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चुनाव, दंभ और मधेश राजनीति की कठिन परीक्षा : कंचना झा

मधेश अब नारों से नहीं, नतीजों से बात करेगा

कंचना झा, हिमालिनी अंक फरवरी ०२६।  जैसे–जैसे चुनाव का दिन नजÞदीक आ रहा है, देश का राजनीतिक तापमान बढ़ता जा रहा है । आम जनता से ज्यादा बेचैनी नेताओं के चेहरों पर साफÞ दिखाई दे रही है । यह स्वाभाविक भी है–क्योंकि जिन नेताओं ने पाँच साल तक जÞमीन पर काम नहीं किया, वे इस बार एक अनकहे डर से घिरे हैं कि कहीं जनता इस बार उनका पता साफÞ न कर दे ।

आज की तारीखÞ से अगर बात करें तो चुनाव होने में अभी २४ दिन बाकी है । सभी दल और नेता अपने–अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए हर संभव हथकंडा अपना रहे हैं । कोई शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला, दलित और विकास के नाम पर गीत बनवा रहा है, कोई नुक्कड़ नाटक करवा रहा है, तो किसी ने बाकायदा लोगों की फौज सोशल मीडिया पर उतार दी है–ताकि अपने उम्मीदवार की तारीफÞ जितनी हो सके, उतनी की जाए । और प्रतिद्वन्दी की पुरानी सभी चिठ्ठियां खोली जाएं । चुनाव में शोर जÞरूरी होता है, क्योंकि जो दिखाई नहीं देता, वह बिकता भी नहीं । इतना ही नहीं अभी प्रायः सभी नेता अपने अपने क्षेत्र में घर घर जाकर लोगों से अपने पक्ष में मतदान करने को कह रहे हंै । उनसे बहुत तरह के वादे कर रहे हैं ।

वैसे तो पूरे देश में अभी चुनावी माहौल है लेकिन मधेश में सबसे ज्यादा चुनावी लहर देखने को मिल रही है । मधेश की राजनीति और वहाँ से चुनाव लड़ रहे मधेशी दलों के नेताओं पर जनता चर्चा कर रही है । राजनीति में यह जरुरी भी है कि एक गंभीर और ईमानदार चर्चा होनी चाहिए । मधेश की राजनीति की बात हो और डॉ. सीके राउत, उपेन्द्र यादव, राजेन्द्र महतो अनील झा महंत ठाकुर जैसे नाम न आएँ–ऐसा संभव नहीं ।
चुनव के इस समय में जनता सभी नेताओं को लेकर विचार विमर्श कर रही है । सीके राउत को लेकर जनता क्या चर्चा करती है ? जब पहली बार सीके राउत का नाम उम्मीदवारी के लिए आया था । बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए हैं पिछली ही बार के चुनाव में सीके राउत सप्तरी क्षेत्र नंबर २ से अपनी उम्मीदवारी दी और टक्क्र दिया उपेन्द्र यादव को जिनका की वो गढ़ था । उपेन्द्र यादव ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा हो जाएगा । जनता सीके राउत से उम्मीद लगा बैठी थी क्योंकि उनके बारे में लगातार खबरें ही कुछ ऐसी थी । लोग आपस में उस वक्त बातें करते थे सीके राउत की कि, अमेरिका से अपने देश को नई दिशा देने के लिए आया है, तो नासा में काम किया हुआ व्यक्ति है यद्यपि यह गलत प्रचार था क्योंकि नासा में उन्होंने कभी काम ही नहीं किया । लेकिन जनता के बीच इस तरह की भ्रामक खबरें फैलाई गई थी । पढ़ा लिखा है समाज को एक नई दिशा दे सकता है तो जनता ने क्या गलत किया जो उन्हें सर आँखों पर उसे बिठा लिया और चुनाव में उपेन्द्र यादव को हराते हुए सीके राउत को जिता दिया । जनता ने तो अपने हिसाब से एक लायक नेता को ही चुना । ये अलग बात है कि चुनाव के बाद वे बदल गए ।

लेकिन असली सवाल जीत के बाद का है । सत्ता में पहुँचने के बाद सीके राउत ने क्या किया– उन्होंने भी वही किया जो पहले के नेता लोग करते आए थे । सीके राउत को लगा कि इस जीत के बाद वो हमेशा सबके प्रिय ही रह जाएंगे । राजनीति में बने रहने के लिए काम करना जरूरी होता है । अक्सर नेताओं को यह भ्रम हो जाता है कि जीतने के बाद वे अजेय हो गए हैं, लेकिन जनता हर पल नजÞर रखती है और समय आने पर हिसाब भी बराबर करती है ।

आज की स्थिति यह है कि सीके राउत अपनी ही पार्टी में लगभग अकेले पड़ चुके हैं । जिन लोगों ने शुरुआत में उनका साथ दिया था, वे अब अलग–अलग दल बनाकर चुनाव मैदान में हैं । जनमत पार्टी पाँच हिस्सों में बंट चुकी है–मधेश प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे सतिश कुमार सिंह ने स्वाभिमान पार्टी बनाई, पूर्व प्रवक्ता शरद सिंह यादव ने जनअधिकार पार्टी, पूर्व उपाध्यक्ष दीपक कुमार साह ने सर्वोदय पार्टी और रियाज अहमद शेष ने राष्ट्रीय जनमत पार्टी बनाई ।

विडंबना यह है कि सीके राउत के पूर्व सहयोगी–सिंह और यादव–दोनों ही सप्तरी–२ से उन्हीं के खिलाफÞ चुनाव लड़ रहे हैं । यह राउत के राजनीतिक दंभ का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनके ही बनाए साथी आज उनके प्रतिद्वंद्वी हैं ।

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जनता के बीच में आज सीके राउत की पहचान एक अहंकारी के रूप में, दूसरा सबका अपमान करने वाला और आत्ममुग्धता–यही उनकी पहचान बन गई है । राउत ने न तो जनता की सुनी, न ही अपने साथियों की ।
सीके राउत आज एक भ्रम की दुनिया में जी रहे हैं । उन्हें लगता है कि जनता सब भूल चुकी है । लेकिन मधेश की जनता मूर्ख नहीं है । वह जानती है कि दंभ का अंत कैसे होता है । जिस नेता को कल उन्होंने सिर पर बैठाया गया था, उसे जÞमीन पर पटकना भी जनता अच्छे से जानती है ।
सीके राउत के बाद जिस नेता का नाम आता है वह हैं जसपा नेपाल उपेन्द्र यादव । उपेन्द्र यादव जिनका डंका बजता था कभी मधेश में । मधेश आंदोलन मेंं इन्होंने बहुत से वादे किए थे । बहुत योगदान रहा है मधेश को एक अलग पहचान दिलाने में यादव का । लेकिन कबतक उसी योगदान को भुनाते रहेंगे ? मधेश की जनता ने यादव को खुले हृदय से अपनाया था । उनको स्थान दिया । उन्हें सासंद बनाया लेकिन क्या उसके बदले में वो मधेश को कुछ दे पाए ? शायद नहीं, यदि दिया होता तो वे कभी राउत से नहीं हारते । वे कई बार मंत्री बनें, उप प्रधानमंत्री बने, यानी हमेशा पावर में रहे, पावर में रहते हुए मधेश के लिए कुछ कर नहीं पाए । जनता ने जिस विश्वास और उम्मीद से यादव को अपना नेता चुना उसपर वो भी खरे नहीं उतरे । क्योंकि मधेशी दल कभी एक बनकर रही ही नहीं । मधेशी जनता हमेशा सभी मधेशी नेताओं को एक जगह पर देखना चाहती है क्योंकि बंटने पर सभी अलग हो जाते हैं और अलग होने से आप कमजोर बनते हैं । जनता अच्छी तरह से जानती है कि एक सांसद अकेले कुछ नहीं कर सकता है । संसद में खड़े भी हो जाएं और जबतक आपके साथ आपके सांसद नहीं आप कुछ नहीं कर पाएंगे ।

पिछली बार के चुनाव की अगर बात करें तो स्पष्ट होता है कि जनता उनसे बहुत नाराज थी । सप्तरी क्षेत्र जो उनका गढ़ था एक नए चेहरे ने उसे जीत लिया । जनता नए चेहरे को लाना चाहती है । नए चेहरे का मतलब है नई सोच, नई प्रवृति, नई दिशा । नई प्रतिबद्धता । जो देश को विकास और परिवर्तन की ओर ले जाएं । यादव के घमंड के कारण कहें या स्वार्थ के कारण पार्टी कई बार टूटी । उनके पुराने बहुत से साथी उनसे अलग हुए । यादव को लेकर हमेशा से एक आरोप लगता आया है कि वो जातिगत राजनीति करते हैं ।

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एक और नाम राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के राजेन्द्र महतो का । इस बार महतो सर्लाही–२ से उम्मीदवार हैं ।

राजेन्द्र महतो मधेश आंदोलन का एक और बड़ा नाम रहे हैं । लेकिन आज वे मधेश से ज्यादा पहाड़ की राजनीति में अपनी जगह तलाशते नजÞर आ रहे हैं । जनता इसलिए भी सोचने पर मजबूर हो रही है क्योंकि उसे लग रहा है कि जो नेता कल तक पहाड़ की ओर देखने को भी तैयार नहीं था, वही आज राजनीतिक शरण खोज रहे हैं पहाड़ में ।
इतना ही नहीं महतो पर भी परिवारवाद के आरोप लगते आए हैं । सत्ता में रहकर भी मधेश के लिए कुछ ठोस नहीं कर पाए महतो । स्वयं हारने के बाद पत्नी को आगे बढ़ा देना–यह जनता को नेतृत्व नहीं, मजबूरी का संदेश देता है । उपेन्द्र यादव के ही जैसे पावर में तो रहे लेकिन मधेश के लिए कुछ खास नहीं कर पाएं । महतो एक ऐसे नेता थे जो संसद में दहाड़ा करते थे । जब खड़े होकर मधेश के लिए बोलते थे तो उनकी बातों को सुना जाता था । जनता ने उन्हें कई बार अवसर दिया लेकिन जनता के लिए कुछ खास नहीं कर पाए ।
इसबार के चुनाव में वो बहुत कम नजर आ रहे हैं । चर्चा भी बहुत कम ही हो रही है उनकी । क्योंकि मधेश भी एक अच्छे नेतृत्व की तलाश में है । उसे एक ऐसे नेता की तलाश है जो उसे एक नया रास्ता दिखा सकें । उसके सम्मान, उसे विकास की बात कर सकें ।

मधेश और मधेशियों को लेकर एक बात हमेशा चर्चा में रही है कि इन्हें दोयम दर्जे का माना गया है । केन्द्र ने हमेशा मधेश को ठगा है । लेकिन अब मधेश की जनता भी जान गई है कि न केवल केन्द्र के द्वारा यह उपेक्षित रही है या इसे ठगा गया है वरन अपने ही मधेश के नेताओं द्वारा भी मधेश को ठगा गया है । मधेशी नेताओं ने भी मधेश को ठगने में कोई कसर नहीं छोड़ी है ।
मधेशी दलों की सबसे बड़ी सच्चाई यही है–यहाँ संघर्ष नहीं, वंश चलता है । जÞमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता टिकट के लिए तरसते हैं, और टिकट घर के भीतर बाँट दिए जाते हैं ।
परिवार वाद से मधेश के नेता अभी भी बाहर नहीं आ पाए हैं । ऐसा नहीं है कि मधेशी दलों में दिग्गज विज्ञ और विद्वान लोग नहीं है । बहुत ऐसे नेता है तो राजनीति, कुटनीति, नए विषयों के साथ अपनी कुशलता, से अपनी वाक्पटुता से मधेश की जनता का दिल जीत सकते हैं । मधेश की राजनीति से अपना करियर बना रहे कुछ नेताओं ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी है । बीस बीस पच्चीस वर्ष के निवेश के बाद उन्हें एक टिकट तक नहीं मिला । इसबार सभी अपने अपने क्षेत्रों में काम कर रहे थे कि टिकट मिले तो हम संसद तक पुहँचे । अपने क्षेत्र के लिए कुछ करें लेकिन टिकट चला गया परिवार में ।

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मधेश के लिए जिनका नाम सबसे अव्वल दर्जे में आता है वो हैं महन्त ठाकुर । मधेश की राजनीति में उनका अपना एक स्थान है लेकिन जनता अब चाहती है कि वो आराम करें । और अपना उत्तराधिकारी किसी और को बनाबें । वे स्वयं किसी तरह राष्ट्रीय सभा में आए और चुनाव में खड़ा कर दिया अपनी बेटी को । आपका योगदान है और इस बात का सभी सम्मान करते हैं, आपकी सानिध्यता चाहिए, आपका अनुभव चाहिए आपकी सलाह चाहिए । लेकिन एकछत्र राज नहीं चाहिए मधेश को । क्योंकि जो काम कर रहे हैं उन्हें टिकट मिलनी चाहिए थी । कम से कम उतनी उदारता तो उन्हें दिखानी चाहिए थी । अपने हृदय को विशाल बनना चाहिए था । लेकिन वो नहीं कर पाएं । ऐसा लगता है कि इन नेताओं को यह भ्रम है कि हम पावर में हैं तो कुछ भी कर सकते हैं जिसे चाहे टिकट दे सकते हैं जिसे चाहे नहीं दे सकते हैं कोई हमारा विरोध करेगा ही नहीं । जबकि राजनीति में अगर आप विद्रोह नहीं करते हैं तो हमेशा एक जैसे ही बने रहेंगे, आपको अवसर मिलेगा ही नहीं । और अवसर मिलेगा नहीं तो आप मधेश को क्या देंगे ? क्या काम करेंगे ? ऐसा लगता है कि मधेशी दल के नेता भी मधेश से प्रेम नहीं करते हैं । पहले स्वयं, फिर परिवार उसके बाद नातेदार इसमें ही सिमट कर रह गई मधेशी पार्टी ।

वैसे ये कोई नई बात नहीं है और न ही किसी एक पार्टी की बात है । सभी पार्टियों की अवस्था कुछ ऐसी ही है । ल्ेकिन हाल में कांग्रेस ने अपने आप में सुधार लाया है ।ं जनता गगन थापा की खुलकर तारीफ करती है कि उन्होंने कांग्रेस में जिस तरह का विद्रोह किया उससे लोगों को सीखना चाहिए । कबतक आप एक ही व्यक्ति को ढोते रहेंगे ? ऐसे में तो कभी दूसरे तीसरे का नंबर ही नहीं आएगा तो आप राजनीति क्या करेंगे ?
अधिकार कभी दया से नहीं मिलते । जो यह कहते हैं कि विद्रोह से पार्टी कमजÞोर होती है, वे दरअसल अपनी कुर्सी बचाना चाहते हैं । लोकतंत्र विद्रोह से मजÞबूत होता है, चुप्पी से नहीं ।
आजकल सामाजिक संजाल में बहुत से लोग खुलकर लिख रहे हैं अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को लेकर कि चुपचाप हमारे चिन्ह पर मतदान करें । लिखा जा रहा है कि चुपचाप फलाना छाप तो चुपचाप क्यों ? पूरी तरह से खबरदारी के साथ मतदान करना है । हाँ जिस दिन मतदान स्थल पर जनता वोट करने पहुँचेगी उस दिन वो चुपचाप अपने प्रतिनीधि का चुनाव करेगी लेकिन उससे पहले वो पूरी तरह से विश्वस्त तो हो जाएं । अपने मन में, यदि स्वयं समझ में न आए तो चर्चा करें और देखे कि लोग किनके बारे में क्या कह रहे हैं लेकिन फैसला आपका अपना होना चाहिए । किसी तरह के दबाब में वोट नहीं करें । क्योंकि आपके एक वोट से बहुत बड़ा निर्णय लिया जा सकेगा । आप प्रश्न करना नहीं छोड़े । जनता को प्रश्न करने का पूरा अधिकार है । अपने अधिकार का खुलकर प्रयोग करें । किसी पार्टी विशेष व्यक्ति को बुरा लगता है तो लगे, लेकिन इसका खुलकर विरोध करें– चुपचाप फलाना छाप ।

इस बार का चुनाव मधेशी नेताओं के लिए कोई सामान्य चुनाव नहीं है । यह जनता की अदालत है । यहाँ न आंदोलन की पुरानी तस्वीरें काम आएँगी, न सत्ता की पुरानी कुर्सियाँ ।
अब जनता करेगी तय–किसे राजनीति करनी है और किसे राजनीति से लेना है संन्यास । मधेश अब नारों से नहीं, नतीजों से बात करेगा । इसलिए आप सभी सावधान हो जाएं ।

 

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