नेकपा एमाले का ११वाँ महाधिवेशनः ओली की वापसी या पोखरेल का उदय ?- लिलानाथ गौतम
लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक दिसम्बर। नेकपा एमाले का ११वाँ राष्ट्रीय महाधिवेशन होने जा रहा है । महाधिवेशन के लिए देशभर से चुने गए प्रतिनिधि काठमांडू आने की प्रक्रिया जारी है । कुछ महीनों पहले ही एमाले ने विधान महाधिवेशन किया था । विधान महाधिवेशन के बाद आयोजित राष्ट्रीय महाधिवेशन द्वारा पार्टी के नए नेतृत्व के चयन की बात कही गई है । ‘नया नेतृत्व’ कहा तो जा रहा है, परंतु पार्टी के मूल नेतृत्व का चेहरा पुराना ही रहनेवाला है, यही आशंका है । कुछ महीनों पहले सम्पन्न विधान महाधिवेशन ने ही अनुमान करा दिया था कि पार्टी के भावी नेतृत्व में कौन चयनित होने वाला है ।
हाँ, विधान महाधिवेशन ने पार्टी के विधान में संशोधन करके पार्टी नेतृत्व में वर्तमान अध्यक्ष केपी शर्मा ओली को ही तीसरे कार्यकाल की जिम्मेदारी देने का संकेत दे दिया है । एक व्यक्ति दो कार्यकाल से अधिक पार्टी नेतृत्व में नहीं रहने देने वाली पुरानी व्यवस्था में संशोधन किए जाने का मुख्य कारण ही अध्यक्ष केपी शर्मा ओली हैं । अर्थात् पुनः तीसरे कार्यकाल के लिए पार्टी नेतृत्व में रहने की ओली की इच्छा को सम्बोधित करने के लिए ही उनके दबाव में पार्टी विधान में संशोधन किया गया था । इसलिए नेकपा एमाले के आगामी पार्टी नेतृत्व में केपी शर्मा ओली ही चयनित होंगे, यह अनुमान गलत नहीं होगा ।
ईश्वर पोखरेल की चुनौती
यद्यपि अध्यक्ष ओली को पार्टी के वर्तमान महासचिव ईश्वर पोखरेल चुनौती देने वाले हैं । पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी तथा उनके समूह के बल पर पोखरेल भी पार्टी अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मेदवारी की घोषणा कर चुके हैं । सिर्फ घोषणा ही नहीं, महाधिवेशन प्रतिनिधियों से मिलने–जुलने में भी पोखरेल सक्रिय बने हुए हैं । महासचिव पोखरेल ने काठमांडू के थापाथली में सम्पर्क कार्यालय खोलकर महाधिवेशन सम्बन्धी गतिविधियों को तेज किया है, जबकि पुनः तीसरे कार्यकाल के लिए पार्टी अध्यक्ष पद पर दावा कर रहे केपी शर्मा ओली भक्तपुर के गुण्डु में रहकर महाधिवेशन सम्बन्धी काम कर रहे हैं ।
एमाले कार्यकर्ताओं के बीच भी पार्टी नेतृत्व परिवर्तन को लेकर बहस चल रही है । परन्तु महाधिवेशन प्रतिनिधि चयन में ओली पक्षधर का मजबूत दखल रहने के कारण कहा जा रहा है कि नेतृत्व के लिए पोखरेल पक्ष कमजोर हुआ है । फिर भी १०वें महाधिवेशन में केपी शर्मा ओली ने अपने मुख्य प्रतिस्पर्धी भीम रावल को जिस मतान्तर से हराया था, उसी तरह पोखरेल को हराना शायद संभव न हो । अर्थात् पोखरेल ओली को अच्छी चुनौती देंगे, ऐसा अनुमान है ।
समूहबन्दी और नेतृत्व के लिए होड
हालाँकि ओली और पोखरेल दोनों पक्ष ने अभी तक पैनल सहित अपनी औपचारिक उम्मेदवारी की घोषणा नहीं की है । वर्तमान पार्टी पदाधिकारियों में से अधिकांश ओली के पक्ष में देखे जा रहे हैं । ओली पक्ष में दिख रहे पदाधिकारी अपने पक्ष को मजबूत करने और अन्य नेताओं को आकर्षित करने के प्रयास में पोखरेल लगातार लगे हुए हैं ।
पैनल सहित आधिकारिक घोषणाओं के समय तक नेताओँ की समूहबन्दी कैसी होती है, यह देखना अभी बाकी है । ओली पक्ष में दिख रहे पदाधिकारी तह के शक्तिशाली नेताओँ को यदि पोखरेल अपने पक्ष में खींचने में सफल होते हैं, तो परिणाम अभी के अनुमानों से बिल्कुल विपरीत भी हो सकता है । पोखरेल के पक्ष में पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी समूह की मजबूत उपस्थिति है ।
देशभर से चुने गए २२०० महाधिवेशन प्रतिनिधियों में अधिकांश प्रतिनिधि किसी न किसी शक्तिशाली नेता या समूह के अधीन रहकर संचालित होते हैं । उनमें से कम ही लोग नेतृत्व चयन के समय स्वतंत्र विवेक का प्रयोग करते हैं । ऐसी स्थिति में उन कुछ दर्जन शक्तिशाली नेताओं में कौन ओली समूह में रहता है और कौन पोखरेल समूह में– यही एमाले का नेतृत्व तय करेगा ।
वर्तमान पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली तथा उनके समूह द्वारा लिए गए विचार को इस समय ‘अनुदारवाद’ के रूप में देखा जा रहा है । पार्टी नेतृत्व में टिके रहने के लिए ओली ने एमाले के भीतर जो–जो अभ्यास किए, उससे उन्हें एक अनुदारवादी नेता के रूप में पहचाना गया । कम्युनिस्ट दर्शन के व्याख्याताओं ने ओली के विचार और व्यवहार को ‘माक्र्सवाद’ से दूर बताया है । उनकी वैचारिक धारा को पुरातनवादी दक्षिणपंथ अर्थात ‘कंजÞर्वेटिव’ कहा गया है ।
वे समाज को परम्परा और नैतिकता का पाठ पढ़ाने में रुचि रखते हैं, जो कम्युनिस्ट दर्शन से मेल नहीं खाता । लेकिन ओली पक्षीय नेता सार्वजनिक भाषणों में कम्युनिस्ट विचारधारा की ही जोरदार वकालत करते हैं । ओली के पक्ष में शंकर पोखरेल, विष्णु रिमाल, प्रदीप ज्ञवाली, भानुभक्त ढकाल, राजन भट्टराई, महेश बस्नेत जैसे नेता हैं । साथ ही विष्णु पौडेल, पृथ्वीसुब्बा गुरुङ, हिक्मत कार्की, गुरु बराल जैसे नेता भी ओली के पक्ष में देखे गए हैं ।
नेताओं का यह समूह आज के एमाले का मुख्य शक्ति–केन्द्र है । इन्हीं के सहारे ओली पुनः पार्टी अध्यक्ष बनने की तैयारी में लगे हुए हैं । अपने पक्ष के अलावा अन्य नेताओँ को ओली ‘नेता’ मानने को तैयार नहीं दिखते । यहाँ तक कि जो नेता उनकी आलोचना करते हैं, उनसे वे मिलना भी नहीं चाहते ।
कभी विद्या भण्डारी, ईश्वर पोखरेल, सुरेन्द्र पाण्डे जैसे नेता भी ओली के पक्ष में थे । इन्हीं के सहयोग से ओली ने एमाले का अध्यक्ष पद हथियाया था । उस समय पार्टी के भीतर शक्तिशाली माने जाने वाले और पार्टी नेतृत्व में रहकर ओली से संघर्षरत माधव नेपाल, झलनाथ खनाल जैसे नेता अब एमाले के भीतर नहीं हैं । जब ओली नेतृत्व में आए, तब उनके विरोधियों को एक–एक कर पार्टी से बाहर निकाला गया । इस क्रम में आखिरी नेता थे भीम रावल ! वही रावल जिन्होंने १०वें महाधिवेशन में ओली के खिलाफ अध्यक्ष पद के लिए सीधा मुकाबला किया था । जब सभी विरोधी हटाए गए, तब ओली ने पार्टी विधान संशोधित कर अपने लिए तीसरे कार्यकाल का रास्ता सुनिश्चित किया । यह संशोधन करते समय ओली देश के प्रधानमन्त्री भी थे ।
जेनजी आन्दोलन का प्रभाव
विडम्बना यह है कि एमाले पार्टी की विधान संशोधन के तीसरे ही दिन देश में जेनजी आन्दोलन भड़क उठा । इस आन्दोलन ने ओलीका प्रधानमन्त्री पद ही नहीं छीना, बल्कि सेना का हेलिकॉप्टर चढ़कर जान बचाते हुए भागना पड़ा । इसके बाद एमाले ही नहीं, सभी पुरानी राजनीतिक पार्टियों में नेतृत्व परिवर्तन और पुस्तान्तरण की मांग तेज हो गई ।
नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा ने सक्रिय राजनीति से अलग रहने की घोषणा करते हुए पूर्णबहादुर खड़का को कार्यवाहक सभापति घोषित किया । नेकपा माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’, पूर्व प्रधानमन्त्री माधवकुमार नेपाल और झलनाथ खनाल आपस में नजदीक आए और १२ राजनीतिक समूहों को मिलाकर ‘नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी’ की घोषणा की । इस पार्टी के शीर्ष नेता कह रहे हैं कि महाधिवेशन के बाद हम नेतृत्व में नहीं रहेंगे । ऐसे माहौल में नेकपा एमाले ही एकमात्र पार्टी है, जो पहले ही दो कार्यकाल अध्यक्ष पद सम्भाल चुके केपी शर्मा ओली को ही तीसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष बनाने में जुटी है ।
जेनजी आन्दोलन के बाद के माहौल को देखते हुए एमाले के कुछ नेता पार्टी के भीतर भी नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में खड़े हुए हैं । इस लाइन का नेतृत्व ईश्वर पोखरेल कर रहे हैं । सुरेन्द्र पाण्डे, अष्टलक्ष्मी शाक्य, गोकर्ण विष्ट, योगेश भट्टराई जैसे नेता पोखरेल के साथ हैं ।
ओली के विरुद्ध खड़ा होने का साहस पोखरेल ने पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी से पाया है । एमाले में नेतृत्व परिवर्तन की चाह रखने वाले कार्यकर्ताओं की आवाजÞ को भण्डारी ने नेतृत्व देने की कोशिश की थी । परन्तु ओली की राजनीति के सामने भण्डारी का कुछ नहीं चल पाया, उनकी सदस्यता नवीकरण ही नहीं हो सकी । सदस्यता नवीकरण न हो पाने के बाद भण्डारी के सहयोग से ही पोखरेल आगे बढ़े है ।
अब ओली या पोखरेल ?
एमाले महाधिवेशन से पोखरेल अध्यक्ष बन पाएँगे या नहीं, यह जल्द ही स्पष्ट हो जाएगा । सम्भवतः पोखरेल के लिए अध्यक्ष बन पाना कठिन होगा, और ओली के चयनित होने की सम्भावना अधिक है । लेकिन अध्यक्ष न बन पाएँ, तब भी महाधिवेशन के बाद एमाले के भीतर ओली के समानान्तर एक शक्तिशाली समूह अवश्य खड़ा होगा । आजीवन नेतृत्व कब्जा करने की ओली की महत्वाकांक्षा को जरूर चोट लगेगी । नेतृत्व परिवर्तन चाहने वाले कार्यकर्ताओं के लिए ११वाँ महाधिवेशन की उपलब्धि यही हो सकती है ।

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