वाराणसी में पंडित विद्यानिवास मिश्र का रचना- कर्म जन्म शती वर्ष के राष्ट्रीय संगोष्ठि
वाराणसी, भारतीय साहित्य की पहचान रहें विश्वविख्यात साहित्यकार पं. विद्यानिवास मिश्र का रचना-कर्म जन्म-शती वर्ष के समापन पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर का आयोजन वाराणसी में १३,१४,१५ जनवरी को किया गया।इस आयोजन का उद्घाटन असम के राज्यपाल मुख्य अतिथि महामहिम श्री लक्ष्मण आचार्य,सारस्वत अतिथि डॉ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’, आयुष राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश,विशिष्ट अतिथि श्री अशोक तिवारी, महापौर, वाराणसी, श्री धर्मेन्द्र सिंह, सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश,अध्यक्ष प्रो. आनन्द कुमार त्यागी, कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी तथा स्वागत डॉ. दयानिधि मिश्र, सचिव, विद्याश्री न्यास ने किया।
इस संगोष्ठि के पंचम सत्र में हिंदी साहित्यकार मनीषा खटाटे और आध्यात्मिक दार्शनिक,चिंतक डाॅ.राजेंद्र खटाटे ने अपनी सहभागिता “साहित्य, लोक और आस्वाद” के सत्र में अपने विचार रखें।मनीषा खटाटे ने”साहित्य का प्रयोजन” इस विषय पर अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहा की साहित्य का प्रयोजन और साहित्य से जुड़े प्रश्न इस विषय की मूल अवधारणा आत्म-अनुभूति और आत्म-अभिव्यक्ति का एक ऐसा विहंगम परिदृश्य है जो जीवन का सौंदर्य बोध और शाश्वत मूल्यों के आसमान में निरंतर विहार करता है और मनुष्य चेतना,सामाजिक चेतना को मानवता की वास्तविक तथा यथार्थ परिभाषा में रूपांतरित करता है।डाॅ.राजेंद्र खटाटे ने “साहित्य का आस्वाद और कला” के संदर्भ में कहा की साहित्य में आस्वाद और कला का संबंध परस्पर है।वे दोनों भी सहअस्तित्व में रहते है।कला के अभाव में आस्वाद शून्य है और आस्वाद के अभाव में कला अपूर्ण है।कला सृजनात्मक चेतना है तो आस्वाद संवेदनात्मक अनुभूति है और साहित्य आस्वाद और कला के अभाव में कलेवर है या मृत है।
साहित्य की रचनात्मक पध्दती सौंदर्य और उदात्तता की भावानुभूति पर केंद्रित होती है जो आनंद तथा दुःख का अनुभव देता है।रसास्वादन यह आत्मानुभूति है जो साहित्य का माध्यम होता हैं।
विद्याश्री न्यास ने समूचे भारत में प.विद्यानिवास मिश्र जी की जन्म शती के उपलक्ष्य में करीब पचास से ज्यादा उनके रचनाकर्म के उपर कार्यक्रमों का आयोजन किया था।पंडितजी एक साहित्यिक युग की तरह है और वे मकर संक्रांति के सुरज है ऐसा सुप्रसिद्ध निबंधकार नर्मदा प्रसाद नरमजी ने पंडित की स्मृति को स्मरण करते हुए कहा।वाराणसी में तुलसी,कबीर,प्रेमचंद के बाद पंडित विद्यानिवास मिश्र जी को हिंदी की साहित्यिक धरोहर के रूप में स्मरण किया जाता है और उनका परिवार यह उनकी धरोहर आगे बढ़ा रहां है।



