आसन्न चुनाव के बाद बदहाली की निरन्तरता – जटिल, बड़े हादसे तक का संकेत : डा. विजय कुमार सिंह

डा. विजय कुमार सिंह, जनकपुरधाम। गत भदौ २३ और २४ को युवा वर्ग (जेन–जÞेड) अचानक सड़क पर उतर आया । सड़क प्रदर्शन में देश में व्याप्त भ्रष्टाचार सहित समग्र दुरावस्था के प्रति आक्रोश था, सकारात्मक परिवर्तन के लिए दबाव और परिणामस्वरूप त्वरित समाधान की आशा थी, निकास और विकास की स्पष्ट चाहना थी—जिसे राज्य ने लम्बे समय से अनदेखा कर रखा था । राजनीतिक दलों और सरकार का देश और खÞासकर युवा पीढ़ी के प्रति असंवेदनशील रवैया इसी से प्रकट होता है । जन–जÞेड का आंदोलन सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, उपेक्षा परिवर्तन के लिए था । परन्तु परिणाम अप्रत्याशित और उल्टा हुआ—प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ सक्रिय हो गईं और अंतर्राष्ट्रीय शक्ति–केन्द्र भी सक्रिय रूप से शामिल हो गए ।
भदौ २३ के खÞबरदारी विरोध प्रदर्शन में जन–जÞेड की वास्तविक उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता । लेकिन इसके अन्तिम चरण खÞासकर अगले दिन, भदौ २४ को, आंदोलन का अचानक आक्रामक और अराजक हिंसक रूप धारण करना और अप्रत्याशित नीजी एवं अति महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और सार्वजनिक सम्पत्तियों की आगजÞनी, तोड़फोड़, लूटपाट, मारपीट आदि घटनाओं का घटित होना—गंभीर प्रश्नों को जन्म देता है । आशंका पैदा करता है । जन–जÞेड का आंदोलन स्वस्फूर्त था या किसी नियोजित षड्यंत्र का हिस्सा ? यह बहस, आरोप–प्रत्यारोप लगातार गहराती जा रही है ।
स्पष्ट है—जन–जÞेड के प्रदर्शन का उग्र रूप ग्रहण करना, देश में अनिश्चितता, संवैधानिक संकट और सरकार की अनुपस्थिति एवं किंकर्तव्यविमूढ़ता कीं अत्यन्त असहज स्थिति का श्रृजित होना और फिर बाध्यात्मक रूप में संवैधानिक व्यवस्था और प्रावधानों के बाहर जाकर संविधानेत्तर, संसद के प्रति अनुत्तरदायी सरकार गठन करना और प्रतिनिधि सभा का विघटन, सेना की सक्रिय पर प्रच्छन्न भूमिका, राजावादी शक्तियों की अचानक सक्रियता तथा नई सरकार द्वारा भूल सुधार के प्रयास के तहत शीघ्र चुनाव की घोषणा ये सभी घटनाएँ मात्र जन–जÞेड आंदोलन के उद्देश्य से कÞतई मेल नहीं खातीं अपितु अनेक अनिश्चितताओं, आशंकाओं का द्वार खोलतीं दीखती है । संघीयता और संविधान को विफल बनाने की जो परोक्ष कोशिशें चल रही थीं और जो सुनियोजित षड्यंत्र सा था, उनके संकेत यहीं दिखाई देते हैं ।
जन–जÞेड का यह आक्रोशित विद्रोह सामाजिक सञ्जाल बन्द, भ्रष्टाचार तथा सरकार के सत्ता–लिप्सा, क्षुद्र स्वार्थ साधना एवं हठी रवैये के खिलाफ सशक्त आवाज था । विश्व में कहीं न देखे गए असामान्य राजनीतिक अराजकता पैदा करने के लिए नहीं । खैर, अब अतीत में लौटना उचित नहीं । लेकिन मौलिक प्रश्न आज भी जसै का तसै खड़ा है—क्या सुशीला कार्की नेतृत्व वाली सरकार द्वारा तय तिथि में चुनाव कराने से क्या पटरी से उतर गई सरकार को पुनः लीक पर लाया जा सकता है ? क्या देश को अस्थिरता, असह्यता और सभी क्षेत्रों में दीखीं अफÞरातफÞरी से निजात मिल सकता है और परिवर्तन की आवाजÞ को राज्य के आगामी स्वरूप और संचालन में समाहित किया जा सकता है ? क्या कामचलाऊ ही सही, स्थिरता आएगी ? पहले निकास के नाम पर पुनः वर्तमान प्रकृति से मिलते– जुलते हादसे की पुनरावृत्ति तो नहीं होगी ? क्या आगामी निर्वाचन से प्रभावकारी विधायिका का गठन हों पायेगा ? कोई एक राजनीतिक दल या गठबंधन निर्णायक या स्पष्ट बहुमत ला पायेगा ? अगर नहीं , तो आगे क्या होगा, कैसी परिस्थिति श्रृजित होगी ? गम्भीर अनिर्णय की स्थिति से उत्पन्न निराशा और अन्यमनस्कता की स्थिति और घोर संकट की स्थिति में अकल्पनीय दुर्घटना और दुष्परिणाम की डरावनी सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता ।
पर अब मुद्दा यह है की अनपेक्षित गम्भीर राजनीतिक शून्यता की स्थिति में अजीबोगÞरीब ढ़ग से संवैधानिक दायरे से बाहर गठित यह सरकार को क्या करना चाहिए था, और अब वह क्या कर सकती है ? संसद का विघटन और फिर पुनःस्थापना कितनी उचित है ? संघीयता या फिर यह संविधान टिकेगी, कमजोर या खÞारिज होगी ? जैसा कीं सर्वविदित है वर्तमान की भू–राजनीति और अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों की सरकार और राज्य संचालन में जानी अनजानी भूमिका रहती ही है । नेपाल को लेकर अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों की रुचि किस दिशा में झुकी हुई है ?—ये सभी प्रश्न जनमानस में गहरी जिज्ञासा पैदा कर रहे हैं।
जन–जÞेड के उद्देश्यों को पूरा करना मुश्किल नहीं था, आज भी नहीं है । भ्रष्टाचार नियन्त्रण, निर्वाचन प्रणाली और प्रक्रिया में बदलाव, प्रधानमन्त्री और सरकार गठन की प्रक्रिया में बदलाव, प्रदेश तथा स्थानीय स्तर की सरकार तथा कर्मचारी प्रबन्धन सम्बन्धी माग—ये सभी मुद्दे संविधान संशोधन द्वारा समाधान योग्य थे । विघटित प्रतिनिधि सभा की पुनःस्थापना के माध्यम से भी संशोधन सम्भव था । परन्तु वर्तमान सरकार ने अपने दायित्व से अधिक चुनाव को प्राथमिकता दी । इतने बड़े संकट की स्थिति मे भी कुछ समय लेकर भी विभिन्न स्तर और विभिन्न चरणों में राष्ट्रीय सहमति का कोई गम्भीर प्रयास नहीं किया गया या यूँ कहें तो यह सरकार की क्षमता से बाहर इस जÞिम्मेवारी का निर्वहन दीखा । अब महत्वपूर्ण सवाल यह है—क्या चुनाव ही देश का एकमात्र रास्ता है ? वर्तमान परिस्थितियों में इसका उत्तर सकारात्मक नहीं दिखता ।
आगामी चुनाव के बाद भी किसी दल के स्पष्ट बहुमत पाने की सम्भावना न्यून है । बड़े दलों के प्रति असन्तोष, छोटे दलों का गठबन्धन, एकीकरण, तथा नए दलों का पंजीकरण जैसी गतिविधियों ने यह संकेत स्पष्ट कर दिया है कि आसन्न निर्वाचन द्वारा निर्णायक और अपेक्षित परिणाममुखी प्रतिनिधिसभा का गठन संभव नहीं । इस स्थिति में कोई भी दल २०–३० से अधिक सीटें ला पाएगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता । यदि कांग्रेस और एमाले की संयुक्त सरकार देश को सुशासन देने में असफल रहती है, तो आगामी चुनाव परिणाम देश को और भी गहरी अस्थिरता में धकेल सकते हैं । ऐसी तरल परिस्थिति में कुछ दल, अदृश्य शक्तियाँ तथा कुछ अंतर्राष्ट्रीय चल–खेल, वर्तमान संविधान और संघीयता से नकारात्मक खिलवाड़ करने की कोशिश कर सकते है हैं—जो सफल हुआ तो देश एक और बड़े हादसे और आन्तरिक संघर्ष और जटिल अनिश्चितताओं की ओर बढ़ सकता है ।
स्पष्ट रूप से देखा जाए तो नेकपा (एमाले) और नेपाली कांग्रेस नेतृत्व वाली पिछली सरकारें अंतर्राष्ट्रीय सन्तुलन बनाने में असफल रहीं और नेपाल इस समय प्रमुख राजनीतिक दलों की गम्भीर असफलता और दृश्य–अदृश्य राष्ट्रीय–अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियों के चल–खेल के कारण एक भयंकर भँवर में फँसा हुआ है । राजनीतिक नेतृत्व देश को इस चंगुल से बाहर निकालने का सार्थक प्रयास भी नहीं कर पा रहा है, असफल दीखता है । संविधान की मूल भावना, मर्म और प्रावधानों को परे रख से परे राजनीतिक क्रियाकलाप बढ़ता जा रहा है । राजनीतिक दलों के नेता जिम्मेदार नहीं दिखते । स्मरण रहे की अस्थिरता सिर्फ आर्थिक संकट, असुरक्षा और सुशासन की अनुभूति का अभाव ही नहीं पैदा कर रही बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों मे जारी अफÞरातफÞरी जनता में बेचैनी और आक्रोश भी बढ़ा रही है । नेपाली जनता की चुप्पी का अर्थ यह नहीं कि वह सरकार और राजनीतिक चरित्र को नहीं समझती—संभवतः यह किसी बड़े विस्फोट की संभावना का संकेत भी हो सकता है ।

लेखक ः संविधान सभा सदस्य है ।
लेखक ः संविधान सभा सदस्य है ।


