होटल तक छोड़ कर चले गए थे यह कहकर कि शाम पांच बजे आऊंगा, तैयार रहना, घूमने चलेंगे। मैं तो तीन बजे ही नीचे उतर आई क्योंकि चप्पल जवाब दे चुकी थी, बाजार जाना जरूरी हो गया था, भाईसाहब चार बजे आ गये थे और मेरे कहने पर अगले दिन की वापसी के लिए बस में स्लीपर की बुकिंग करवा दी थी, मुझे समारोह स्थल से सीधे घर वापसी के लिए चल पड़ना था, क्योंकि घर पर भोलेनाथ ने न जाने ठीक से खाया होगा या नहीं, यह चिंता हमेशा की तरह सिर पर सवार थी, इसी चिंता के कारण मैं अकेली मायके में भी रात को रुकती नहीं अक्सर और यदि रुकना पड़े तो अगले दिन काम की पूर्णता पर एक मिनट भी रुकना नहीं चाहती, भतीजे भतीजी मजाक बना देते हैं अक्सर लेकिन मुझे परवाह नहीं, जो मेरा पहला धर्म कर्म है उसको अच्छी तरह निभाते जीवन बीत जाये तो श्रेयस्कर । भाईसाहब सनत रेग्मी जी मुझसे ग्यारह साल बड़े होकर भी इतने चुस्त दुरुस्त हैं कि मुझे स्वयं पर लज्जा आ रही थी, मैं उनसे बहुत पीछे रह जाती और वे बार बार खड़े होकर इंतजार कर रहे होते, किसी तरह वागेश्वरी देवी, मूंछों वाले महादेव, दिव्य ताल, राजा विरेन्द्र विक्रम शाह का विजय स्तंभ देखा, विडियो बनाई चर्चा की तब तक मेरी हिम्मत जवाब दे गई
भाईसाहब सब कुछ दिखाने पर तुले हुए और मैंने कह ही दिया , ” भाईसाहब बस, और जगह फिर कभी, अभी पैर दर्द कर रहे हैं, रिक्शा ली और घर आ गए, शाम हो चुकी थी, शाम का खाना बना कर भाभी जी हमारा इंतजार कर रही थीं, खाना खाया, कुछ गप्प शप्प और फिर होटल की ओर रवाना, तब तक बाहर से आने वाले सभी साहित्यकार होटल में आ चुके थे, भाईसाहब ने सभी का परस्पर परिचय कराया, दो बंधु तो फटाफट फेसबुक मित्र सूची में दर्ज हो गये और दोनों का प्रेम, सौहार्द्र और सहयोग आयोजन की समाप्ति तक बरकरार रहा, मैंने बारम्बार अपने भाग्य की सराहना की जिसने मुझ गंवार को अनेक भाषा भाषी साहित्यकारों के साथ ला खड़ी किया , देर रात तक एक महिला साहित्यकार और आ चुकी थी श्रीमती श्रुति भट्टाचार्य जी, हम दोनों ने एक ही रूम लेकर दूसरे की चाबी प्रबंधन को सौंप दी और रात के दो बजे तक खूब बात की वे गजलकार थी और फिल्मी हस्ती जिसका मुझे बातों के दौरान पता चला, अगले दिन समारोह स्थल पर उसने ही मेरे फोटो अपने कैमरे से लेकर मुझे भेजें ।
भाई ऋषि आजाद बहुत सहयोगी रहे, बहुत ही हँसमुख दम्पत्ति, दोनों साहित्यकार, और दूसरे भाई ने तो अगले दिन मेरा बैग तक उठा लिया था, बार बार मांगने पर भी नहीं दिया जब तक समारोह स्थल पर न पहुंच गए ।
सुबह आठ बजे भानू चौराहा नेपाल गंज फिर से नमन करवा गया, आदि कवि भानू भक्त जी की मूर्ति का अनावरण करने वाले स्थानीय मंत्री जी और नेपाल साहित्य अकादमी के कुलपति श्री गंगा प्रसाद उप्रेती जी निवास स्थान से चौराहे तक पैदल चल कर आना दिल को छू गया, मैं सोच रही थी कि तामझाम, लाव-लश्कर के साथ आगमन होगा लेकिन जब चार छः भद्रपुरुष मूर्ति का अनावरण करने के लिए नंगे पैर चलकर आते और मूर्ति की ओर चलते दिखाई दिए तब समझ आई कि पूरे नेपाल वासियों को सचमुच साहित्यकारों के प्रति इतनी श्रद्धा होती है !!!
अनावरण के बाद जलपान पर भाई साहब सनत रेग्मी और गंगा प्रसाद उप्रेती जी के साथ, यह तीसरा अवसर था सिर झुका लेने का, श्रीमान उप्रेती जी की सरलता और सादगी तो देखने लायक थी ही, बातचीत के दौरान उनके सौम्य स्वभाव की झलक भी मिल चुकी थी, सुयोग्य व्यक्तित्व जब अदना पात्र के साथ आत्मीयता पूर्ण व्यवहार करे तो मन ही मन श्रद्धा खुद बन जाती है, जलपान और भोजन दोनों बार उप्रेती जी का साथ रहा और भाईसाहब ने आग्रह कर कर के दो दिन जितना …
दोनों को नमन।
बारिश शुरू हुई और जोरदार, फन पार्क समारोह स्थल तक संस्थान द्वारा बुक की गई बसें, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम वहीं था,
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी लेकिन पार्क की मैनैजिंग कमेटी भी बेमिसाल, हर व्यक्ति को छाता लगाकर उतार रहे थे और छाते से ही हाॅल तक ले जा रहे थे, पहले साहित्यिक सम्मान समारोह तत्पश्चात लंच और उसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम।
मैं जैसे ही हाॅल में पहुँचने पर एक सीट पर बैठी मुझे बुलाने एक व्यक्ति आया जो भाई साहब ने यह कहकर भेजा था कि सरोज दहिया को भोजन पर हमारे साथ ले आओ, बहुत अच्छा लगा सुनकर कि सचमुच भाईसाहब बड़े भाई और मेजबान दोनों की भूमिका बहुत अच्छी तरह से अदा कर रहे हैं, आग्रह कर कर के भरपेट भोजन कराया क्योंकि उनको भी पता था कि मेरा उस दिन रात का भोजन गोल होना था ।
मुझे बोलने का समय मिला, जो टूटे फ़ूटे शब्द मेरे पास थे बोल दिये लेकिन बोलना शुरू करने से पहले एक बार फिर नेपाल के साहित्यकार भाईयों ने मुझे आश्चर्य चकित कर दिया, यह कि सभी मंचासीन विद्वज्जन नीचे आकर श्रोताओं की अग्रिम पंक्ति में वक्ता के सामने .. वाह नेपाल, जय नेपाल और जय नेपाली । सम्मान पत्र, शाल और प्रेम को अपने हृदय में समेटकर मंच से नीचे आकर दूसरे साहित्यकारों को सम्मानित होते हुए देखा । सांस्कृतिक आयोजन बेमिसाल, एक से बढ़कर एक गजलकार, श्रुति भट्टाचार्य को सुनकर अपने सुनाये शब्द बौने प्रतीत हुए, सभी कुछ कैमरे में कैद कर लिया, फन पार्क की सुंदरता इस आयोजन को और अधिक सुंदर बना गयी या आयोजन ने फन पार्क की सुंदरता को द्विगुणित दिखाया नहीं बता सकती, दोनों ही एक दूसरे की शोभा को बढ़ा गये यही कहना ज्यादा उचित है । भाईसाहब, श्री उप्रेती महोदय, भाई ऋषि आजाद दम्पत्ति और जिन जिन से बातचीत हो चुकी थी सभी से विदा मांगी और भाईसाहब के साथ फन पार्क के गेट पर पहुंच गई, रिक्शा रुकवा ली, बस अड्डे तक साथ चलना चाहते थे, मैंने रोक दिया क्योंकि समारोह अभी दो घंटे और चलने वाला था और भाईसाहब की वहां उपस्थिति अति आवश्यक थी ।
कुल मिलाकर एक अति सुखद अहसास के साथ घर की ओर रवाना हो गई । रिक्शा चल रही थी और मैं मुड़ मुड़ कर फन पार्क के गेट की ओर देख रही थी जब तक वह आँखों से ओझल न हो गया भाईसाहब सनत रेग्मी गेट पर खड़े रिक्शा को बढ़ते देख रहे थे ।
एक गलती जो व्यस्तता के कारण हुई वह थी कि प्रज्ञा संस्थान और भेरी समाज लाइब्रेरी को भेंट के लिए जो पुस्तकें ले गयी थी उनपर अपने हस्ताक्षर करना भूल गई ।
पुस्तकें तो भाईसाहब ने सभी जगह दे दी होगीं इसमें संदेह नहीं क्योंकि उन्होंने ही मुझे फोन पर गिनती बताई थी कि कितनी कितनी प्रतियां कहाँ कहाँ भेंट होंगी ।
नेपाल गंज महानगर पालिका, भेरी समाज, नेपाल भारती साहित्य संगम और प्रज्ञा साहित्य संस्थान नेपाल के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए इति ।

सरोज दहिया
हलालपुर सोनीपत हरियाणा भारत ।
मोबाइल नंबर -8295875606
दिनांक -03.07.2022

सरोज दहिया
हलालपुर सोनीपत हरियाणा भारत ।
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