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मेलों में मौत के झूले: खुशी के टिकट पर बिकती ज़िंदगी

 

-डॉ० प्रियंका सौरभ

हरियाणा के सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय मेले में झूला टूटने की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हमारे यहाँ मनोरंजन भी जान जोखिम में डालकर ही किया जाता है। जिस मेले को संस्कृति, कला और पर्यटन का उत्सव कहा जाता है, वही मेला एक पल में चीखों, अफरातफरी और मातम में बदल गया। झूले के अचानक टूटकर गिरने से एक पुलिस इंस्पेक्टर की मौत हो गई और तेरह लोग गंभीर रूप से घायल हुए। यह सिर्फ़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का परिणाम है जहाँ सुरक्षा सबसे आख़िरी प्राथमिकता बन चुकी है।

मेलों में झूले हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहे हैं। बच्चों की हँसी, युवाओं का उत्साह और परिवारों की उम्मीदें—सब कुछ इन झूलों से जुड़ा होता है। लेकिन जब यही झूले मौत का कारण बन जाएँ, तो सवाल केवल तकनीकी खराबी का नहीं रहता, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढाँचे की लापरवाही उजागर हो जाती है। सूरजकुंड हादसा अचानक नहीं हुआ। यह उस लापरवाही की परिणति है, जिसे सालों से “चलने दो” कहकर नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसे झूलों की अनुमति कैसे दी जाती है? क्या इनके फिटनेस सर्टिफिकेट की कोई गंभीर जाँच होती है या फिर कुछ काग़ज़ों और हस्ताक्षरों से ही सब कुछ “मैनेज” कर दिया जाता है? हर बड़े मेले से पहले प्रशासन सुरक्षा के दावे करता है—ड्यूटी पर पुलिस, एंबुलेंस, दमकल वाहन—लेकिन झूलों की तकनीकी जाँच अक्सर औपचारिकता भर बनकर रह जाती है। जिस मशीन पर दर्जनों ज़िंदगियाँ झूल रही हों, उसकी गुणवत्ता, मेंटेनेंस और ऑपरेटर की ट्रेनिंग पर कोई सख़्त निगरानी क्यों नहीं होती?

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यह पहली बार नहीं है जब किसी मेले या मनोरंजन पार्क में झूला गिरने से मौतें हुई हों। देश के अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर ऐसे हादसे होते रहे हैं—कहीं बच्चों की जान गई, कहीं महिलाएँ घायल हुईं, कहीं पूरा परिवार उजड़ गया। हर बार वही कहानी दोहराई जाती है—जाँच के आदेश, मुआवज़े की घोषणा और कुछ दिनों का शोर। फिर सब कुछ भुला दिया जाता है, अगली दुर्घटना तक।

सूरजकुंड हादसे में एक पुलिस इंस्पेक्टर की मौत होना इस त्रासदी को और गंभीर बना देता है। जो व्यक्ति जनता की सुरक्षा के लिए तैनात था, वही स्वयं व्यवस्था की लापरवाही का शिकार हो गया। यह घटना प्रतीक है उस विडंबना की, जहाँ सुरक्षा देने वाला भी सुरक्षित नहीं है। सवाल यह है कि अगर एक अधिकारी की जान यूँ ही चली गई, तो आम नागरिक की सुरक्षा की क्या गारंटी है?

प्रशासन अक्सर ठेकेदारों पर दोष मढ़कर पल्ला झाड़ लेता है। कहा जाता है कि झूला निजी संचालक का था, मेंटेनेंस उसकी ज़िम्मेदारी थी। लेकिन क्या प्रशासन की ज़िम्मेदारी यहीं खत्म हो जाती है? क्या बिना कड़ी जाँच के किसी भी ठेकेदार को मौत के झूले लगाने की खुली छूट दी जा सकती है? अगर हाँ, तो फिर हादसे के बाद सिर्फ़ ठेकेदार को दोषी ठहराना एक तरह का धोखा ही है।

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असल में यह समस्या सिस्टम की है। मेले अस्थायी होते हैं, लेकिन लापरवाही स्थायी। सुरक्षा मानकों को “अतिरिक्त खर्च” समझा जाता है और मुनाफ़े को सबसे ऊपर रखा जाता है। झूले पुराने होते हैं, कई बार दूसरे राज्यों से लाकर बिना समुचित जाँच के लगा दिए जाते हैं। ऑपरेटर अक्सर अप्रशिक्षित होते हैं, जिन्हें न मशीन की तकनीक की समझ होती है और न आपात स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग।

दुखद यह भी है कि हादसे के बाद प्रशासन की संवेदनशीलता केवल मुआवज़े की घोषणा तक सीमित रह जाती है। मृतक के परिवार को कुछ लाख रुपये देकर समझ लिया जाता है कि जिम्मेदारी पूरी हो गई। लेकिन क्या किसी की जान की कीमत कुछ लाख रुपये हो सकती है? क्या मुआवज़ा उस दर्द, उस खालीपन और उस अन्याय की भरपाई कर सकता है?
सवाल यह भी है कि क्या हमारे यहाँ मनोरंजन का मतलब ही जोखिम बन गया है? क्या मेले, झूले और उत्सव आम आदमी के लिए “लक आज़माने” की जगह बन चुके हैं—जहाँ ज़िंदा लौटना भी किस्मत पर निर्भर हो? यह सोच किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।

सूरजकुंड मेला अंतरराष्ट्रीय पहचान रखता है। देश-विदेश से लोग यहाँ आते हैं। अगर ऐसे प्रतिष्ठित आयोजन में सुरक्षा का यह हाल है, तो छोटे कस्बों और गाँवों के मेलों की स्थिति का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। वहाँ न जाँच होती है, न एंबुलेंस समय पर पहुँचती है और न ही किसी की जवाबदेही तय होती है।

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अब ज़रूरत है केवल संवेदना जताने की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की। हर मेले और मनोरंजन आयोजन के लिए सख़्त सुरक्षा मानक तय होने चाहिए। झूलों की तकनीकी जाँच स्वतंत्र विशेषज्ञों से कराई जाए, न कि औपचारिक समितियों से। ऑपरेटरों की ट्रेनिंग अनिवार्य हो और ज़रा-सी लापरवाही पर लाइसेंस रद्द किया जाए। सबसे अहम बात—हादसे की स्थिति में सिर्फ़ मुआवज़ा नहीं, बल्कि आपराधिक ज़िम्मेदारी भी तय की जाए।

आज सूरजकुंड में झूला गिरा है। कल यह किसी और मेले में गिरेगा, अगर हमने अभी भी आँखें मूँदे रखीं। सवाल यह नहीं है कि अगला हादसा कहाँ होगा, सवाल यह है कि क्या हम हर बार मौत के बाद ही जागेंगे? मेलों का मकसद खुशी बाँटना होता है, मौत नहीं। लेकिन जब खुशी के टिकट पर ज़िंदगी बिकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि यह सिर्फ़ हादसा नहीं, एक अपराध है—और उस अपराध की ज़िम्मेदारी तय करना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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