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अब की बार ‘गगन सरकार’ या ‘बालेन सरकार’ : बदलाव या पुराने नेताओं की वापसी ?: लिलानाथ गौतम

लिलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक फरवरी ०२६। आगामी २१ फागुन को नेपाल में प्रतिनिधि सभा (संघीय संसद) का आम निर्वाचन होने जा रहा है । संविधान जारी होने के बाद संघीय संरचना के तहत होने वाला यह चुनाव केवल सरकार गठन की प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीतिक दिशा तय करने वाला एक ऐतिहासिक मोड़ भी बन सकता है । राजनीतिक दल, उनके नेता और उम्मीदवार अपने–अपने एजेंडे को लेकर जनता के बीच पहुँच चुके हैं । फिर भी सवाल वही है– क्या यह चुनाव सच में बदलाव का दरवाजÞा खोल पाएगा ? या फिर चुनाव के बाद भी वही पुराने चेहरे और वही पुरानी राजनीतिक संस्कृति दोहराई जाएगी ?

नागरिकों के पास विकल्प ही विकल्प

इस चुनाव में नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) जैसे पारंपरिक दल अभी भी मुख्य प्रतिस्पर्धी हैं । दशकों से सत्ता और प्रतिपक्ष का अभ्यास कर चुके इन दलों के पास संगठन, संसाधन और अनुभव है । लेकिन इन्हीं पुराने दलों और नेताओं के साथ हुए अनुभव ही आज कई मतदाताओं के लिए निराशा का कारण बने हैं । सत्ता और प्रतिपक्ष में रहते हुए किए गए भ्रष्टाचार, अस्थिरता, गुटबंदी और असफल शासन से नागरिक तंग आ चुके हैं ।

पुरानी राजनीतिक शक्तियों की इसी नाकामी की पृष्ठभूमि में उनके खिलाफ भदौ २३ और २४ को ‘जेन–जी विद्रोह’ हुआ । उसी विद्रोह की पृष्ठभूमि में आज यह आम चुनाव हो रहा है । राजनीति में नई पार्टी और नए चेहरों की तलाश कर रहे नागरिकों के लिए इस समय कई वैकल्पिक राजनीतिक शक्तियाँ सामने आई हैं । उनमें सबसे प्रमुख है– राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) । रास्वपा के अलावा कुलमान घिसिंग के नेतृत्व वाली उज्यालो नेपाल पार्टी और हर्क साम्पाङ के नेतृत्व वाली श्रम संस्कृति पार्टी भी मतदाताओं के लिए विकल्प बन सकती हैं ।

हालाँकि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) इससे पहले भी (चार वर्ष पहले हुए) आम चुनाव में भाग ले चुकी थी । पुराने दलों और नेताओं के प्रति जनता में व्याप्त आक्रोश और वितृष्णा की पृष्ठभूमि में खड़ी हुई रास्वपा, इस चुनाव तक आते–आते पुराने दलों और नेताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बनती दिख रही है । हाल के वर्षों में रास्वपा, स्वतंत्र उम्मीदवार और वैकल्पिक राजनीतिक शक्तियाँ मजबूत होती गई हैं । खासकर शहरी युवा, विदेश रोजगार से लौटे मतदाता और पारंपरिक दलों से खिन्न वर्ग में नई शक्तियों के प्रति आकर्षण दिखाई देता है ।

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पुरानी शक्तियाँ नए दलों पर विचारधारा और दर्शन के अभाव का आरोप लगाती रही हैं । निवर्तमान संसद की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति नेकपा एमाले के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तो नए दलों और युवा नेताओं को अपमानजनक शब्दों में खारिज करते आए हैं । वे नए दलों को ‘अराजक समूह’ कहते हैं । बौद्धिक विश्लेषकों की नजर में भी नए कहे जाने वाले दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल उनकी वैचारिक अस्पष्टता ही है ।
लेकिन रास्वपा खुद को भ्रष्टाचार–विरोधी, सुशासन–केन्द्रित और नागरिक–केन्द्रित दल के रूप में पेश करती आई है । पुराने ‘वादों’ से ज्यादा प्रशासनिक सुधार, सेवा प्रवाह और जवाबदेही इसके मुख्य एजेंडे हैं । यह शैली भले ही व्यावहारिक लगे, लेकिन कुछ लोग इसे ‘विचार से ज्यादा प्रबंधन तक सीमित राजनीति’ कहकर आलोचना करते हैं । फिर भी नागरिकों की मुख्य चिंता राजनीतिक दर्शन नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार, प्रभावी सेवा और जवाबदेही प्रशासन ही है । इसी कारण युवाओं में रास्वपा के प्रति आकर्षण है । उज्यालो नेपाल और श्रम संस्कृति पार्टी के मुख्य एजेंडे भी रास्वपा से काफी मिलते–जुलते हैं ।

आकार लेता हुआ विकल्प
स्वतंत्र उम्मीदवारों का उभार, खासकर चार वर्ष पहले काठमांडू महानगरपालिका में बालेन साह की जीत के बाद, राजनीति में वैकल्पिक संभावना का संकेत था । अब यह संकेत आकार लेता दिखाई दे रहा है । देश के जिस भी कोने में बालेन साह पहुँचते हैं, वहाँ भीड़ उमड़ पड़ती है । साह रास्वपा की ओर से भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार भी हैं । रास्वपा और बालेन साह के प्रति जनता में दिख रहा आकर्षण यह अनुमान लगाने के लिए काफी है कि आने वाले चुनाव के बाद संसद में रास्वपा एक निर्णायक शक्ति बन सकती है । स्थानीय स्तर पर दिखा ‘स्वतंत्र’ और ‘नए नेता’ का सफल मॉडल संघीय राजनीति में कितना लागू होगा, यह अभी परीक्षण के चरण में है ।
इस चुनाव में कुछ निर्वाचन क्षेत्र केवल सीट के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश के लिए भी निर्णायक माने जा रहे हैं । काठमांडू, ललितपुर, चितवन, मोरङ, झापा, रूपन्देही जैसे क्षेत्रों में चर्चित चेहरों की भिड़ंत राष्ट्रीय बहस को जन्म दे रही है । ऐसे में मतदाता व्यक्ति चुनें या दल ? विचार चुनें या लोकप्रियता ? स्थायित्व चुनें या प्रयोग ? इन सवालों की टकराहट ने चुनाव को न सिर्फ रोचक, बल्कि दिशानिर्देशक भी बना दिया है ।
इस बार के चुनाव की एक और विशेषता यह है कि कुछ दलों ने पहले ही प्रधानमंत्री के उम्मीदवार घोषित कर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है । नेपाली कांग्रेस से गगन थापा, नेकपा एमाले से केपीशर्मा ओली और सार्वजनिक बहस में वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में चर्चा में रहे बालेन साह–इन नामों ने चुनाव को और अधिक व्यक्ति–केन्द्रित बना दिया है । ये तीनों खुद को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं । हालाँकि हर्क साम्पाङ और कुलमान घिसिंग ने भी खुद को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन थापा, ओली और साह की तुलना में वे हाशिये में दिखाई देते हैं ।

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प्रधानमंत्री का उम्मीदवार पहले से तय कर चुनाव में उतरने का सकारात्मक पक्ष यह है कि मतदाता अब ‘प्रधानमंत्री कौन बनेगा ?’ इसका अंदाजा लगाकर वोट डाल सकते हैं । लेकिन नकारात्मक पक्ष यह है कि इससे संसदीय प्रणाली प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी जैसी बन जाने का खतरा भी है । घोषित उम्मीदवारों में गगन थापा और बालेन साह मुख्य वैकल्पिक चेहरे हैं । कई लोग मानते हैं कि इन्हीं दोनों में से कोई एक भविष्य का प्रधानमंत्री हो सकता है । तीसरे मजबूत दावेदार केपी शर्मा ओली पहले ही कई बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं, इसलिए युवाओं में उनके प्रति आकर्षण अपेक्षाकृत कम है ।
फागुन २१ के बाद की संसदीय गणित को अभी तय नहीं किया जा सकता । लेकिन बहुत से लोग गगन थापा को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं । वे सर्लाही जिला निर्वाचन क्षेत्र नंबर ४ से उम्मीदवार हैं । प्रधानमंत्री बनने के लिए उन्हें कम से कम यह चुनाव जीतना ही होगा । यदि वे यहाँ से हार जाते हैं, तो न प्रधानमंत्री बन पाएँगे और न ही सांसद ।

थापा को नेपाली कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी का प्रतिनिधि माना जाता है । बालेन साह की तुलना में उनके पास अधिक राजनीतिक अनुभव है । स्पष्ट वक्ता होना, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में नीतिगत बहस और बदलाव की भाषा उनकी खासियतें हैं । लेकिन सवाल यह है–क्या वे कांग्रेस की पारंपरिक शक्ति संरचना के भीतर इच्छित सुधार लागू कर पाएँगे ? क्या पार्टी की पुरानी पीढ़ी उन्हें आगे बढ़ने देगी ? इन सवालों के बीच जनता में उनके प्रति उम्मीद तो है, लेकिन पार्टी के अंदर की समीकरण उनके लिए चुनौती बनी हुई है ।

थापा के विकल्प के रूप में युवाओं की दूसरी पसंद बालेन साह हो सकते हैं । युवाओं के बीच वे वैकल्पिक नेतृत्व के प्रतीक बन चुके हैं । काठमांडू महानगरपालिका के मेयर के रूप में उनकी कार्यशैली, निर्णय क्षमता और स्थापित संरचनाओं से टकराव ने युवाओं में उम्मीद जगाई है । लेकिन संघीय संसद और गठबंधन राजनीति का उन्हें अनुभव नहीं है और संसदीय राजनीति के लिए उनका स्पष्ट रोडमैप भी सामने नहीं आया है । वे झापा निर्वाचन क्षेत्र नंबर ५ से उम्मीदवार हैं । रास्वपा की ओर से घोषित प्रधानमंत्री उम्मीदवार होने के कारण उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखना स्वाभाविक है । दिलचस्प बात यह है कि इसी क्षेत्र से नेकपा एमाले के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली भी उम्मीदवार हैं । दोनों में से केवल एक ही विजयी होगा, यानी प्रधानमंत्री बनने की राह भी एक की यहीं खत्म हो जाएगी ।
यदि आने वाली संसद में नेकपा एमाले मजबूत होती है, तो ओली ही पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री उम्मीदवार होंगे । इस चुनाव में उनका मुख्य मुद्दा ‘राष्ट्रवाद’ है । राष्ट्रवाद की कथा, स्थायित्व का दावा और पार्टी का मजबूत संगठन उनकी ताकत है । लेकिन पिछले कार्यकाल में हुए संवैधानिक विवादों और सत्ता के केंद्रीकरण के कारण वे इस समय रक्षात्मक स्थिति में हैं ।

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क्या होगा सत्ता हस्तांतरण ?
नेपाल के इतिहास में बड़े बदलाव अक्सर चुनाव के बाहर की घटनाओं से आए हैं–चाहे २०४६ का जनआंदोलन हो या २०६२÷६३ का । लेकिन फागुन २१ का यह चुनाव पहली बार शांतिपूर्ण मतदान के जरिए पीढ़ीगत सत्ता हस्तांतरण की संभावना लेकर आया है । यदि मतदाता सचेत होकर विकल्प चुनते हैं, नए चेहरों को अवसर देते हैं और पुराने को जवाबदेह बनाते हैं, तो यह चुनाव सचमुच ऐतिहासिक हो सकता है । अन्यथा, यह भी सिर्फ एक तारीख बनकर रह जाएगा, जहाँ उम्मीदें फिर पाँच साल के लिए टल जाएँगी ।
याद रखने वाली बात यह है कि फागुन २१ का चुनाव किसी एक दल, एक नेता या एक घोषणा तक सीमित नहीं है । यह इस सवाल का सामूहिक फैसला है कि नेपाल किस दिशा में जाएगा । यदि इस चुनाव से वैकल्पिक शक्तियाँ स्थापित होती हैं, तो राजनीतिक सत्ता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होगी । इतिहास ने यह मौका दिया है, अंतिम शक्ति अब भी जनता के ही हाथ में है ।

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