जेन–जी विद्रोह और नेपाल का आसन्न निर्वाचनः संकट समाधान या बदहाली की निरन्तरता : डा.विजय कुमार सिंह
डा.विजय कुमार सिंह, हिमालिनी अंक दिसम्बर। नेपाल में गत भाद्र २३ और २४ को युवा वर्ग (जेन–जÞी) अचानक सड़क पर उतर आया । सड़क–प्रदर्शन में देश में व्याप्त चरम भ्रष्टाचार सहित समग्र दुरावस्था के प्रति तीव्र आक्रोश था, सकारात्मक परिवर्तन के लिए दबाव और परिणामस्वरूप त्वरित समाधान की आशा थी, निकास, स्पष्ट दिशा, पारदर्शिता और विकास की स्पष्ट चाहना थी–जिसे राज्य ने लम्बे समय से अनदेखा कर रखा था । राजनीतिक दलों और सरकार का देश और खÞासकर युवा पीढ़ी के प्रति असंवेदनशील रवैया के प्रति गम्भीर असंतोष इसी से प्रकट होता है । जेन–जÞेड का आंदोलन सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं अपितु उपेक्षा परिवर्तन के लिए राज्य को झकझोर देने जैसा था । परन्तु परिणाम अप्रत्याशित, अकल्पनीय और उल्टा–पुल्टा हुआ–घटनाक्रम मे प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ सक्रिय हो गईं और राष्ट्रीय–अंतर्राष्ट्रीय शक्ति–केन्द्र भी सक्रिय रूप से शामिल हो गए, राज्य की सर्वोच्च संवैधानिक संरचनायें ध्वस्तप्राय हो गई ।
भाद्र २३ के खÞबरदारी विरोध प्रदर्शन में जेन–जÞेड की वास्तविक उपस्थिति और क्रियाशीलता को नकारा नहीं जा सकता । लेकिन इसके अन्तिम चरण खÞासकर अगले दिन, भाद्र २४ को, आंदोलन का अचानक आक्रामक, अराजक और हिंसक रूप धारण करना और अप्रत्याशित उग्र रूप ग्हण कर नीजी एवं अति महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और सार्वजनिक सम्पत्तियों की आगजÞनी, तोड़फोड़, लूटपाट, मारपीट आदि घटनाओं का घटित होना, विधायिका (प्रतिनिधि सभा भवन), कार्यपालिका (सिंह दरवार), न्याय पालिका (सर्वोच्च अदालत भवन) सहित कानून–व्यवस्था एवं शान्ति–सरक्षा के प्रति जिम्मेवार निकाय विशेष रूप से जनपद प्रहरी लक्षित आक्रमण आदि–गंभीर प्रश्नों को जन्म देता है, आशंका पैदा करता है की जेन–जÞेड का यह विरोध एवं खबरदारी कार्यक्रम, स्वस्फूर्त था या किसी नियोजित षड्यंत्र का हिस्सा ? यह बहस और विभिन्न कोणों से इसका विश्लेषण, व्याख्या, आरोप–प्रत्यारोप लगातार गहराती जा रही है ।एक चीज तो स्पष्ट दिखता है की जेन–जÞेड के इस वैधानिक सड़क प्रदर्शन का अति उग्र रूप ग्रहण करना, देश में सम्पूर्ण अनिश्चितता की स्थिति, संवैधानिक संकट और सेना के अतिरिक्त राज्य÷सरकार की सम्पूर्ण रूप से अनुपस्थिति एवं किंकर्तव्यविमूढ़ता कीं अत्यन्त असहज परिस्थिति का श्रृजित होना और फिर बाध्यात्मक रूप में संवैधानिक व्यवस्था और प्रावधानों के बाहर जाकर संविधानेत्तर, संसद के प्रति अनुत्तरदायी सरकार का गठन, प्रतिनिधि सभा का विघटन, समस्त घटनाचक्र में सेना की सक्रिय पर प्रच्छन्न भूमिका, राजावादी शक्तियों की अचानक सक्रियता तथा नई सरकार द्वारा भूल सुधार या प्रतिष्ठा बचाने के प्रयास के तहत शीघ्र निर्वाचन का कार्यभार सरकार को सौंपने की घोषणा–ये सभी घटनाएँ मात्र जन–जÞेड आंदोलन के उद्देश्य से कÞतई मेल नहीं खातीं अपितु अनेक अनिश्चितताओं, आशंकाओं का द्वार खोलतीं दीखती है । संघीयता और संविधान को विफल बनाने की जो परोक्ष कोशिशें चल रही थीं और जो सुनियोजित षड्यंत्र सा था, उनके संकेत यहीं दिखाई देते हैं ।
एक और विषयवस्तु और सम्बन्धित घटनाक्रम जो जन–मानस को उद्वेलित और हतप्रभ कर रही है वह है– क्या यह विरोध सामाजिक संजाल पर प्रतिबन्ध और भ्रष्टाचार के प्रति विरोध जताने के लिए मात्र आयोजित था ? इतने बड़े पैमाने पर इस हिंसक विरोध प्रदर्शन का स्वरूप परिवर्तन और प्रचण्ड बहुमत वाली संवैधानिक सरकार का तास के पत्तों की तरह अनायास ढह जाना क्या एक नितान्त हादसा मात्र था या सुनियोजित षडयन्त्र ? आखिर यह सरकार इतनी कागजी, खोखली और कमजोर कैसे दिखी ? संविधान सभा के ९०% बहुमत से बनी इस संविधान की बुनियाद और जड़ें इतनी कमजोर क्यूं साबित हुई ? राज्य सम्पदा, ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा के लिए जिम्मेवार राज्य–पोषित संरचनायें और संस्थायें पूरी तरह असफल क्यूं हो गई ? यह नेपाल के राजनीतिकर्मियों, राजनीतिक दलों, प्रबुद्ध नागरिक सहित सरोकार रखने वाले अन्य सबों के लिए गहन विश्लेषण और गम्भीर मनन–चिन्तन की विषय वस्तु है ।

ऐसा लगता है कि ऐतिहासिक जन–आन्दोलन एवं महत्वपूर्ण अधिकार आन्दोलनों के कारण हुई युगान्तकारी राजनीतिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि में संविधान सभा से जारी यह संविधान नेपाल के विगत के अनेकों अन्य संविधान की तरह केवल सरकार निर्माण और सतही तौर पर राज्य–संचालन तक ही सीमित रही, जन साधारण से विश्वास और ममत्व नहीं प्राप्त कर सकी । संविधान जारी होते समय रक्तरंजीत मधेस और सम्बन्धित आन्दोलनकारी तो इससे संतुष्ट नहीं ही थे और अनवरत रूप से इसमें संशोधन की मॉंग भी करते ही आ रहे थे, इसे संविधान सभा से पारित और जारी करने वाले ९०% का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दल भी स्वामित्व या अपनत्व नहीं दे रहे थे और इसके प्रति कतई इमानदार नहीं थे । उनकी मानसिकता राजनीतिक सामाजिक परिवर्तनों को आत्मसात नहीं कर पा रही थी और संविधान जारी होने के १० वर्षों के समयावधि के पश्चात भी संविधान व्यवहृत होने के लिए आवश्यक कतिपय ऐन–कानून संसद बना ही नहीं पाई । समावेशी समानुपातिक संघीय गणतनंत्र की संवैधानिक अवधारणा अनुरूप संविधान को मजबूती प्रदान करने वाली आवश्यक संयन्त्र और संस्थाओं को स्वतन्त्र और सांगठनिक रूप से स्थापित ,विकसित या सम्बद्र्धित नहीं किया गया । सुरक्षा निकाय सहित राज्य के विभिन्न अंगों को भी एकल राज्य संरचना की मानसिकता से बाहर निकल संघीय राज्य संचालन के लिए अभिमुख और प्रतिबद्ध बनाने का संस्थागत प्रयास नहीं किया गया ।इतना ही नहीं, सत्ता पर काबिज लोगों ने संविधान को कानूनी राज्य और साझा कानूनी शासन की अवधारणा के रूप में नहीं, अपितु मात्र परम्परागत रूप में शासन करने और निहित वर्ग या समुदाय की स्वार्थ पूर्ति और पद–लाभ उठाने के वैधानिक उपकरण के रूप मे ही प्रयोग किया । स्वार्थ पूर्ति, आर्थिक अनियमितता, बहुआयामी भ्रष्टाचार और असंहज राजनीतिक क्रियाकलाप ने इन राजनीतिक नेतृत्व के नैतिक और राजनीतिक धरातल और राज्य के विभिन्न अंगो पर आवश्यक पकड़ को कमजोर कर दिया ।

तत्कालीन नेकपा एमाले और नेपाली कॉंग्रेस की करीब दो तिहाई बहुमत की सरकार, स्वाभाविक संसदीय परम्परा को ताक पर रख ,आम निर्वाचन के समय प्रमुख प्रतिद्वन्दी चुनावी मोर्चा के दो प्रमुख दलों की सिद्धान्तविहिन, बेमेल संयुक्त सरकार थी ।यह किसी असामान्य परिस्थिति या राष्ट्रीय संकट का सामना करने के लिए गठित नहीं हुई थी अपितु संविधान मे आवश्यक संशोधन के नाम पर बारी बारी से मात्र सत्ता– सुख भोगने के लिए गठित हुई थी । संविधान की सर्व स्वीकृति या व्यावहारिक असहजता के निराकरण या जन–कल्याण के लिए आवश्यक संविधान–सशोधन तो यह संयुक्त सरकार कर न सकी पर बहुमतीय शासन का दम्भ, सत्ता–लिप्सा और स्वेच्छाचारिता की प्रवृति प्रधानमन्त्री ओली और सत्ताधारी नेतृत्व पंक्ति मे बढ़ता ही गया । स्पष्ट रूप से देखा जाए तो नेकपा (एमाले) और नेपाली कांग्रेस नेतृत्व वाली पिछली सरकार जनभावना और चाहना से दूर होती गई और इस सरकार के मुखिया प्रधानमन्त्री ओली के बड़बोलेपन, विभिन्न सूचना–श्रोतों को गम्भीरता से न लेने की प्रवृति , छद्म उत्साही व्यंगात्मक लफ्फेबाजी, अपारदर्शी और हठी, अडि़यल रवैये ने निराशा–जनित जन–आक्रोस को क्रमिक रूप से बढ़ावा दिया एवं अन्ततोगत्वा एक जटिल अकल्पनीय स्थिति श्रृजित हो गई ।समग्र में नेकपा एमाले और नेपाली कॉंग्रेस की यह मिली–जुली सरकार हर मोर्चे पर असफल रहने के साथ ही राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सन्तुलन बनाने में भी पूरी तरह असफल रहीं और नेपाल इन प्रमुख राजनीतिक दलों की गम्भीर असफलता, अदूरदर्शिता और सभी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचारिता के फलस्वरूप श्रृजित प्रतिकूल परिस्थिति और दृश्य–अदृश्य राष्ट्रीय–अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियों के चल–खेल के कारण, एक भयंकर भँवर में फँस गया ।
निश्चित रूप से जेब–जÞेड का यह आक्रोशित विद्रोह सामाजिक सञ्जाल बन्द, भ्रष्टाचार तथा सरकार के सत्ता–लिप्सा, क्षुद्र स्वार्थ साधना एवं हठी रवैये के खिलाफ सशक्त उद्घोष था– विश्व में कहीं न देखे गए असामान्य राजनीतिक अराजकता पैदा करने के लिए नहीं । खैर, अब अतीत की चर्चा–परिचर्चा में लौटना उचित नहीं । लेकिन मौलिक प्रश्न और संकट मुँह बाये आज भी जैसे का तैसे खड़ा है–क्या सुशीला कार्की नेतृत्व वाली सरकार द्वारा तय तिथि में चुनाव कराने से पटरी से उतर गई सरकार को पुनः लीक पर लाया जा सकता है ? क्या देश को अस्थिरता, असहजता और सभी क्षेत्रों में दिखी अफÞरातफÞरी से निजात मिल सकती है और सड़क से उठी परिवर्तन की जोरदार आवाजÞ को राज्य के आगामी स्वरूप और संचालन में समाहित किया जा सकता है ? क्या कामचलाऊ ही सही, स्थिरता आएगी ? आगे भी निकास के नाम पर पुनः वर्तमान प्रकृति से मिलते– जुलते हादसे की पुनरावृत्ति तो नहीं होगी ? क्या आगामी निर्वाचन से प्रभावकारी विधायिका का गठन हो पायेगा ? कोई एक राजनीतिक दल या गठबंधन निर्णायक या स्पष्ट बहुमत ला पायेगा ? अगर नहीं, तो आगे क्या होगा ? कैसी परिस्थिति श्रृजित होगी ? गम्भीर अनिर्णय की स्थिति से उत्पन्न निराशा और अन्यमनस्कता की स्थिति और भी घोर संकट की स्थिति में अकल्पनीय दुर्घटना और दुष्परिणाम की डरावनी सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता ।
पर अब मुद्दा यह है की अनपेक्षित गम्भीर राजनीतिक शून्यता की स्थिति में अजीबोगÞरीब ढग से संवैधानिक दायरे से बाहर गठित यह सरकार को क्या करना चाहिए था, और अब वह क्या कर सकती है ? संसद का विघटन और फिर पुनःस्थापना कितना उचित है ? संघीयता या फिर यह संविधान टिकेगी, कमजोर होगी या फिर खÞारिज होगी ? जैसा कीं सर्वविदित है वर्तमान की भू–राजनीति और अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों की सरकार और राज्य संचालन में जानी अनजानी भूमिका रहती ही है, नेपाल को लेकर अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों की रुचि किस दिशा में झुकी हुई है ?–ये सभी प्रश्न जनमानस में गहरी जिज्ञासा पैदा कर रहे हैं ।
जेन–जÞेड के उद्देश्यों को पूरा करना मुश्किल नहीं था, आज भी नहीं है । भ्रष्टाचार नियन्त्रण, निर्वाचन प्रणाली और प्रक्रिया में बदलाव, प्रधानमन्त्री और सरकार गठन की प्रक्रिया में बदलाव, प्रदेश तथा स्थानीय स्तर की सरकार तथा कर्मचारी प्रबन्धन सम्बन्धी माग–ये सभी मुद्दे संविधान संशोधन द्वारा समाधान योग्य थे । विघटित प्रतिनिधि सभा की पुनःस्थापना के माध्यम से भी संशोधन सम्भव था । परन्तु वर्तमान सरकार ने अपने दायित्व से अधिक चुनाव को प्राथमिकता दी । इतने बड़े संकट की स्थिति मे भी कुछ समय लेकर भी विभिन्न स्तर और विभिन्न चरणों में संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माणकर्ता और विघटित प्रतिनिधिसभा में सहभागी राजनीतिक शक्तियों की सक्रियता मे संविधान के प्रावधान अन्तर्गत सतह पर आये मुद्दों को संबोधित करने के लिए राष्ट्रीय सहमति का कोई गम्भीर प्रयास नहीं किया गया या यूँ कहें तो यह सुशीला कार्की की संकटकालीन सरकार की क्षमता से बाहर इस महती जिम्मेदारी का निर्वहन दिखा ।
अब महत्वपूर्ण सवाल यह है– क्या चुनाव ही देश का एकमात्र रास्ता है ? वर्तमान परिस्थितियों में इसका उत्तर सकारात्मक नहीं दिखता । आगामी चुनाव के बाद भी किसी दल के स्पष्ट बहुमत पाने की सम्भावना न्यून है । बड़े दलों के प्रति असन्तोष, छोटे दलों का गठबन्धन, एकीकरण, तथा नए दलों का पंजीकरण जैसी गतिविधियों ने यह स्पष्ट संकेत कर दिया है कि आसन्न निर्वाचन द्वारा निर्णायक और अपेक्षित परिणाममुखी प्रतिनिधिसभा का गठन संभव नहीं । इस स्थिति में कोई भी दल २०–३० से अधिक सीटें ला पाएगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता । यदि कांग्रेस और एमाले की विघटित संयुक्त सरकार देश को सुशासन देने में असफल रहती है, तो आगामी चुनाव परिणाम देश को और भी गहरी अस्थिरता में धकेल सकते हैं । ऐसी तरल परिस्थिति में कुछ दल, अदृश्य शक्तियाँ तथा कुछ अंतर्राष्ट्रीय चल–खेल, वर्तमान संविधान और संघीयता से नकारात्मक खिलवाड़ करने की कोशिश कर सकते है हैं–जो सफल हुआ तो देश एक और बड़े हादसे और आन्तरिक संघर्ष और जटिल अनिश्चितताओं की ओर बढ़ सकता है । देश का राजनीतिक नेतृत्व देश को इस चिन्ताजनक दुरावस्था से बाहर निकालने का सार्थक प्रयास भी नहीं कर पा रहा है, असफल दीखता है । संविधान की मूल भावना, मर्म और प्रावधानों को परे रख नकारात्मक राजनीतिक क्रियाकलाप बढ़ता जा रहा है ।
राजनीतिक दलों के नेता जिम्मेदार नहीं दिखते, गम्भीर सार्थक बहस से कतराते हैं, संघीय गणतान्त्रिक संविधान के दायरे मे रह उत्पन्न संवैधानिक संकट के समाधान की रणनीति, कार्य योजना, तौर–तरीके की बात नहीं करते । मात्र ताजा जनादेश के नाम पर केवल सरकार बनाने की यांत्रिक विधि–विधान से, लक्ष्य विहीन निर्वाचन मे सहभागी होना पुनः स्थिर राजनीतिक व्यवस्था का सूत्रपात नहीं कर सकता ।स्मरण रहे की बहुआयामी अस्थिरता, विभिन्न किसिम की अनिश्चिततायें, सिर्फ आर्थिक संकट, असुरक्षा और सुशासन की अनुभूति का अभाव ही नहीं पैदा कर रही बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों मे जारी अफÞरातफÞरी जनता में बेचैनी और अपरिभाषित, जानी–अनजानी आक्रोश भी बढ़ा रही है । नेपाली जनता की चुप्पी का अर्थ यह नहीं कि वह सरकार और राजनीतिक चरित्र को नहीं समझती–संभवतः यह किसी बड़े विस्फोट की संभावना का संकेत भी हो सकता है ।

जनकपुरधाम

