दुष्टता : वसन्त लोहनी
दुष्टता : वसन्त लोहनी
बिच्छू ने काट लिया
तो इसमें आश्चर्य कैसा?
डंक उसका धर्म है,
क्रोध नहीं,
सिर्फ़ सावधानी ही
उसका उत्तर हो सकती है।
जो सीने में खंजर छिपाए
दोस्ती का हाथ बढ़ाता है,
वह शुभचिंतकों की सभा में भी
विष बो देता है
मौका मिलते ही
हँसते हुए वार करता है
उस पर आरोप व्यर्थ हैं
वह वैसा ही बना है।

एक आदमी
दोस्त बनकर
मेरे साथ चलता रहा।
मुझे क्या पता था
उसके भीतर
धारदार इरादा पल रहा है।
पहले अवसर पर
उसने खंजर उतार दिया
किसी तरह
मैं बच निकला।

वह फिर भी
मेरे साथ चलता रहा।
मैंने क्षमा को
अपना कवच बना लिया।
तीन-चार बार
जब सत्ता ने उसे
हाथ दिया,
उसने वार करना
नहीं छोड़ा।
मैं हर बार
अपने घाव समेटकर
आगे बढ़ता रहा
क्षमा करते हुए,
सहते हुए।
इस बार उसने
अद्भुत पराक्रम दिखाया—
मुझे ही दुष्ट कह दिया।
खुद अंधेरे से बना
उजाले पर उँगली उठाते हुए
उसकी यह निर्लज्जता
मुझे याद दिला गई
हमारे समय के
राजनीतिक देवताओं की—
जो कीचड़ में डूबे होकर भी
पानी को गंदा कहते हैं।
इस बार
उसके खंजर का दर्द नहीं था,
बल्कि उसकी हिम्मत का
अचरज था।
मैं पीड़ा से नहीं,
उसकी निर्भीक असत्यता से
दंग रह गया।



