राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
जनकपुरधाम/ मिश्री लाल मधुकर।12.01.2026 को मिथिला संस्कृत स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध संस्थान, उच्च शिक्षा विभाग, बिहार सरकार के तत्वावधान में आयोजित ‘संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य और स्वाधीनता आंदोलन’ विषयक एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संस्थान के परिसर में संपन्न हुई। कार्यक्रम का उद्घाटन प्रो. एन.के.अग्रवाल, उच्च शिक्षा निदेशक, बिहार सरकार ने किया तथा प्रथम सत्र की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन एवं मंच–संचालन डॉ. रामबाबू आर्य ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत आगत अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन तथा अतिथियों के सम्मान से हुई। तत्पश्चात अतिथियों ने संगोष्ठी की स्मारिका का लोकार्पण किया।
उद्घाटन वक्तव्य में प्रो. एन.के.अग्रवाल ने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन में संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं की महती भूमिका रही है। भारतीय सन्दर्भ में ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ केवल औपनिवेशिक दासता का विरोध भर नहीं है बल्कि हमारी सुदीर्घ बौद्धिक परम्परा में यह आत्म–स्वतंत्रता के विराट अर्थों में वैदिक साहित्य और उपनिषदों में मिलता है। यही दीर्घ वैचारिक परम्परा आजादी के आंदोलन में राजनीतिक स्वतंत्रता का नैतिक आधार बनती है। राष्ट्र और समाज की स्वाधीनता पर जब भी संकट छाता है तो भाषाएं आगे आकर खड़ी हो जाती हैं। भारतीय भाषाओं ने औपनिवेशिक शक्ति को बखूबी चुनौती दी। यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि संस्कृत को पुरातन भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं को अपेक्षाकृत नूतन माना जाता है जबकि संस्कृत और इन भाषाओं में ऐतिहासिक निरंतरता है। संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में कहीं कोई विरोध नहीं है बल्कि संस्कृत से भारतीय भाषाओं ने बहुत कुछ ग्रहण किया है। भाषा केवल अध्ययन नहीं बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध की माध्यम भी है। इसलिए स्वाधीनता आंदोलन का केवल राजनीतिक घटना के रूप में नहीं बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक घटना के रूप में भी अध्ययन होना चाहिए। तभी हम उसकी बौद्धिक और नैतिक ऊर्जा को सही मायने में आत्मसात कर सकेंगे।
मुख्य वक्ता प्रो.बजरंग बिहारी तिवारी (दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि स्वाधीनता साहित्य की मूल चेतना है। भारतीय भाषाओं का आधुनिक साहित्य बना ही स्वाधीनता आंदोलन में भागीदारी से है। संस्कृत कवयित्री क्षमा राव ने स्वाधीनता आंदोलन के समय ‘सत्याग्रह गीता’, ‘उत्तर सत्याग्रह गीता’ लिखी। एक संस्कृत कवि ने तो यहां तक कहा कि स्वाधीनोत्तर साहित्य गांधी की पीड़ा का साहित्य है। संस्कृत के समकालीन संदर्भों को देखते हुए यह कहना उचित है कि वह आज की भाषा है। संस्कृत साहित्य में स्वाधीनता के प्रश्न बहुत गहराई से आए हैं। वहां यह समझा गया कि स्वतंत्रता केवल भावनाओं का मामला नहीं है, आर्थिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है। इस कोण से भी अनेक रचनाएं देखने को मिलती हैं।
प्रो.रविभूषण (पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, रांची विश्वविद्यालय, रांची) ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में संस्कृत की भूमिका चमत्कृत करती है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ अनेक संस्कृत पत्रिकाएं निकलती थीं, जिनमें अरुणोदय, संस्कृत चंद्रिका, संस्कृत संजीवनम, ज्योतिष्मती आदि प्रमुख हैं। संस्कृत में प्रतिबंधित साहित्य भी है, जिसे प्रखर स्वाधीन–चेतना के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में संस्कृत की लगभग 126–30 पत्रिकाएं निकलती थीं। ‘संस्कृत साकेतम’ संस्कृत का वह दैनिक अखबार था जिसका मूल उद्देश्य ही ब्रिटिश सत्ता का विरोध था। 19वीं–20वीं सदी में संस्कृत में जितना लिखा गया, उतना संख्या की दृष्टि से पिछले पांच हजार वर्षों में नहीं लिखा गया था। वर्तमान समय में भी संस्कृत की 100–150 पत्रिकाएं निकल रही हैं। संस्कृत के साथ अन्य भारतीय भाषाओं यहां तक कि पश्तो और सिंधी में भी स्वाधीनता आंदोलन की अनुगूंज मिलती है। संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में स्वाधीनता आंदोलन के प्रभाव पर गंभीरतापूर्वक शोध–कार्य करने की जरूरत है।
प्रो.प्रभाकर पाठक ने कहा कि तत्कालीन संस्कृत साहित्य से ही नहीं बल्कि प्राचीन संस्कृत साहित्य से भी स्वाधीनता आंदोलन को प्रेरणा मिल रही थी। स्वाधीनता आंदोलन के तिलक, गोखले, गांधी जैसे महापुरुषों पर श्रीमद्भागवत गीता का गहरा प्रभाव था। संस्कृत साहित्य ने नेपथ्य से तो कभी मुख्य भूमिका में आकर स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान की है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि भारत की जितनी भाषाएं हैं, सबका केंद्रीय प्रश्न स्वाधीनता है। स्वाधीनता आंदोलन की बात करते हैं तो हसरत मोहानी, ग़ालिब और अज़ीमुल्ला ख़ां को याद करना लाजमी है। हसरत मोहानी ने ही सर्वप्रथम पूरी आजादी की मांग की थी और इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था, जो 1857 से लेकर 1947 तथा साठोत्तरकालीन जनांदोलनों का केंद्रीय प्रेरक तत्व बन गया।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो.प्रभाकर पाठक तथा मंच–संचालन डॉ.रामबाबू आर्य ने किया। दूसरे सत्र में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कवि व जनबुद्धिजीवी शंकर प्रलामी ने कहा कि किसी भी देश के स्वतंत्रता आंदोलन की पड़ताल की जाए तो एक बात सामान्यतया सामने आती है कि उस आंदोलन की पृष्ठभूमि में स्थानीय भाषा और साहित्य की अहम भूमिका होती है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाषा–साहित्य की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इस संदर्भ में बांग्ला साहित्य की भूमिका सबसे अधिक प्रभावकारी और चिह्नित करने योग्य है। इस परिप्रेक्ष्य में एक नाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, बंकिम चन्द्र चैटर्जी का। उनकी रचना ‘आनंद मठ’ में प्रयुक्त ‘वंदे मातरम्’ गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन में सर्वस्वीकार्य नारा के साथ संजीविनी की तरह राष्ट्रीय स्तर पर काम किया। इसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर पड़ा और भारत की लगभग सारी भाषाओं का साहित्य इस दिशा में अग्रसर हुआ, जो स्वतंत्रता आंदोलन में प्रभावकारी साबित हुआ।
वहीं इग्नू के क्षेत्रीय निदेशक संतन कुमार राम ने कहा कि संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य स्वाधीनता आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। आजादी के आंदोलन से काट कर हम तत्कालीन साहित्य की चेतना को भलीभांति नहीं समझ सकते। इस सत्र के अंत में शोधार्थियों ने शोध–पत्र का वाचन किया।
मौके पर शोध संस्थान के पूर्व निदेशक देव नारायण यादव, वरिष्ठ हिन्दी सेवी हीरालाल सहनी, डॉ.विनीता कुमारी, कवि मनोज झा, विनोद विनीत, डॉ.गौतम कुमार, डॉ.अनामिका सुमन, डॉ.संतोष कुमार यादव, डॉ.संजय सहनी मो.मोजाहिद, डॉ.जमील अंसारी, रूपक कुमार, दुर्गानंद ठाकुर, दीपक कुमार, समीर, मलय नीरव, बबीता कुमारी, अंशु कुमारी तथा संस्थानकर्मी नेती कामति, अर्जुन कुमार, रामविलास यादव, अनिल कुमार, मित्रनाथ झा, हरिशंकर कुमार, कृष्णकांत झा, मदन मोहन मंडल, कमलनारायण झा, सहित बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित थे।


