जेन जी आन्दोलन -आखिर क्यों जला नेपाल ? : डॉ. श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी, अंक नवंबर । नेपाली राजनीति में अब तक सत्ताधारियों ने जो राष्ट्रघात किया, राजनीतिक भ्रष्टाचार में जो उनकी लिप्तता रही, भयंकर रिश्वतखोरी, तस्करी, दलाली, माफिया, पार्टी व्यवस्था, यहाँ तक कि पार्टी के भीतर के सत्ताधारी गुटों द्वारा देश को टुकड़े–टुकड़े करने पर लोगों में जो गुस्सा था, वही जेन–जी विद्रोह के रूप में पिछले दिनों फूट पड़ा । दो दिवसीय जेन–जी विद्रोह ने नेपाल में ऐतिहासिक उथल–पुथल मचा दी है, जिसकी कल्पना सरकार या विपक्ष में से किसी ने नहीं की थी । इस विद्रोह के पर्दे के पीछे कौन था ? उनका असली लक्ष्य और उद्देश्य क्या था और क्या है ? इसका पर्दा धीरे–धीरे उठ रहा है और समय के साथ स्पष्ट होता जाएगा । भ्रष्टाचार की आड़ में भाद्र २३ गते के विद्रोह का चरम भाद्र २४ गते को देखने के लिए मिला । ओली सरकार ने पहले सोशल मीडिया बंद किया और फिर आंदोलन के दौरान निहत्थे जेन–जी पीढ़ी का कठोर दमन करके आग में घी डालने का काम किया । नेताओं ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया है कि आंदोलन में घुसपैठ हुई थी, लेकिन घटनाक्रम ने पुष्टि की है कि यह कोई साधारण घुसपैठ नहीं थी ।
अब यह समझना मुश्किल नहीं है कि यह विश्व साम्राज्यवाद, विशेषकर अमेरिकी साम्राज्यवाद और विभिन्न क्षेत्रों में उसके नेपाली दलालों का कार्यक्रम था । हालाँकि, शासकों के विरुद्ध जेन–जी पीढ़ी के युवक–युवतियों का गुस्सा और माँगें जायजÞ और उचित थीं । जेन–जी पीढ़ी के आह्वान पर, जनता स्वतःस्फूर्त रूप से सड़कों पर उतर आई थी । किन्तु घुसपैठियों की वजह से उनका विद्रोह भीषण हिंसा में बदल गया । राज्य राजनीतिक नेतृत्व, जन–धन, जन–जीवन और समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहा और आंदोलन दिशाहीन हो गया, जिससे जन–धन और अरबों डॉलर की सार्वजनिक और निजी संपत्ति का भारी नुकसान हुआ । विद्रोह के नाम पर जो देश ने देखा उससे यह स्पष्ट होता है कि जेन–जी पीढ़ी का उपयोग करके इसके भीतर एक बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र रचा गया था । वर्तमान स्थिति, जहाँ जेन–जी युवा पीढ़ी का नेतृत्व और एजेंडा, दोनों छीन लिए गए हैं, भी इसकी पुष्टि करती है । जेन–जी पीढ़ी की शुरुआती माँगें थीं ः मीडिया पर प्रतिबंध हटाना, भ्रष्टाचार का अंत, ‘नेपोकिड्स’ का चलन खत्म करना और एक स्थिर सरकार की स्थापना । बाद में, उन्होंने विभिन्न कोणों से अपने उद्देश्यों को सामने रखा, जिनमें संसद भंग करना, संविधान का पुनर्लेखन, सरकार के स्वरूप में बदलाव, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई और जेन–जी पीढ़ी के प्रतिनिधियों वाली एक नई अंतरिम सरकार का गठन जैसी माँगें शामिल थीं । सुशीला के नेतृत्व में सरकार के गठन की प्रक्रिया और आगामी फाल्गुन २१ को मध्यावधि चुनाव कराने के लिए उसे मिले जनादेश से भी संकेत मिलता है कि जेन–जी पीढ़ी का इस्तेमाल करके यहाँ एक अलग ही खेल खेला जा रहा है ।
इन सबके बीच ‘जेन जी’ शब्द ने नेपाली जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा । आखिर इस शब्द के मायने क्या हैं और कहाँ से यह अस्तित्व में आया ? जेन–जी पीढ़ी दुनिया भर में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर केंद्रित आंदोलनों में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है । इस पीढ़ी के लिए संचार के मुख्य साधन इंटरनेट, सोशल मीडिया, मोबाइल फोन, तकनीक आदि हैं । उन्होंने इसका उपयोग दुनिया भर में बड़े आंदोलनों को संगठित और संगठित करने के लिए किया है, और नेपाल में भी, उन्होंने इन्हीं माध्यमों का उपयोग करके आंदोलन आयोजित और संगठित किए हैं । उन्होंने जलवायु परिवर्तन, सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, लैंगिक समानता, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल स्वतंत्रता और डेटा सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार, भ्रष्टाचार, स्थिरता, आर्थिक विकास, राज्य उत्पीड़न, सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उत्पीड़न, सामाजिक स्वतंत्रता, सूचना और संचार की गारंटी आदि जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हुए दुनिया भर में बड़े आंदोलन आयोजित किए हैं ।
बात २०१८ की है जब स्वीडेन की युवा पीढ़ी ने स्वीडन में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के विरुद्ध एक आंदोलन शुरू किया था । जो बाद में पूरी दुनिया में फैल गया । जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम और यूके जैसे देशों में, लाखों छात्रों ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन और बड़े आंदोलन आयोजित करने के लिए सड़कों पर उतरे । इसी तरह, अमेरिका में, ब्लैक लाइव्स मैटर (२०१३–२०२०) – नस्लीय समानता और पुलिस बर्बरता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए । जहाँ युवा धीरे–धीरे अपनी आवाजÞ उठा रहे थे, वहीं जून २०२४ से केन्या में यह आंदोलन हिंसक हो गया । जिसमें ६५ से ज्यादा लोगों की जान चली गई । यह एक नेतृत्वविहीन आंदोलन था और इसे युवाओं का व्यापक समर्थन प्राप्त था। विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए और देश के ३२ प्रांतों में फैल गए। परिणामस्वरूप, सरकार को संसदीय विशेषाधिकार वापस लेने पड़े। केन्याई आंदोलन से प्रेरित होकर, युगांडा, मलावी, घाना और गाम्बिया जैसे अफ्रीकी देशों में भी युवा बेरोजगारी, आर्थिक संकट और भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं ।
अमेरिका में मार्च फÞॉर आवर लाइव्स (२०१८) – छात्रों ने बंदूक नियंत्रण की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए । अमेरिका में मीटू आंदोलन शुरू हुआ । इसी तरह, ग्रीन न्यू डील सपोर्ट – पर्यावरण और रोजÞगार सुधार आदि जैसे आंदोलन भी जेन–जी पीढ़ी द्वारा चलाए गए । इस आंदोलन का प्रभाव एशिया में भी बहुत व्यापक है । उदाहरण के लिए, म्यांमार (२०२१) में – सैन्य शासन के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया गया और उन्हें वहाँ सफलता मिली । हांगकांग (२०१९–२०) – लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए आंदोलन चलाया गया, और हमारे पड़ोसी देश भारत (२०१९–२०) में भी विरोध प्रदर्शन हुए, जिनका नेतृत्व जेन–जी छात्रों ने किया । बांग्लादेश में, शैक्षणिक हड़ताल से उपजे आंदोलन ने वहाँ की सरकार को उखाड़ फेंका । श्रीलंका में, न्याय और समानता के मुद्दे पर उठे आंदोलन ने वहाँ की सरकार को भी उखाड़ फेंका । कई शासक भागकर विभिन्न देशों में पहुँच गए । इसी तरह, थाईलैंड (२०२०) में – जेन–जी छात्रों ने राजशाही सुधार और लोकतंत्र के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए ।
तब से, युवा पीढ़ी का यह आंदोलन अब दुनिया भर में फैल चुका है । सर्बिया (नवंबर २०२४–सितंबर २०२५), माली (मध्य २०२५), फ्रांस (मध्य २०२५), यूक्रेन (जुलाई २०२५), स्लोवाकिया (दिसंबर २०२४–मई २०२५), संयुक्त राज्य अमेरिका (फरवरी–अप्रैल २०२५), यूनाइटेड किंगडम (जुलाई २०२५), तुर्की (अप्रैल २०२५), ईरान (मई २०२५), बांग्लादेश (अप्रैल २०२५) और इंडोनेशिया में २५ अगस्त २०२५ को सांसदों के अत्यधिक भत्तों और लाभों तथा आर्थिक असमानता के विरुद्ध न्याय की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए ।
आखिर क्यों जला नेपाल ?
मुख्यतः, नेपाल में जेनजी आंदोलन की शुरुआत सरकार द्वारा फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, ट्विटर और यूट्यूब सहित २६ प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने से हुई, जो सरकार के नए नियमों के तहत पंजीकृत नहीं थे । सोशल मीडिया प्रतिबंध के विरोध में, जेनजी के नेतृत्व में, २३ भाद्र, २०८२ को स्वतःस्फूर्त राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू हुए । विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत के कारणों में केवल उपरोक्त कारण ही नहीं थे, बल्कि देश की दो प्रमुख शक्तियों द्वारा गठित सरकार का एक वर्ष पूरा करने के बाद भी जनता की अपेक्षाओं पर खरा न उतरना भी शामिल था । सरकार गठन से पहले कांग्रेस और एमाले के बीच हुए सात सूत्री समझौते में संविधान संशोधन का मुख्य एजेंडा शामिल था, लेकिन एक साल तक उस एजेंडे पर कोई प्रगति नहीं हुई । सभी नेता मंचों पर २०४६ से प्रमुख पदों पर आसीन राजनीतिक दलों और कर्मचारियों की संपत्ति की जाँच के लिए एक शक्तिशाली आयोग बनाने के बारे में भाषण तो देते रहे, लेकिन उस निर्णय पर अमल नहीं कर पाए । बड़े भ्रष्टाचार के घोटाले समाचारों और सुर्खियों रहे किन्तु सरकार कुछ भी करने भें असफल रही क्योंकि सत्ता स्वयं किसी ना किसी रूप में उसमें आबद्ध रही । २०२४ में भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में शामिल १८० देशों में नेपाल १०७वें स्थान पर है, जहाँ १०० का स्कोर बहुत साफÞ–सुथरा और शून्य का स्कोर बहुत भ्रष्ट दर्शाता है । इसमें ५० से कम अंक पाने वाले देश को भ्रष्ट माना जाता है, और १८० देशों में औसत ४३ से कम अंक पाने वाले देश को अत्यधिक भ्रष्ट माना जाता है । इसके अनुसार, मात्र ३४ अंक प्राप्त करने वाला नेपाल सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में से एक है; पिछले १० वर्षों से सूचकांक में ३५ अंक से ऊपर न उठ पाने वाला नेपाल आज भी सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में से एक है; न्यायपालिका सहित विभिन्न राजकीय निकायों में नियुक्तियों और पदस्थापनाओं में घोर राजनीतिकरण है; योग्य और क्षमतावान लोगों की नियुक्ति वाले स्थानों पर राजनीतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की नियुक्ति होती रही है; लोगों में सरकार के प्रति भारी निराशा और असंतोष है; संघीय निजामती सेवा अधिनियम, संघीय शिक्षा अधिनियम, पुलिस अधिनियम आदि दर्जनों अधिनियम, जो संविधान निर्माण के बाद बनने चाहिए थे, वर्षों से संसद में अटके पड़े हैं । इस असंतोष का परिणाम था देश का जलना जिससे देश को अकल्पनीय क्षति हुई है । देश की प्रमुख धरोहरों, सिंह दरबार, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति निवास और संसद भवन सहित हजारों सरकारी ढाँचे नष्ट हो गए । विरोध प्रदर्शनों में मरने वालों की कुल संख्या ७२ तक पहुँच गई, जिनमें ५९ प्रदर्शनकारी, १० कैदी और ३ पुलिस अधिकारी शामिल थे ।
जनता का यह असंतोष जेनजी आन्दोलन के रूप में जिस तरह सामने आया उसने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं । २४ भाद्र को हुए विनाश का बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है । उन्हें सामान्य स्थिति में लौटने में लंबा समय लगेगा । राजनीतिक दलों के नेताओं, राजनेताओं, पार्टी कार्यालयों, सांसदों, उद्योगपतियों, व्यापारियों और स्थानीय स्तर के जनप्रतिनिधियों की निजी संपत्ति और घरों में तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी की गई है, जिससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ा है । साथ ही, आगामी चुनावों में, देश और समाज की सेवा के नेक इरादे से राजनीति में प्रवेश करने वालों को सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि क्या वे वास्तव में इसमें जाना चाहते हैं । दूसरी ओर, वे लोग हैं जो बेघर हो गए हैं और जिनकी संपत्ति लूटी और चुराई गई है उन्हें संभलने में वर्षों लग जाएंगे । इतना ही नहीं २४ के विरोध प्रदर्शनों के बीच जेल से भागे १०,००० से ज्यादा कैदी अभी भी फÞरार हैं । ये कैदी बलात्कार, हत्या, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी और देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधों के दोषी थे । ये इसी समाज में घूम रहे हैं । ये अपने पिछले अपराधों को दोहराएँगे, जिससे समाज में शांति बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा और राज्य को वर्षों तक नुकसान उठाना पड़ेगा ।
सार्वजनिक अनुमानों के अनुसार विरोध प्रदर्शनों से सार्वजनिक और निजी नुकसान कम से कम १०० ट्रिलियन रुपये का हुआ है, और अनुमान है कि यह संख्या २०० ट्रिलियन रुपये तक पहुँच जाएगी । हालाँकि, ये सभी आँकड़े प्रारंभिक हैं और सरकार या विश्वसनीय स्रोतों से विस्तृत आकलन आना बाकी है । भारी आर्थिक नुकसान के बाद, राज्य का पैसा वर्षों तक भौतिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण पर खर्च होगा । इससे आर्थिक विकास दर कम होगी ।
चूँकि देश के विशाल बुनियादी ढाँचे के निर्माण के लिए संसाधन और साधन नेपाल में उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि नेपाल में उन संसाधनों और साधनों के लिए उपलब्ध धन विदेश जाएगा । जिससे देश के भीतर मुद्रा का प्रचलन कम होगा और देश का आंतरिक व्यापार कमजÞोर होगा । वर्तमान परिस्थिति में राज्य का अधिकांश धन निर्माण और बुनियादी ढाँचे पर खर्च होने की संभावना है ऐसे में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक विकास, रोजÞगार सृजन आदि में बहुत कम निवेश होगा । जिससे २०२६ में सबसे कम विकसित देश से विकासशील देशों की सूची में शामिल होने की राज्य की इच्छा अधूरी रह जाएगी ।
२०५२ में माओवादी विद्रोह, २०६२÷६३ का जन आंदोलन, मधेशी आंदोलन और हाल ही में हुए जेनजी आंदोलन ने घरेलू और विदेशी निवेशकों में भय और दहशत पैदा कर दी है । निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर हमलों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक नकारात्मक संदेश दिया है । चाहे किसी की भी सरकार आए, देश वर्षों पीछे धकेला जा चुका है । वर्तमान स्थिति ऐसी है कि निवेश सुरक्षा के अभाव में विदेशी कंपनियाँ, दानदाता और निवेशक नेपाल नहीं आएँगे । नेपाल के धनी लोग, उद्योगपति और निवेशक नेपाल में निवेश नहीं करेंगे । बेरोजगारी और पलायन घटने की बजाय बढने की ही संभावना है । राष्ट्रीय बैंक के अनुसार, वित्तीय वर्ष २०८१÷८२ में आर्थिक विकास दर ४.६१ प्रतिशत रहने का अनुमान है । वर्तमान कठिन परिस्थितियों को देखते हुए, वित्तीय वर्ष २०८२÷८३ में आर्थिक विकास दर निश्चित रूप से कम होने वाली है ।
लगभग दस–दस साल के अंतराल पर होने वाले विभिन्न आंदोलनों और नुकसानों के कारण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल की छवि धूमिल हुई है । आने वाले दिनों में विभिन्न देश विजिट वीजÞा और वर्किंग वीजÞा पर सख्ती कर सकते हैं । उदाहरण के लिए, संयुक्त अरब अमीरात ने हाल ही में घोषणा की है कि उसने नेपालियों के लिए विजिट वीजÞा और वर्किंग वीजÞा बंद कर दिए हैं, और दक्षिण कोरिया ने भी इसे बंद करने की घोषणा की है । नेपालियों का मुख्य रोजÞगार क्षेत्र, विदेशी रोजÞगार, बहुत लंबे समय के लिए बंद हो जाना नेपाल और नेपाली युवाओं के लिए सबसे दुखद बात होगी ।
उपरोक्त परिस्थितियाँ वो हैं जो हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं या समझ रहे हैं, किन्तु आन्दोलन में जो आतंक मचाया गया उसके और भी कारण समझ में आते हैं ।
चीन और अमेरिका के बीच नर्चस्व की लड़ाई
यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध का प्रभाव, चीन–अमेरिका प्रतिस्पर्धा और ताइवान विवाद, इजÞराइल–हमास युद्ध और मध्य पूर्व में अस्थिरता, उत्तर कोरिया की सैन्य गतिविधियाँ और अंतर्राष्ट्रीय संबंध, अफ्रीकी महाद्वीप में भू–राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की माँग, जलवायु परिवर्तन और हरित ऊर्जा की भू–राजनीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी की भू–राजनीति आदि विश्व भू–राजनीति के वर्तमान मुद्दे हैं ।
जैसे–जैसे विश्व भू–राजनीति जटिल होती जा रही है, वैसे–वैसे यह और भी हिंसक होती जा रही है । अमेरिका इसे हर तरफ से इस तरह से उकसा रहा है कि किसी भी समय एक बड़ा युद्ध छिड़ने का डर है । हाल के दिनों में, ऐसा लग रहा है कि अमेरिका ने विश्व महाशक्ति के रूप में उभर रहे चीन को घेरने के लिए एक व्यापक और आक्रामक योजना बनाई है । वह न केवल चीन को घेर रहा है, बल्कि हाल के दिनों में अमेरिका एक सामरिक शक्ति, रूस के प्रति भी आक्रामक रहा है । लेकिन जहाँ अमेरिका ने दीर्घकालिक रूप से रूस को निशाना बनाया है, वहीं ऐसा लगता है कि उसने अल्पकालिक रूप से चीन को निशाना बनाया है । अमेरिका की वैश्विक टैरिफ युद्ध, रूस के विरुद्ध गैस और तेल युद्ध और चीन को घेरने की नीति है ।
चीन–अमेरिका प्रतिस्पर्धा ने नेपाल की भू–राजनीतिक संवेदनशीलता को बढ़ा दिया है । अमेरिकी रणनीति के अनुसार, यह स्पष्ट है कि वह नेपाल के माध्यम से मुक्त तिब्बत आंदोलन को भड़काने, हिंद–प्रशांत रणनीति के तहत एमसीसी और एसपीपी के माध्यम से नेपाल तक सैन्य पहुँच सुनिश्चित करने और भू–राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है । सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार अमेरिकी सैन्य हितों को लागू करने की ओर उन्मुख प्रतीत होती है – एमसीसी को लागू करना, एसपीपी पारित करने के लिए माहौल बनाना, अमेरिकी हितों के अनुरूप सेना, अदालतों और प्रशासनिक ढाँचों की स्थापना करना, संवेदनशील सरकारी सूचनाओं का आदान–प्रदान सुनिश्चित करना, और दूसरे स्तंभ विद्रोह के रूप में मुक्त तिब्बत आंदोलन को सुविधाजनक बनाने में सक्रिय भूमिका निभाना । कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि अमेरिका ताइवान, म्यांमार, नेपाल और अफÞगÞानिस्तान में अपना केंद्र स्थापित करके चीन को चारों ओर से घेरने की कोशिश कर रहा है ।
अमेरिका नेपाल का उपयोग करके भारत की आंतरिक स्थिरता के लिए चुनौतियाँ भी बढ़ाना चाहता है । हाल ही में, भारत में जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहे हैं । मणिपुर संकट और चिकन नेक (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) के जÞरिए पूर्वोत्तर भारत को असुरक्षित बनाने की कोशिश की गई है । यह स्पष्ट होता जा रहा है कि दक्षिण एशिया में आक्रामक हो चुका अमेरिका भारत पर भी नियंत्रण चाहता है । इसके अलावा, ऐसा लगता है कि अमेरिका ने बंगाल की खाड़ी के आसपास, यानी म्यांमार के पश्चिमी तट, भारत के कुछ पश्चिमी राज्यों जैसे मणिपुर, मेघालय और मिजÞोरम, और बांग्लादेश के चटगाँव क्षेत्र को मिलाकर एक ईसाई राज्य बनाने की कल्पना की है, ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका ने इंडोनेशिया से अलग होकर पूर्वी तिमोर का निर्माण किया था ।
अगर अमेरिकी योजना सफल रही, तो नेपाल द्विपक्षीय, बल्कि त्रिपक्षीय युद्ध का केंद्र भी बन सकता है । नेपाल में हिंसा भड़काने और संयुक्त राष्ट्र सेना के नाम पर एक ‘शांति सेना’ के प्रवेश की संभावना भी प्रबल है । इससे अन्य क्षेत्रीय देशों के युद्ध में घसीटने का जोखिम भी है । इस प्रकार, नेपाल न केवल भू–राजनीतिक खेल में है, बल्कि एक ऐसे युद्ध का भी खतरा है जो उसके भौतिक और सामाजिक ढांचे को नष्ट कर देगा । अमेरिका, चीन और भारत के बीच भू–राजनीतिक ध्रुवीकरण नेपाल को तेजÞी से विस्फोटक बना सकता है । पूर्वी नेपाल में जातीय संघर्ष, तराई में क्षेत्रवाद, पश्चिमी तराई में थारुवान आंदोलन और काठमांडू में धार्मिक संघर्ष का प्रबल खतरा है । राष्ट्रवाद के मनोविज्ञान का उपयोग करके एक नया चरित्र गढ़ने या ‘वृहत्तर नेपाल’ के मुद्दे को आगे बढ़ाने की भी संभावना है । यह भी संभावना है कि अमेरिका नेपाल में यूक्रेन के जÞेलेंस्की की शैली में एक चरित्र गढ़े । ऐसे संवेदनशील समय में, नेपाल को अपनी स्वतंत्रता, संप्रभुता और स्थिरता की रक्षा के लिए अत्यंत सावधान रहना होगा ।
नेपाल वर्तमान में जिस स्थिति का सामना कर रहा है, वह नेपाल के लिए एक आपदा है । ऐसी आपदा से उबरने और देश को सामान्य स्थिति में लाने के लिए बुद्धिमत्ता और कुशल नेतृत्व की आवश्यकता है । जिसमें राजनीतिक दल व उनके नेता, उद्योगपति, व्यापारी, समाजसेवी, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, शिक्षक, कर्मचारी व सुरक्षाकर्मी, साथ ही आम नागरिक अपनी–अपनी स्थिति से सकारात्मक भूमिका निभाएं, आंदोलन में जान गंवाने वाले शहीदों के परिवारों को उचित राहत व आत्मसम्मान प्रदान करें, आंदोलन में घायलों को आजीविका के साथ आजीवन निःशुल्क उपचार प्रदान करें, तथा आंदोलन के कारण बेघर हुए लोगों का पुनर्वास करें, आंदोलन के दौरान हुए राजकीय दमन, घुसपैठ, सार्वजनिक व निजी संपत्ति की तोड़फोड़, आगजनी व लूटपाट की तत्काल जांच करवाएं तथा दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई करें । चूंकि जेनजी आंदोलन एक नेतृत्वविहीन आंदोलन था और आंदोलन में विभिन्न मांगें उठाई गईं, परंतु यह मांग औपचारिक रूप से आधिकारिक रूप में प्रस्तुत नहीं की जा सकी, इसलिए ऐसा लगता है कि अगली सरकारों को इस पर गहन विचार व विचार–विमर्श करना चाहिए कि किन मांगों को कैसे संबोधित किया जाए ।
साथ ही आगामी चुनाव में जनता को अपने प्रतिनिधियों का चुनाव इस तरह से करना होगा जो जेनजी पीढ़ी की माँगों को भी पूरा करे । राजनीतिक रूप से, आम जनता प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित कार्यकारी प्रधानमंत्री, प्रदेशों को समाप्त करने या प्रदेश विधानसभा सदस्यों की संख्या कम करने, संघ और प्रदेश में समानुपातिक प्रतिनिधित्व को समाप्त करने और स्थानीय स्तरों की संख्या कम करने के लिए संविधान में संशोधन की माँग कर रही है । इन मांगों को परिमार्जित करते हुए और संघीयता के मर्म के अनुरूप सरकार को अपने कदम उठाने होंगे । देश उस राख पर खड़ा है जिसके अंदर घातक चिंगारी दबी हुई है जो कभी भी पुनः आग का रूप ले सकती है ।
इसलिए आगामी समय में आंदोलन की भावना के अनुरूप, सरकार का गठन किया जाना चाहिए और आंदोलन की भावना का सम्मान किया जाना चाहिए । उस समय गठित सरकार को वर्तमान अंतरिम सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को जारी रखना चाहिए तथा आंदोलन की मुख्य भावना और मांगों को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए । क्योंकि इस आन्दोलन को केवल शासन के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में देखना अधूरा होगा; इसे वास्तव में नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने के संभावित रोडमैप के प्रारंभिक संकेत के रूप में लिया जाना चाहिए । हमारे पास आने वाले दिनों में युवा पीढ़ी की आवाजÞ को अपनाने, देश को आगे बढ़ाने और दुनिया के सामने देश को एक शांतिपूर्ण, समृद्ध और सुंदर नेपाल के रूप में प्रस्तुत करने का एक सुनहरा अवसर है ।

सम्पादक, हिमालिनी

