नेपाल में जेन–जी क्रांतिः स्वदेशी पुनर्जागरण और क्षेत्रीय प्रभाव : संतोष मेहता
संतोष मेहता, हिमालिनी अंक नवंबर। नेपाल के राजनीतिक इतिहास में सितंबर २०२४ की ‘जेन–जी क्रांति’ एक निर्णायक मोड़ साबित हुई है । यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि संपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करने वाला ऐतिहासिक आंदोलन है । इस क्रांति ने न केवल नेपाल में, अपितु संपूर्ण दक्षिण एशिया में नई राजनीतिक चेतना का संचार किया है ।
वैश्विक संदर्भ में युवा क्रांतियां
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में संपूर्ण विश्व एक गहन अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है । पारंपरिक राजनीतिक विचारधाराएं तेजी से अपनी प्रासंगिकता खोती जा रही हैं । फ्रांस के ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन से लेकर, चिली के छात्र विद्रोह, श्रीलंका की ‘गोटागोघर’ क्रांति, और अब नेपाल की जेन–जी क्रांति–इन सभी में कुछ उल्लेखनीय समानताएं दिखाई देती हैं । ये आंदोलन किसी नेता या राजनीतिक दल द्वारा नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से संगठित युवाओं द्वारा संचालित होते हैं । इनमें पारंपरिक वर्ग–संघर्ष के स्थान पर पहचान, गरिमा और स्वाभिमान की मांगें केंद्रीय भूमिका निभाती हैं ।
नेपाली संकट के बहुआयामी कारण
नेपाल में यह क्रांति अचानक नहीं, बल्कि दशकों के असंतोष का परिणाम थी । २०१५ के संविधान में मधेशी, आदिवासी और दलित समुदायों की व्यवस्थित उपेक्षा हुई । मधेशी समुदाय जो नेपाल की कुल जनसंख्या का लगभग ३०–३५ प्रतिशत है, को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में मात्र १५–१८ प्रतिशत हिस्सेदारी मिली । ५९ से अधिक आदिवासी जनजातियों की सांस्कृतिक और भाषाई अधिकारों को संविधान में पर्याप्त मान्यता नहीं मिली ।
राजनीतिक क्षेत्र में कांग्रेस, एमाले और माओवादी जैसे प्रमुख दलों के बीच सत्ता की बारी–बारी से साझेदारी ने एक प्रकार की राजनीतिक कार्टेल का निर्माण किया । २०१७ से २०२४ के बीच छह बार सरकार बदली, परंतु हर बार वही पुराने चेहरे सत्ता में लौटे । इससे युवाओं में यह धारणा पुष्ट हुई कि चुनाव केवल एक दिखावा है ।
भ्रष्टाचार के विशाल घोटालों ने जनता का विश्वास पूरी तरह ध्वस्त कर दिया । गिरीबंधु हवाई अड्डा घोटाले में लगभग ६०० करोड़ रुपए और सहकारी घोटाले में अनुमानित ३५००–४००० करोड़ रुपए का घपला सामने आया । २०१५ के भूकंप के बाद पुनर्निर्माण के नाम पर प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय सहायता का भी दुरुपयोग हुआ ।
इन सबके साथ ही, एक ही संस्कृति, भाषा और धर्म को थोपने के प्रयासों ने समाज में गहरी दरारें पैदा कीं । शिक्षा व्यवस्था में स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा और आदिवासी सांस्कृतिक प्रथाओं को हीन दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति ने विभिन्न समुदायों में अलगाव की भावना को बढ़ावा दिया । इसी कारण इस क्रांति में मधेशियों आदिवासी जनजाति के अधिकांश युवाओं की समावेशिता रही ।
जेन–जी पीढ़ी ने, जिसने अपने संपूर्ण जीवन में भ्रष्टाचार और कुशासन के अतिरिक्त कुछ नहीं देखा था, इन जड़ संस्थाओं को बदलने का संकल्प लिया । टिकटॉक, इंस्टाग्राम और फेसबुक के माध्यम से लाखों युवा क्षणभर में संगठित हो गए । सोशल मीडिया बंद करने का सरकार का निर्णय इस क्रांति का तात्कालिक कारण (ट्रिगर पॉइंट) बना ।
इस आंदोलन में काठमांडू के शिक्षित मध्यवर्गीय युवाओं के साथ–साथ तराई के मधेशी युवा, पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासी युवा, और सुदूर पश्चिम के हाशिए पर धकेले गए समुदायों के युवाओं ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की । विशेष रूप से युवा महिलाओं की सशक्त उपस्थिति ने पारंपरिक पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती दी । हालाँकि, क्रांति के बाद बनी सरकार में इन युवाओं के लिए उचित प्रतिनिधित्व का अभाव रहा । यह इस नई ऊर्जा के साथ एक बड़ा विश्वासघात साबित हुआ ।
इस संकट से निपटने के लिए ‘स्वदेशवाद’ एक नई विचारधारा
इस संकट से उबरने के लिए ‘स्वदेशवाद’ एक नवीन और संभावनापूर्ण विचारधारा के रूप में उभरी है । इसका मूल तर्क यह है कि नेपाल की समस्याओं की जड़ में पश्चिमी विचारधाराओं–माक्र्सवाद और पूंजीवाद–का अंधानुकरण है । इन दोनों का विकास यूरोप की विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था, जो नेपाल की स्थानीय सभ्यता और सांस्कृतिक संरचना से मेल नहीं खाता ।
स्वदेशवाद प्राचीन नेपाली दर्शन के कुछ मूलभूत सिद्धांतों को पुनर्जीवित करता है । नेवार समुदाय की ‘गुठी’ प्रथा, जो सामूहिक संपत्ति के प्रबंधन का सफल मॉडल रही है, को आधुनिक संदर्भ में पुनस्र्थापित किया जा सकता है । थारु समुदाय का वन प्रबंधन, शेर्पा समुदाय का पर्यावरण संरक्षण–ये सभी आधुनिक चुनौतियों के स्थानीय समाधान प्रस्तुत करते हैं ।
आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति को अपनाना, परंतु उसे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना स्वदेशवाद है । भूटान का “सकल राष्ट्रीय खुशहाली“ का मॉडल इसका एक प्रेरक उदाहरण है । व्यावहारिक स्तर पर स्वदेशवाद का अर्थ है–संघीय ढांचे को सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के आधार पर पुनर्गठित करना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जगह स्थानीय उद्यमों को प्रोत्साहन देना, और मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाना । माक्र्सवाद और पूंजीवाद दोनों ही नेपाल की स्थानीय सभ्यता और संस्कृति के अनुकूल नहीं हैं । इसलिए अब अपने स्वदेशी मूल्यों और दर्शन पर लौटने का समय आ गया है ।
भारत के लिए व्यापक निहितार्थ
नेपाल में घटित परिवर्तनों का भारत पर सीधा और बहुआयामी प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है । भौगोलिक दृष्टि से नेपाल भारत और चीन के बीच एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है । १,७५१ किलोमीटर की खुली सीमा भारत की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है । नेपाल में अस्थिरता का अर्थ है सीमा पर अवैध गतिविधियों में वृद्धि, चीनी प्रभाव के विस्तार की संभावना, और उग्रवादी तत्वों के लिए सुरक्षित आश्रय ।
सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी दोनों देश हजारों वर्षों से जुड़े हैं । पशुपतिनाथ, जनकपुर, लुंबिनी जैसे तीर्थस्थल दोनों देशों की साझी विरासत हैं । आर्थिक रूप से, भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है–लगभग ६५ प्रतिशत आयात–निर्यात भारत के साथ होता है ।
विशेष रूप से मधेशी और आदिवासी प्रश्न भारत को सीधे प्रभावित करते हैं । मधेशी समुदाय की भाषा, संस्कृति और रक्त संबंध भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार से जुड़े हैं । नेपाल के आदिवासी समुदाय–राई, लिंबू, मगर, गुरुंग की बड़ी संख्या भारतीय सुरक्षा बलों में सेवारत है । उनके प्रति भेदभाव भारत की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है ।
भारत स्वयं अपनी स्वदेशी सभ्यतागत जड़ों की ओर लौट रहा है; जैसा की आत्मनिर्भर भारत अभियान, स्थानीय भाषाओं को प्रोत्साहन, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का पुनरुद्धार । नेपाल के स्वदेशवादी आंदोलन के साथ भारत का सहयोग स्वाभाविक और परस्पर लाभकारी है । यह सहयोग मुख्यतः पश्चिमी वैचारिक वर्चस्व के विरुद्ध है ।
भारत शैक्षिक आदान–प्रदान, सहकारी आंदोलन और ग्रामीण विकास में अपना अनुभव साझा कर सकता है । जल संसाधन प्रबंधन में संयुक्त परियोजनाएं दोनों देशों के लिए लाभकारी हो सकती हैं । परंतु भारत की भूमिका अत्यंत संवेदनशील है । उसे नेपाल की जनता की आकांक्षाओं का समर्थन करते हुए भी, वहां की संप्रभुता का पूर्ण सम्मान करना होगा । सहोदर समान साझीदार के रूप में नेपाल से संबंध बनाने होंगे ।
चुनौतियां और भविष्य की राह
नेपाल की जेन–जी क्रांति केवल एक देश की कहानी नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर युवा शक्ति, स्वदेशी मूल्यों और समावेशी राजनीति के उदय की कहानी है । प्रश्न यह है कि हम इसे सकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए क्या योगदान दे सकते हैं । अभी जो विश्व ब्यापी क्रांति के लहर है इसके वाद क्या की अनिश्चितता के कारण चुनौतीपूर्ण प्रबंधन है । पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को ध्वस्त करना संभव है, परंतु नई, समावेशी और कार्यकुशल संस्थाओं का निर्माण एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है । श्रीलंका में २०२२ की क्रांति के बाद की अस्थिरता इसका उदाहरण है । संसार के अन्य जगहों में भी यही हाल है । इस क्रांति के लहर विश्व व्यापी रूपा में पारंपरिक वर्ग–संघर्ष के स्थान पर पहचान, गरिमा और स्वाभिमान की मांगें केंद्रीय भूमिका निभाई हैं । किन्तु क्रांति के वाद जो भी सरकारे बनी इन विषयोंका अनदेखा करने का वजहों से ही स्थाईत्व नहीं हो पा रहा है ।
श्रीलंका में पुरानी सिंहली–बनाम–तमिल की राजनीति फिर से हावी हो गई । सूडान में सत्ता–साझेदारी में दारफुर और अन्य हाशिए के क्षेत्रों के लोगों की पहचान को अनदेखा किया गया । अमेरिका की ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के वाद अश्वेत की गरिमा के स्थान पर “टोकनवाद” अर्थात कुछ अश्वेत व्यक्तियों को उच्च पदों पर बैठाकर “टोकन” बनाया गया । चिली की ’एस्टाल्लिदो सोशल’ आंदोलन जिसका नारा था “हमें अमीरों की तरह जीने नहीं, बस गरिमा से जीने दो” लेकिन वहां भी अस्थिरता बनी हुईं है ।
नेपाल को अब विभिन्न जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक समूहों के बीच न्याय और समानता की स्थापना करनी होगी । संवैधानिक सुधार, सत्य और सुलह आयोग की स्थापना, युवाओं को वास्तविक अवसर प्रदान करना, और सांस्कृतिक संघीयता सहित स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना–ये सभी आवश्यक कदम हैं । नेपाल के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना है जो सभी वर्गों, जातियों और समुदायों के हितों की रक्षा कर सके । भारत की भूमिका इस मामले में अहम है ।
यदि यह क्रांति सफल होती है, तो एक स्थिर नेपाल दक्षिण एशिया में शांति का महत्वपूर्ण स्तंभ होगा । समावेशी विकास से नेपाल की अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी । स्वदेशवाद का यह सफल मॉडल संपूर्ण दक्षिण एशिया में सांस्कृतिक आत्मविश्वास की वापसी का कारण बन सकता है ।
२१वीं सदी की राजनीति में युवा शक्ति, डिजिटल संपर्क, पहचान की राजनीति, और स्थानीय मूल्यों की वापसी–ये सभी नए तत्व हैं । जो भी देश या नेता इन्हें समझेगा, वही भविष्य का निर्माता होगा । नेपाल की जेन–जी क्रांति एक ऐसे दक्षिण एशिया के निर्माण का आह्वान करती है जो अपनी प्राचीन सभ्यता पर गर्व करे, अपनी विविधता का सम्मान करे, और अपने युवाओं को एक उज्ज्वल भविष्य प्रदान करे ।


