ओली की डाक्ट्रिन नीति, देश को मुठभेड़ की दिशा में अग्रसर कर रही है — अमरेश सिंह
० नेपाल की वत्र्तमान परिस्थिति को आप किस रूप में देख रहे हैं ?
– नेपाल की राजनीति में आज जो परिदृश्य दिख रहा है उससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है । आए दिन जिम्मेदार नेताओं की जो अभिव्यक्ति आ

रही है वह निःसन्देह दुखद और गैरजिम्मेदार है । नेता देश के लिए होता है, देश की जनता के लिए होता है किन्तु अफसोस कि हमारे नेता इस बात को भूल कर सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षा को देख रहे हैं । जबकि उनकी सोच, उनकी महात्वाकांक्षा देश के लिए होनी चाहिए, देश की जनता के लिए होनी चाहिए । पर आज ऐसी विडम्बना हो गई है देश की कि, देश के माननीय राष्ट्रपति महोदय, न्यायालय, न्याय व्यवस्था और प्रधान न्यायधीश महोदय पर ही सत्तासीन नेतागण आरोप लगा रहे हैं, और यह सर्वथा अनुचित, है इससे देश अराजकता की ओर बढ़े ।
० भावी प्रधानमंत्री के रूप में के.पी.ओली का नाम सामने आ रहा है, इसके सन्दर्भ में आपकी क्या धारणा है ?
– देश की स्थिति इतनी भयावह है कि अगर देश के प्रधानमंत्री के.पी.ओली बने और उनके हाथों में देश की बागडोर सौंपी गई तो इस देश के विखण्डन की पूरी तैयारी देश के नेता ही कर रहे हैं । जो व्यक्ति मधेश और वहाँ की जनता की कद्र करना नहीं जानता वो वहाँ का भला कर ही नहीं सकता है, यह मैं दावे के साथ कहूँगा । अगर ओली प्रधानमंत्री बनते हैं तो मधेश एक बार फिर द्वन्द्ध की राह पर चलेगा । ओली कभी मधेश हित की बात सोच ही नहीं सकते हैं और मधेश उन्हें प्रधानमंत्री मान नहीं सकता है ।
० सोलह बुन्दे समझौता को लेकर सर्र्वोच्च का जो फैसला आया है और इसका जिस तरह से चार दलों की ओर से विरोध हो रहा है इसका क्या असर पड़ने वाला है ?
–देश की अव्यवस्था का यह आलम है कि सर्वोच्च के फैसला को नहीं माना जा रहा है और यह अत्यन्त दुखद है । संघीयता के मसले को अनदेखा कर जिस तरह संविधान बनाने की प्रक्रिया जोर–शोर से जारी है वह यह बता रही है कि भविष्य में भी संघीयता मिलने वाली नहीं है और मधेश की जनता को पूरी तरह ठगा और धोखा दिया जा रहा है । नए संविधान से जनता आशान्वित थी, उसमें देश का हर समुदाय अपने आपको देखना चाहता था । परन्तु आज जो हो रहा है, जैसा संविधान लागु करने की कोशिश की जा रही है इससे मधेश की जनता, जनजाति, दलित, महिला, मुस्लिम वर्ग सभी के अधिकारों का हनन हो रहा है । सभी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं । आज मधेश की जनता और जो कमजोर वर्ग हैं, शोषित हैं उन सबको एकजुट होने की आवश्यकता है । और अगर सरकार इन्हें अनदेखा करती है तो देश की एकता और अखण्डता खतरे में पड़ सकती है । आज सिर्फ एक समुदाय का वर्चस्व हम देख रहे हैं और यह वर्षों से होता आया है । किन्तु यही चलता रहा तो लोकतंत्र कमजोर होगा और देश टूटेगा । एक समुदाय के वर्चस्व पर जब दूसरा समुदाय सवाल उठाता है तो उसे शक की निगाहों से देखा जाता है, उस पर अविश्वास किया जाता है और यह अविश्वास और शक की स्थिति देश की एकता और अखण्डता को प्रभावित करती है । आज जो मनमानी करने पर ये तुले हुए हैं तो इन्हें यह जिम्मेवारी लेनी होगी कि कल जो इसके फलस्वरूप दुष्परिणाम होनेवाला है वह इन सत्ताधारियों की बदौलत होगा । आज सर्वोच्च के फैसले को मानने से ये इन्कार कर रहे हैं और मधेशी मूल का आरोप लगाया जा रहा है तो मैं यह स्पष्ट कहूँगा कि ये मधेशियों को राह दिखा रहे हैं कि मधेशी भी कल पहाड़ी मूल के आदेश को मानने से इनकार करेगा और यह सत्ता की गलत नीति की वजह से होगा । यह संविधान मधेश को अधिकारों से वंचित करने का संविधान है, देश को मुठभेड़ की दिशा में प्रेरित करने का संविधान है । जिसका खामियाजा इन तथाकथित नेताओं की वजह से देश और जनता आगे के दिनों में भुगतने वाली है ।
० आप सत्तापक्ष से हैं, नेपाली काँग्रेस के निर्वाचित सांसद हैं बावजूद इसके आप सरकार की नीतियों का विरोध करते आ रहे हैं, सुनने में आ रहा है कि आपको पार्टी से निष्काषित करने की मांग की जा रही है ।
जी हाँ मैं सत्तापक्ष से हूँ परन्तु जो नियम और नीति जनता, खास कर के मधेश की जनता के पक्ष और हित में नहीं है, मैं उसका विरोध करता आया हूँ और करता रहूँगा । मैं अपनी बात मौखिक और लिखित रूप से संविधान सभा और पार्टी तथा संवाद समिति में रखता आया हूँ यह सबको पता ही है । ये नवतन्त्र के नवराजा लोग हैं जो ये समझते हैं कि जो हैं सो हम हैं और उनकी यही सोच असंतोष को बढ़ावा दे रही है । जहाँ तक निष्काषन की बात है तो मुझे नहीं लगता कि ये मधेश में अपनी स्थिति कमजोर करना चाहेंगे । नेपाली काँग्रेस मधेश में मजबूत हुआ है तो देश में मजबूत हुआ है । मधेश में कमजोर हुआ है तो दूसरे नम्बर पर पार्टी आ गई है । हम सब जानते हैं कि मधेश ही नेपाली काँग्रेस का बैक बोन है । इसलिए मुझे नहीं लगता कि नेपाली काँग्रेस ऐसा कुछ करेगी । मधेश को कुंठित कर के नेपाली काँग्रेस कभी मजबूत नहीं हो सकती और मुझे ऐसी कोई जानकारी भी नहीं है कि मुझे निकालने की बात हो रही है । मुझसे अब तक किसी ने कुछ नहीं कहा है । बाहर लोग क्या बोलते हैं ये उनकी सोच है ।
० आज जो परिस्थितियाँ हैं उसमें देश किस ओर बढ़ रहा है ?
– ऐसे भी इस देश में एक विशेष समुदाय का ही वर्चस्व रहा है उसी की बात चली है और उसी के हाथों देश की कमान किन्तु अब ऐसा होने वाला नहीं है । अभी तक एक ही समुदाय शासन करता आया है और एक समुदाय हमेशा शोषित होता आया है । यही कारण है कि देश में असंतोष व्याप्त है और इससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है । और अगर लोकतंत्र कमजोर हुआ तो देश विखण्डन की कगार पर पहुँचेगा । हालात ऐसे हैं कि दो समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ रहा है और यह अच्छे आसार नहीं हैं देश के लिए । विश्व का इतिहास पलट कर देखिए संविधान बनने के क्रम में ही इसी असुरक्षा और अविश्वास के कारण हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का बँटवारा हुआ, बंगलादेश बना । इन बातों से सीखना चाहिए नहीं तो कल कुछ भी हो सकता है । ४७ के संविधान के समय हुई गलती के कारण बहुदलीय व्यवस्था समाप्त हो गई और आज भी ये लोग यही गलती दुहरा रहे हैं । ये किसी को स्थान नहीं देना चाह रहे हैं, न किसी की बात सुनना चाह रहे हैं, लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे हैं । आज के दिन में सच कहिए तो नेपाल में कोई भी लोकतांत्रिक पार्टी नहीं है । इसका अभाव है इसलिए लोगों को न तो सम्मान मिल रहा है और न ही अधिकार । आज मधेशी समुदाय पर सवाल उठाया जा रहा है । सर्वोच्च के फैसले की अवमानना की जा रही है क्योंकि न्यायाधीश मधेशी समुदाय के हैं । यह कितनी विषम स्थिति पैदा कर सकती है कल के दिनों में यह अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है । मधेश को ये स्वयं विरोध का रास्ता दिखा रहे हैं । सभामुख अपने पद की गरिमा को भूल रहे हैं नेता अपनी बदजुवानी पर उतर आए हैं ।
० आप हमेशा एक वाक्य प्रयोग करते हैं कि अभी जो संविधान बनने जा रहा है ये ओली डाक्ट्रिन संविधान है, इसका क्या तात्पर्य है ?
– इसका तात्पर्य है कि अगर यह संविधान बना और ओली प्रधानमंत्री बने तो इस देश को मुठभेड़ की राह पर जाने से कोई नहीं रोक पाएगा । वो स्वयं इस राह पर देश को आगे बढ़ा रहे हैं । यह डाक्ट्रिन मुठभेड़ का डाक्ट्रिन है, ब्राह्मण, क्षत्रीय साम्राज्य का डाक्ट्रिन है, कमजोर वर्ग को अधिकार से वंचित करने का डाक्ट्रिन है, मधेशी समुदाय को अधिकार विहीन बनाने का डाक्ट्रिन है इसलिए मैं इसे ओली डाक्ट्रिन कहता हूँ क्योंकि यह पूरी तरह ओली कंसेप्ट है और उनके ही दिमाग से चल रहा है । ओली ने जो नीति तैयार की प्रचण्ड और अन्य नेताओं ने उसे स्वीकार किया है इसलिए मैं इसे ओली डाक्ट्रिन कहता हूँ । स्पष्ट है कि ये संघीयता नहीं देना चाहते, समावेशीकरण नहीं करना चाहते, मधेशी के हक की बात करो तो उन्हें अपना अधिकार बिहार और यूपी से माँगने को कहा जाता है । पूरी तरह से वो मधेश को नकार रहे हैं और यही स्थिति या सोच रही तो मैं बेबाक तरीके से कह रहा हूँ कि इस देश को टूटने से बचाने वाला कोई नहीं होगा स्वयं पशुपतिनाथ भी नहीं बचा पाएँगे । ओली जिस तरह मुठभेड़ की राजनीति कर रहे हैं उससे देश विखण्डन की ओर जा रहा है । भले ही इसमें समय लगे पर देश को टूटने से नहीं बचा सकते अगर ओली नीति ही कायम रही तो । जिसतरह खसवादी उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं और उनकी बातों को ही राष्ट्रीयता माना जा रहा है तो यह देश को कमजोर करेगा और देश टूटेगा । राष्ट्र जनता से है और यदि जनता कमजोर हुइृ तो राष्ट्र या राष्ट्रीयता मजबूत हो ही नहीं सकती । ओली जिस तरह राष्ट्र सम्मानित पदों पर अपनी वक्तव्य दे रहे हैं वो दुर्भाग्यपूर्ण है जो उनकी अशिक्षित मानसिकता को दर्शाता है । अगर देश टूटा तो ओली की वजह से टूटेगा मैं यह मानता हूँ । मधेश को अगर अधिकार नहीं मिला, सम्मान नहीं मिला उसे हमेशा शोषित किया गया, दो नम्बर नागरिक के तौर पर देखा गया तो आज नहीं तो कल देश टूटेगा और मधेश अलग होगा । अपमानित होकर इस देश में रहने से अच्छा एक अलग देश की माँग करनी चाहिए ।
० क्या नए मधेश का नेतृत्व आप करना चाहेंगे ?
– नेतृत्व किसका होगा, या होना चाहिए यह जनता तय करती है । परन्तु आज मधेश को एक सक्षम और समर्थ नेतृत्व की आवश्यकता है जो मधेश को उसका सही स्थान दिला सके । अभी मधेश गुलामी की ही अवस्था में है । लोकतंत्र बना पर मधेश को उससे कोई फायदा नहीं हुआ । न तो समावेशी का लाभ उन्हें मिला है और न ही किसी और जगह । नीति तभी सही होगी जब नीयत सही हो ।
आज की आवश्यकता है कि मधेशी दल एक हों उनकी एकता ही मधेश को मजबूत और विकसित दिशा दे सकता है । सभी दलों को मधेश का विश्वास जीतना होगा । मधेश को मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता है ।
० के. पी. ओली जी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा रहा है क्या यह मधेश के हित में है ?
–देखिए किसी भी बात की जब चरम सीमा होती है तो कोई ना कोई निष्कर्ष निकलता है । अगर ओली प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह मधेश की जनता के हक में होगा क्योंकि तब वो आर या पार की लड़ाई खुलकर लड़ पाएँगे । क्योंकि ओली मधेश को ना तो उसका अधिकार देने वाले हैं और ना ही उसके हित और विकास के लिए सोचने वाले हैं । यही वह समय होगा जब मधेशी जनता पूरी तरह से जगेगी और विद्रोह करेगी । मधेश सक्ष्म है वह एक अलग देश बनेगा ।
० सोलह सूत्रीय समझौता को विशुद्ध देशी समझौता कहा जा रहा है, और इस पर कोई अन्तर्राष्ट्रीय दवाब नहीं है यह भी माना जा रहा है और जिस तरह अंतरिम संविधान को अनदेखा किया जा रहा है तो क्या इस हालात में किसी अन्तर्राष्ट्रीय दवाब की अपेक्षा हम कर सकते हैं ?
– इस समझौते को किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय ने सही नहीं कहा है और न ही इसका स्वागत किया है चाहे भारत हो चीन हो या कोई और । किसी भी देश में जब कुछ विकास होता है, अच्छा होता है तो बाहरी देश उसका स्वागत करता है और अगर कुछ गलत होता है तो उसका विरोध भी करता है असहमति जताते हैं, किन्तु अभी सब मौन हैं क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय का यह मानना है कि यह देश का आन्तरिक मामला है । किन्तु यदि अंतरिम समुदाय को अनदेखा कर संविधान बना तो देश द्वन्द्ध की दिशा में जाएगा । राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी जो निश्चय ही देश के लिए सही नहीं होगा । अब जो समझौता होगा वह मधेश में होगा काठमान्डू में नहीं और यही देश की दशा और दिशा निर्धारित करेगी ।
० सीमांकन और नामांकन में आपकी क्या भूमिका होगी ?
नामांकन चाहे जो भी हो पर सीमाकंन तो होना ही चाहिए क्योंकि इसके बिना संघीयता सम्भव नहीं है और बिना सीमांकन और संघीयता के अगर संविधान आता है तो मैं इसे नहीं मानता हूँ । मैं मधेश के साथ हूँ और उनसे यह कहूँगा कि अगर संघीयता और अधिकार के बिना संविधान आता है तो उसका सर्वत्र विरोध करें मैं मधेश की जनता के विरुद्ध पार्टी का साथ नहीं दूँगा अपने मधेश की जनता का साथ दूँगा । क्योंकि इस बार अगर मधेश को इस बार अधिकार नही. मिला तो मधेश पचीस तीस वर्ष पीछे चला जाएगा । मधेश में जो आन्दोलन हुआ वह संघीयता के लिए था अगर सात वर्षों में उसे भुला दिया गया तो मैं मधेश की जनता से यह उम्मीद करुँगा कि वह अगला आन्दोलन संघीयता के लिए नहीं स्वदेश के लिए करे मैं हर कदम पर उनके साथ हूँ ।
प्रस्तुतिः डा. श्वेता दीप्ति

