दलों की भीड़ और लोकतंत्र : चन्द्रकिशोर

चन्द्रकिशोर, बीरगंज, ३१ दिसम्बर ०२५। एक आम इंसान जब दुःख दर्द से टूट जाता है,उसको कोई राह नहीं सूझती तो वह एक ऐसे उजाले की तरफ देखता है,एक ऐसी दल तलाशता है,एक भरोसेमंद संगठित आवाज ढूंढता है जो उसके जीवन को व्यथाओ – वेदनाओं से उबार दे। एक आम आदमी महंगी, बेरोजगारी, जलवायु परिवर्तन से कृषि संकट, पानी का अभाव से रूबरू हो रहा हो सकता है। सरकारी तंत्र का सेवा प्रवाह की ढिलासुस्ती से परेशान हो सकता है। सामाजिक विभेद का भुक्तभोगी हो सकता है। राज्य उसके लिए दूर-दूर टिमटिमाती लालटेन हो सकता है। ऐसे में लोग एक दल की साथ चाहते हैं। ढिलासुस्ती, भ्रष्टाचार, दण्डहिनता, सिण्डिकेट से मुक्ति मिले। इमानदार और जवाबदेह नेतृत्व मिले।
गांव-गांव में घुमते हुए मैने लोगों में कुछ और तरह की जिज्ञासाएं भी देखा। यदि लोकतंत्र संकट में फसता है तो कौन-सा दल जेल जाने या शहादत देने के लिए तैयार होगा? नागरिक अधिकार यदि संकुचन में पड्ता है तो कौन कौन दल उसके प्रतिरोध का साहस करेगा? अभी निर्वाचन आयोग में चुनावी प्रयोजन हेतु सय से अधिक दल सूचिकृत है। दल खोलने का होड लगा हुआ है। लोकतंत्र में अधिक दल होना ठीक तभी तक माना जाएगा,जब तक वह अपने को जनता के प्रति संवेदनशीलता दिखाता है। आखिर चुनाव से आगे क्यों नहीं देख पाते नेता? असल में चुनाव के साथ चिपके रहने की जड़ें बहुत गहरी हैं।
लोकतंत्र जनहित के मुद्दों पर बात करता है।आज जन मुद्दो पर न के बराबर ध्यान दिया जा रहा है।आज राजनीति बस चुनावी उद्देश्य के लिए हो रही है। आनेवाले चुनाव वेहद अहम है।इस चुनाव में नेपाली लोकतंत्र का अस्तित्व केन्द्र में होगा। सच्चाई ये नहीं है कि नेपाल के दलों ख़तरे में है बल्कि मौजूदा समय में उम्मीद भी लगातार कम हो रही है। सोचने की बात है कि हम क्या खोते जा रहे हैं? मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारे दलों के साथ कुछ ऐसा हो रहा है जो लोकतांत्रिक आत्मा को खत्म कर रहा है। कहीं हम गुस्से से उबलते दिल, छोटे दिमाग और संकीर्ण आत्मा वाले राष्ट्र के तौर पर निर्मित होते जा रहे हैं। यह ऐसा संक्रमण आ गया है जहां आपने पहली बार यह महसूस नहीं किया है कि ज्ञान के उत्पादन का उद्देश्य सत्य नहीं है। पब्लिक डिस्कोर्स का ऐसा ढांचा बनाया जा रहा है जो सोचने की समझ की जरूरत को पूरी तरह खत्म करती है। देखते देखते सच बोलना अब खतरनाक बात बन गई है। काठमांडू के चाय गप्प पर चलने वाली बातें बहुत छनकर ही बाहर आतीं हैं।

व्यवहार में देखें तो यह व्यवस्था धीरे–धीरे विचारों की नहीं, गणित की प्रतियोगिता बनती जा रही है।पुरानी पार्टियाँ आत्मसुधार को टालती रही हैं, और नई पार्टियाँ आत्मनिर्माण से पहले ही हार–जीत की हड़बड़ी में उलझ गई हैं। बिना राजनीतिक दलों के लोकतंत्र की परिकल्पना इस संविधान ने नहीं किया है। संविधान के स्प्रिट अनुसार दल व्यक्तिगत शिकायतों को मतदान के जरिए अभिव्यक्ति देता है ।ज़मीनी लोगों में भी महत्वकांक्षाएं बढ़ाने का आशा दिखाता है । और राजनीतिक समाधान के लिए तमाम वर्गो के हितों के मंच का काम करते हैं।

पुराने दलों की समस्या यह नहीं कि वे पुराने हैं, समस्या यह है कि वे पुरानी गलती को नए चुनाव में दोहराने में तुले हुए हैं। संगठनात्मक जड़ता, वंशवाद, गुटबन्दी और सत्ता–संरक्षण—ये सब सुधार के हर प्रस्ताव को अंदर ही अंदर निष्क्रिय कर दे रहे हैं।
उधर नए दल, जो विकल्प बनने आए थे, वे जल्द ही चुनाव जितने की मशीन बन जाना चाहता हैं ,नीति, वैचारिक प्रशिक्षण और दीर्घकालिक रोडमैप को “बाद में” के खाते में डालकर।
इस स्थिति में प्रश्न पार्टियों से कम, जनता से अधिक जुड़ा है। तो जनता क्या करे ?
सबसे पहले जनता को यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं, लगातार हस्तक्षेप की जिम्मेदारी भी है।चुनाव के दिन सक्रिय और बाकी पाँच साल निष्क्रिय रहने वाली जनता लोकतंत्र को कमजोर ही करेगी। जनता को दल नहीं, दल के व्यवहार को वोट देना सीखना होगा। घोषणापत्र से अधिक, संसद और सड़क—दोनों जगह पार्टी का आचरण देखना होगा।नेता क्या कहता है, उससे महत्वपूर्ण यह है कि वह सत्ता में और विपक्ष में समान रूप से लोकतांत्रिक रहता है या नहीं।
दूसरा, जनता को “कम बुरे” विकल्प की राजनीति से बाहर निकलना होगा। बार–बार यही सोचकर वोट देना कि “और कोई है ही नहीं”—यही सोच पार्टियों को जवाबदेह होने से बचाती है।यदि जनता असहज प्रश्न पूछने लगे—आंतरिक लोकतंत्र कहाँ है, नेतृत्व कब बदलेगा, नीति कहाँ है ? —तो पार्टियों को बदलना ही पड़ेगा।तीसरा, नागरिक समाज, मीडिया और बौद्धिक वर्ग को चुनाव–मौसमी नहीं, निरंतर लोकतांत्रिक
निगरानीकर्ता बनना होगा। लोकतंत्र की रक्षा संसद में नहीं, समाज में होती है। लोग चुनाव में तो आएँगे, लेकिन विश्वास के बिना। वोट पड़ेंगे, लेकिन उम्मीद नहीं पैदा होगी।और जब लोकतंत्र उम्मीद देना छोड़ देता है, तब लोग मजबूत हाथ, त्वरित समाधान और अलोकतांत्रिक आकर्षणों की ओर देखने लगते हैं।लोकतंत्र दलों से नहीं, नागरिकों से जीवित रहता है।अगर पार्टियाँ अल्पकालिक सत्ता खेल में फँसी रहें, तो जनता को दीर्घकालिक लोकतंत्र की पहरेदारी खुद करनी होगी।
राजनीतिक दल सामाजिक हितों के प्रतिनिधि, वैचारिक वाहक और दीर्घकालिक नीतिगत परिवर्तन के माध्यम होने चाहिए। किंतु व्यवहार में प्रियतावादी बाते कर चुनाव में किसी भी तरह संख्यात्मक बहुमत हासिल करने की हल्की राजनीति तक सिमटता जा रहा है। परम्परागत राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का क्षरण, नेतृत्व का केन्द्रीकरण और संगठनात्मक जड़ता ने सुधार की संभावनाओं को सीमित कर दिया है। शक्ति की भूख की प्रबृत्ति ने वैचारिक पुनरावलोकन को अनावश्यक विलासिता बना दिया है। दूसरी ओर नया कहलाने को आतुर दल,जो राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करने के दावे के साथ उभरे,वो भी शीघ्र ही इलेक्टोरलिज्म के संकीर्ण दायरे में फंसते दिखाई देते है। चुनाव जितना साधन होना चाहिए था, किंतु वह स्वयं लक्ष्य बन गया है ।
यह स्थिति लोकतंत्र के एक मूलभूत सिद्धांत को चुनौती देती है कि राजनीतिक दल केवल सत्ता प्राप्ति की इकाइयां नहीं, बल्कि संस्थानिक विवेक होते हैं। जब दल दीर्घकालिक सामाजिक – आर्थिक रूपांतरण के बजाय अल्पकालिक सत्ता – गणित में उलझ जाते हैं, तब लोकतंत्र प्रक्रियात्मक तो बना रहता है, परंतु उसकी आत्मा कमजोर होने लगती हैं। लोकतंत्र में दलों को सांस्थानिक विवेक (institution of public reason) होना चाहिए – जहां समाज के असहज प्रश्न बहस में आता है, टकराता है और नीति में रूपांतरित होता है। प्रश्न स्पष्ट है हमें चुनाव जितने वाली दल चाहिए कि लोकतंत्र गतिशील रखने वाली? यदि पार्टियां केवल चुनाव जितना ही नहीं, समाज के साथ बहस करना भी नहीं सिखा तो लोकतंत्र सांस लेता रहेगा किन्तु अर्थहीन होकर।

