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अकेल पड़ गयें अशोक राय: जसपा में सिर्फ एक नाम रह गए नेता

 

काठमांडू, 30 दिसम्बर 025 । जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) के अध्यक्ष अशोक राय अपनी ही पार्टी में लगभग अकेले पड़ते जा रहे हैं। पार्टी के अधिकांश शीर्ष नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं और अब जसपा का राजनीतिक अस्तित्व काफी हद तक केवल राय के नाम तक सिमटता दिख रहा है।

सोमवार को जसपा की सह-अध्यक्ष रेणुकुमारी यादव और उपमहासचिव प्रदीप यादव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। दोनों नेताओं ने उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाली जसपा नेपाल और महन्थ ठाकुर की लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) में जाने पर सहमति जताई है। इसी दिन पार्टी के केंद्रीय सदस्य आंगकाजी शेर्पा ने भी इस्तीफा सौंप दिया।

दरअसल, वर्ष 2081 में जसपा के गठन के बाद से ही पार्टी लगातार टूटती रही है। दो वर्ष भी पूरे नहीं हुए कि अधिकांश पदाधिकारी पार्टी छोड़ चुके हैं। इससे पहले संघीय परिषद अध्यक्ष राजेन्द्र श्रेष्ठ, उपाध्यक्ष परशुराम बस्नेत, रणध्वज कन्दङ्वा लिम्बु, दुर्गामणि देवान, डॉ. पुष्पराज राजकर्णिकर, कृष्णबहादुर घनु सहित कई नेता नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) में शामिल हो चुके हैं।

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एमाले छोड़ने वालों में सिर्फ राय जसपा में बचे

अशोक राय स्वयं स्वीकार करते हैं कि 13 वर्ष पहले नेकपा (एमाले) छोड़ने वाले नेताओं में आज केवल वही जसपा में बचे हैं।
एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा,
“उस समय एमाले की केंद्रीय समिति से बाहर निकलने वालों में मैं ही ऐसा हूं जो इस पार्टी को बनाकर आगे बढ़ाने की स्थिति में हूं। चाहे जितनी कठिनाइयाँ हों, मैं इसी पार्टी में तपस्या करने का संकल्प लेकर खड़ा हूं।”

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कभी पहचान सहित संघीयता के मुद्दे पर एमाले छोड़ने वाले विजय सुब्बा, रकम चेम्जोङ, हेमराज राय, राजेन्द्र श्रेष्ठ, रणध्वज कन्दङ्वा, अजम्बर काङमाङ जैसे नेता आज अलग-अलग दलों में जा चुके हैं। कोई फिर से एमाले में लौट गया है, तो कोई जसपा नेपाल या नेकपा में सक्रिय है।

लंबा राजनीतिक सफर, अनिश्चित भविष्य

अशोक राय का राजनीतिक जीवन लंबा और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 2033 साल में कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े राय 2035 में भूमिगत हुए। 2046 के बाद वे माले और फिर एमाले के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे। आठवें महाधिवेशन से वे एमाले के उपाध्यक्ष बने, लेकिन दूसरे संविधान सभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़ दी।

एमाले छोड़कर उन्होंने संघीय समाजवादी पार्टी बनाई, जो 2070 के संविधान सभा चुनाव में प्रत्यक्ष सीट नहीं जीत सकी। बाद में कई एकीकरण और विभाजनों के बाद जसपा बनी, जो अंततः फिर टूट गई। 2081 में अशोक राय के नेतृत्व में बनी जसपा से अब लगभग सभी प्रमुख नेता अलग हो चुके हैं।

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हालांकि 2079 के आम चुनाव में वे अपने पूर्व दल एमाले के समर्थन से सुनसरी-1 से सांसद चुने गए। वे परिवहन, संसदीय व्यवस्था, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

भूमिगत राजनीति के दौर में जिनका नाम ‘अमर’ था, वे राजनीतिक रूप से कितने अमर रह पाते हैं—यह सवाल अब उनके भविष्य पर छोड़ दिया गया है।

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