कांग्रेस में राजनीतिक भूचाल, गगन थापा और विश्वप्रकाश शर्मा निष्कासित
भावुक हुए कार्यवाहक सभापति पूर्णबहादुर खड़का
बिना सफाई, बिना प्रक्रिया—क्या कांग्रेस संविधान से ऊपर नेतृत्व?
काठमांडू, १४ जनवरी ।
नेपाली कांग्रेस में अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के देउवा-नियंत्रित केंद्रीय कार्यसमिति ने महामंत्री द्वय गगन कुमार थापा और विश्वप्रकाश शर्मा, साथ ही सह-महामंत्री फरमुल्ला मन्सुर को साधारण सदस्यता तक से निष्कासित करने का फैसला कर पार्टी को अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है।
यह निर्णय न केवल राजनीतिक रूप से विस्फोटक है, बल्कि पार्टी विधान, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और नैतिकता—तीनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
बिना स्पष्टीकरण, बिना सुनवाई—सीधी कार्रवाई
कांग्रेस विधान की धारा 34(8) स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी भी नेता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई से पहले:
- जांच की जाएगी
- लिखित स्पष्टीकरण मांगा जाएगा
- सफाई का अवसर दिया जाएगा
लेकिन इस पूरे मामले में इनमें से एक भी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
सीधे निर्णय—और वह भी निष्कासन जैसा कठोर कदम।
यही नहीं, कार्रवाई अनुशासन समिति के बजाय सीधे केंद्रीय समिति से की गई, जो स्वयं में विधान का उल्लंघन है।
देउवा पक्ष का तर्क: “आपात स्थिति थी”
पार्टी के प्रचार विभाग प्रमुख मिन विश्वकर्मा का दावा है कि:
- नेताओं की गतिविधियां पार्टी हित के खिलाफ थीं
- मीडिया और अन्य माध्यमों से “अनुशासन उल्लंघन” प्रमाणित हो चुका था
- इसलिए “आपात अनुशासनात्मक कार्रवाई” जरूरी थी
इसके लिए उन्होंने विधान की धारा 22(20) और 50(5) का हवाला दिया—
यानी, विधान की व्याख्या का विशेष अधिकार।
लेकिन सवाल यह है:
क्या विधान की व्याख्या के नाम पर विधान को ही नकारा जा सकता है ?
विशेष महाधिवेशन बना टकराव की जड़
गगन थापा और विश्वप्रकाश शर्मा के नेतृत्व में इतर समूह द्वारा भृकुटीमंडप में विशेष महाधिवेशन जारी रखना देउवा पक्ष के लिए “सीधी चुनौती” बन गया था।
सूत्रों के मुताबिक:
- अंतिम क्षण तक समझौते की कोशिश हुई
- कई दौर की वार्ता हुई
- लेकिन सहमति नहीं बन सकी
और अंततः कार्रवाई का हथौड़ा चला दिया गया।
निर्णय सुनाते वक्त भावुक हुए खड़का
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब निर्णय सुनाते समय कार्यवाहक सभापति पूर्णबहादुर खड़का भावुक हो उठे।
बैठक में मौजूद एक केंद्रीय सदस्य के अनुसार खड़का ने कहा:
“इतना सब करने के बाद भी अगर नहीं माने, तो यह पूर्वनियोजित था।
पार्टी को बचा नहीं सका।”
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि
“सभी प्रयासों के बावजूद साथियों को मना नहीं सका।”
यह स्वीकारोक्ति बताती है कि निर्णय राजनीतिक मजबूरी था, नैतिक नहीं।
गगन थापा का पलटवार: “कांग्रेस किसी की निजी कंपनी नहीं”
भृकुटीमंडप में विशेष महाधिवेशन को संबोधित करते हुए गगन थापा ने निष्कासन को सीधे चुनौती दी।
उनका स्पष्ट संदेश था:
- बिना स्पष्टीकरण कार्रवाई अस्वीकार्य है
- कांग्रेस किसी व्यक्ति या गुट की निजी संपत्ति नहीं
- इस फैसले को कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौती दी जाएगी
बड़ा सवाल: कांग्रेस किस दिशा में?
यह कार्रवाई सिर्फ तीन नेताओं का निष्कासन नहीं है—
यह कांग्रेस की आंतरिक लोकतांत्रिक आत्मा पर हमला है।
आज सवाल सिर्फ गगन या विश्वप्रकाश का नहीं है, सवाल यह है:
- क्या असहमति अब अनुशासनहीनता बन चुकी है?
- क्या नेतृत्व को चुनौती देना पार्टी-विरोधी गतिविधि है?
- और क्या कांग्रेस अब संवाद नहीं, दंड से चलेगी?
निष्कर्ष
नेपाली कांग्रेस, जो लोकतंत्र की सबसे पुरानी ध्वजवाहक पार्टी रही है,
आज अपने ही विधान की अनदेखी कर रही है।
यह फैसला पार्टी को एकजुट करने के बजाय
और गहरे विभाजन की ओर ले जाता दिख रहा है।
इतिहास गवाह है—
जहाँ असहमति को कुचला गया, वहाँ संगठन कमजोर हुआ।
अब देखना यह है कि
क्या कांग्रेस इस संकट से सबक लेगी
या यह निर्णय पार्टी के लिए राजनीतिक आत्मघाती कदम साबित होगा।


