पुस्तक समीक्षा
सृष्टि आपकी, दृष्टि हमारी
नेपाल में हिन्दी के लिए समर्पित नाम है श्री राजेश्वर नेपाली जी का । वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार राजेश्वर नेपाली जी हिन्दी, मैथिली और नेपाली भाषा में समान अधिकार रखते हैं और इन तीनों भाषाओं में आपकी लेखनी चलती है । पत्रकारिता के साथ साथ साहित्य के क्षेत्र में आपका अमूल्य योगदान है । आपकी हिन्दी कविता संग्रह नव नेपाल यों तो २०६९ साल में ही पहली बार प्रकाशित हुई थी । दूसरा संस्करण २०७० में प्रकाशित हुई । इस संग्रह में ७५ कविताएँ संग्रहित हैं । आपका व्यक्तित्व देश को समर्पित है और इसका पूरा प्रभाव इनकी रचनाओं में भी सहज ही देखने को मिल जाता है । क्रांति, विभेद, राजनीति, संस्कृति मोह, देशप्रेम ये सब इनकी कविताओं का मुख्य विषय है । ये सभी भावनाएँ एक साथ उक्त कविता संग्रह में मिलती हैं । जिन्दगी और मौत की सत्यता को स्थापित करती इनकी कविताएँ जीवन के सच को हमारे सामने लाती हैं—
झूठे रिश्ते, झूठे बन्धन, कोई किसी का नहीं होता है
सुख में साथी अनेक होते है., दुःख में नहीं कोई होता है ।
जन्म अकेला, मरण अकेला, साथ नहीं कोई जाता है
सब मतलब के यार हैं बन्दे, और झूठा रिश्ता नाता है ……
उसी तरह जीवन की सार्थकता कवि मानवता में देखते हैं और कहते हैं—
हर एक आदमी को चाहिए
वह औरों को जिआबे
हो सके तो खुद को मिटाकर
दूसरों के काम आवे…
कवि की आत्मा देश की अवस्था को देखकर विचलित होती है, कराहती है आए दिन की हत्या, हिंसा उन्हें दुःख देता है औ वो कह उठते हैं—
हरेक सुबह और शाम
एक ही आवाज
हत्या प्रति हत्या
कभी उसकी हत्या
कभी किसकी हत्या
नेपाली द्वारा
दूसरे नेपाली की हत्या
आखिर क्यों ? और कब तक ?
कवि देश की दुर्दशा एवं वर्ग वैषम्य से ग्रसित जनता से कहते हैं कि—
सब मिल देश बनावें भैया
सब मिल करें देश निर्माण
सबसे सुन्दर सबसे मनहर
मातृभूमि पर हो जाएँ कुर्बान ।
कवि का अध्यात्म पक्ष भी कई कविता में चित्रित हुई है, जिन्दगी के उतार चढ़व में हम सब उस असीम सत्ता के प्रति निवेदित होते हैं जो हमें बनाता है और जो हमारा संहार भी करता है । जिन्दगी मिलती है और हम उसे जात पात में, द्वेष में, ऊँच नीच में उलझाकर जिन्दगी को उलझा देते हैं—
हरि भजन जो करे
सब हरि के होय
जात पात सब एक है
राम रहिमा एक
सब मिल हरि कीर्तन करें
सब मिल करे आनन्द
आए है. सो जाएँगे
निश्चित सब का अन्त ।
कवि अत्यन्त उदारता के साथ प्रेम की भी व्याख्या करते हैं । प्रेम एक अहसास, एक अनुभूति है जो किसी को भी किसी से हो सकता है और हो जाता है परन्तु सच्चा प्रेम वह है जो मानव मानव से करता है, अपनी जन्मभूमि से करता है । प्रेम ऐसा हो जो दानव को भी इनसान बना दे —
निर्माण संहार में बदल जाता है
इन्सान इंसानियत छोड़कर
हैवान बन जाता है
इसलिए हम किसी से
नफरत नहीं करें
सच्चा प्रेम और सद्भाव बढ़ाकर
आत्मीय मिलन करें ।
संग्रह की हर कविता अपने अन्दर एक अनुभूति और भाव समेटे हुए है । जीवन का हर पहलु चित्रित हुआ है । समाज, गाँव और देश सब किसी ना किसी रूप में वर्णित हुआ है । संग्रह का सुन्दर और सार्थक पक्ष ये है कि इस संग्रह में सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, देश प्रेम और धार्मिक कविताएँ हैं जो मानव को मानवता का गुण सिखाती हैं, देश और समाज के प्रति का फर्ज याद कराती है, जिन्दगी की सार्थकता को बताती है और मानव को सही मानव बनने का संदेश देती है । शब्द चयन सहजता को समेटे हुए है, कविता में दुरुहता नहीं है । कवि अपनी भावनाओं को सम्प्रेषित करने में सफल हैं । कहीं–कहीं भाषा की अशुद्धि खटकती है परन्तु कविता संग्रह की सार्थकता में उसे अनदेखा किया जा सकता है । हम उम्मीद करते हैं कि कवि अपनी रचनाधर्मिता के साथ पाठक को भविष्य में भी संतुष्ट करते रहेंगे ।

